बुकी के बयान का अर्थ

12:27 AM May 31, 2020 | Aditya Chopra
बात 11 अप्रैल, 2000 की है, जब दिल्ली पुलिस के खुलासे के बाद क्रिकेट की दुनिया में भूचाल आ गया था। इस दिन को क्रिकेट जगत का काला दिन माना जाता है। यही वो समय था जब मैच फिक्सिंग को लेकर कई बड़े खुलासे हुए और इन खुलासों ने जेंटलमैन खेल कहलाए जाने वाले क्रिकेट पर बड़ा दाग दक्षिण अफ्रीका के तत्कालीन कप्तान हैंसी क्रोनिए देखते ही देखते नायक से खलनायक बन गए थे। उन्होंने अपना गुनाह कबूल कर लिया था कि मैच फिक्सिंग में उनकी बड़ी भूमिका थी। हैन्सी क्रोनिए के मैच फिक्सिंग से जुड़े होने की खबर भारत से ही निकली थी इसलिए फिक्सिंग मामले के तार से भारतीय भी जुड़े हुए थे। तब दिल्ली के संजीव चावला का नाम सामने आया था। जांच के बाद संजीव चावला को मुख्य आरोपी बनाया गया था। 1996 में संजीव चावला ​बि​जनेस वीसा पर लंदन चला गया था और भारत भी आता-जाता रहा। तभी से दिल्ली पुलिस को उसकी तलाश थी। चार्जशीट में संजीव चावला के अलावा मनमोहन खट्टर, राजेश कालरा, सुनील दारा और टी-सीरिज से जुड़े कृष्ण कुमार का नाम भी शामिल था। 19 वर्ष तक चले कानूनी दावपेचों के बाद भारत को संजीव चावला को वापस लाने में सफलता मिली। संजीव चावला को भारत लाए जाने के बाद इस बात की सम्भावनाएं व्यक्त की जा रही हैं कि इस मामले में तमाम राज खुल सकते हैं और क्रिकेट की दुनिया के कुछ और सितारों के नाम सामने आ सकते हैं। इसी माह 2 मई को संजीव चावला को अदालत ने जमानत दे दी है। संजीव चावला ने दिल्ली पुलिस को बयान दिया है कि कोई भी क्रिकेट मैच फेयर नहीं होता और जो मैच लोग देखते हैं वह फिक्स होते हैं। उसने यह भी कहा है कि बहुत बड़ा सिंडीकेट, अंडरवर्ल्ड माफिया क्रिकेट के सभी खेलों को प्रभावित करता है और यह सब ऐसा ही है कि फिल्म का निर्देशन कोई और करे और नाम किसी का हो। उसने कई वर्षों तक मैच फिक्सिंग की बात स्वीकार करते हुए कहा है कि वह बड़े सिंडीकेट और अंडरवर्ल्ड माफिया के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दे सकता क्योंकि वे खतरनाक लोग हैं, अगर वह कुछ बोलेगा तो उसकी हत्या हो सकती है।
संजीव चावला एक बुकी रहा है, इसलिए अगर उसकी कही बातों पर यकीन किया जाए तो यह स्वीकार करना होगा कि क्रिकेट खेल अंडरवर्ल्ड माफिया की चंगुल में फंस कर रह गया है। अगर हर क्रिकेट मैच फिक्स होना भी मान लिया जाए तो स्पष्ट है कि क्रिकेट अब प​वित्र खेल नहीं रहा। इसका अर्थ यही है कि जिस खेल को हम रोमांचिक होकर देखते हैं, वह एक धोखा है, भ्रमजाल है।  क्रिकेट जगत में मैच फिक्सिंग ने कई खिलाड़ियों का करियर तबाह किया है।
क्रिकेट टीम  के कप्तान रहे अजहरुद्दीन, अजय शर्मा, अजय जडेजा, श्रीसंत, टी.पी. सुधीन्द्र, मोहनीश मिश्रा, अमित यादव आैर शलभ श्रीवास्तव ने अकूत धन कमाने के लिए शार्टकट का सहारा लिया, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। मैच फिक्सिंग से स्पॉट फिक्सिंग तक के सफर ने सट्टेबाजों के चरित्र को बदल ​डाला। मैच फिक्सिंग में पहले टीम के तीन-चार खिला​ड़ियों और कप्तान को शामिल करना जरूरी होता था लेकिन अब टीम के एक-दो गेंदबाजों या एक-दो ​बल्लेबाजों से ही स्पॉट फिक्सिंग का पूरा खेल हो जाता है।
स्पॉट फिक्सिंग के जितने भी मामले सामने आए हैं उनमें अधिकतर गेंदबाजों को ही शामिल किया गया है। अब सट्टेबाजी का पूरा खेल बड़े शहरों से छोटे शहरों तक पहुंच गया है। आईपीएल, ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट में भी सट्टेबाजी घुस चुकी है। यह भी तथ्य है कि आईसीसी और विभिन्न देशों के क्रिकेट बोर्ड इस खेल में घर कर गई बुराइयों को दूर करने में असफल रहे हैं। इस खेल में जैसे-जैसे पैसा आता गया, भ्रष्टाचार की जड़ें गहराती गईं। यदि क्रिकेट की लोकप्रियता और उसका मान-सम्मान बनाए रखना है तो सभी देशों के क्रिकेट प्रशासकों को एकजुट होकर ऐसी कोई व्यवस्था करनी होगी जिससे यह अद्भुत खेल सट्टेबाजों के हाथों का खिलौना न बनने पाए। क्रिकेट प्रशासकों के साथ-साथ संबंधित देशों अर्थात् क्रिकेट खेलने वाले देशों की सरकारों को भी चेतने की जरूरत है। यह सही है कि सरकारें क्रिकेट प्रशासकों के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, लेकिन उन्हें यह तो सु​िनश्चित करना ही होगा कि किसी भी खेल से खिलवाड़ न होने पाए। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि क्रिकेट में किस्म-किस्म की सट्टेबाजी बढ़ती चली जा रही है। 
अब सवाल यह है कि अंडरवर्ल्ड माफिया पर हाथ कौन डालेगा? माफिया का जाल पूरी दुनिया में है। इसका नैटवर्क इतना उलझा हुआ है कि कौन सी तार कहां जाकर जुड़ी है, यह अपने आप में रहस्य है। सट्टेबाजी माफिया का कोई अकेला धंधा नहीं, उसके धंधों में ड्रग्स की सप्लाई, मनी लांड्रिंग, हवाला, आतंकवाद का पोषण और संगठित अपराध  भी शामिल है। बुकी संजीव चावला ने अपने इकबालिया बयान में बहुत कुछ कहा है, जिसका अर्थ हमें समझना होगा।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com