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कोर्ट शूटआउट के बाद...

फिल्मों में तो हमने कई बार देखा कि कोर्ट रूप में खलनायक खुद को अपने गुर्गों से गवाह या अन्य लोगों की हत्या कर देते हैं। कभी-कभी नायक न्यायाधीश के सामने खलनायक और उसके साथियों की हत्या कर देता है
कोर्ट शूटआउट के बाद...
फिल्मों में तो हमने कई बार देखा कि कोर्ट रूप में खलनायक खुद को अपने गुर्गों से गवाह या अन्य लोगों की हत्या कर देते हैं। कभी-कभी नायक न्यायाधीश के सामने खलनायक और उसके साथियों की हत्या कर देता है और हम सब नायक के बदला लेने पर जमकर तालियां बजाते हैं। फिल्मों में तो अपराध कोई भी करे, उसे नाटकीय अंदाज से महिमामंडित किया जाता है लेकिन सभ्य लोकतंत्र में अगर ऐसी घटनाएं होने लगे तो यह समाज के लिए घातक सिद्ध होती हैं। राजधानी में गैंगवार कोई नई बात नहीं। गैंगस्टर आपस में भिड़ते रहते हैं लेकिन रोहिणी कोर्ट में न्यायाधीश की मौजूदगी में एक गैंगस्टर की हत्या किया जाना न केवल कानून व्यवस्था को धत्ता है बल्कि बहुत ही दुखद है। हमलावर तो खुद मरने के लिए आए थे। उन्हें इस बात का अंदाजा तो होगा ही कोर्ट रूम में हत्या किए जाने के बाद उनकी जान को भी खतरा हाे सकता है। पुलिस ने भी अदालत में ही अंतिम विकल्प का सहारा लेते हुए दोनों हमलावरों को मार गिराया। यह पहला ऐसा मामला है कि न्यायाधीश खुद इस घटना के गवाह बने हैं। अगर कोई व्यक्ति खुद मरने के लिए आया हो तो फिर कानून क्या करेगा? न्यायालय परिसरों में हत्याएं तो पहले भी हुईं। पेशी पर लाए गए गैंगस्टरों को भगाया भी जाता रहा है लेकिन रोहिणी कोर्ट रूम में जो कुछ हुआ उससे न्याय का मंदिर ही अपवित्र हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अपराधियों का दुस्साहस काफी बढ़ चुका है। राजधानी दिल्ली के आसपास के शहरों गुड़गांव, सोनीपत, फरीदाबाद और नोएडा में अपराधियों के कई गिरोह सक्रिय हैं जो कभी आपसी रंजिश में तो कभी पेशेवर रूप में हत्याओं को अंजाम देते रहते हैं। अनेक ऐसे चेहरे जो कभी युवाओं का आदर्श रहे वह बेनकाब हो चुके हैं। दोनों हमलावरों को मार गिराना दिल्ली पुलिस की कामयाबी कही जा सकती है, मगर उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आखिर अपराधियों में खौफ कैसे पैदा किया जाए। अपराधियों के पनपने और इनका मनोबल बढ़ने के कारण किसी से छिपे हुए नहीं हैं। लोगों की जमीनें कब्जाने और सुपारी लेकर हत्या करने जैसी घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। इन पर अंकुश नहीं लगाए जाने से रंगदारी, छेड़खानी और बलात्कार करने वाले भी कानून से नहीं डरते। अपहरण, फिरौती वसूलने, जमीन और मकान हथियाने के आरोप तो पुलिस अफसरों पर भी लगे हैं। जो कल तक एनकाउंटर स्पैशलिस्ट थे, ​जिनके नाम से अंडरवर्ड थर-थर कांपता था, वे भी मुजरिमों की तरह जेल की सलाखों के पीछे बंद रहे। दिल्ली से लेकर मुम्बई और अन्य महानगरों में ऐसे दर्जन भर पुलिस अफसर रहे जो फिरौती वसूलने से लेकर हत्या करने पर फर्जी मुठभेड़ों के आरोपों में जेल में रहे हैं। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि चंद दिनों में करोड़ों की अवैध कमाई ने युवाओं को अंधा बना दिया है। वह फिल्मी डॉन की तरह विलासितापूर्ण जीवन जीना चाहते हैं और अपने-अपने इलाकों में अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं। 
कभी-कभी हत्याएं केवल इसलिए की जाती हैं ताकि उनके ‘साम्राज्य’ को कोई चुनौती न दे सके। हालत यह है कि जितनी हत्याओं के आरोप उन पर लगेंगे उतना ही उनकी कीमत बढ़ जाती है। फिर वह खौफ का व्यापार करते हैं। दिल्ली में अापराधिक इतिहास में ऐसी कई कहानियां दर्ज हैं कि पुलिस अफसर और अपराधियों की सांठगांठ के चलते कई अपराध किए गए।  
रोहिणी कोर्ट में हमलावर वकीलों की तरह काला कोट पहन कर आए थे। हमलावर सुरक्षा व्यवस्था को धोखा देने में कामयाब हो गए। अपराधी पुलिस से ज्यादा शातिर हो चुके हैं। हर बार वह नई शैली अपनाते हैं और ​पुलिस को चकमा दे जाते हैं। इस घटना ने दिल्ली की अदालत परिसरों को बहुत अधिक संवेदनशील बना दिया है। अब इनमें सुरक्षा व्यवस्था को बहुत मजबूत बनाना होगा। अगर राजधानी में इस तरह के अपराध बढ़ते रहे तो फिर दिल्ली अपना आकर्षण खो देगी। दिल्ली की आबादी दो करोड़ के आसपास है। इतने बड़े शहर की कानून व्यवस्था सम्भालने वाली एजैंसियों को बहुत ज्यादा मुस्तैद रहने की जरूरत है। वकीलों और पुलिसकर्मियों से भरे रहने वाले कोर्ट परिसर में यह न्याय का मजाक नहीं तो और क्या है? इस वारदात की राेशनी में भले ही लोग कहें कि यह तो गैंगस्टरों की आपसी रंजिश का ही परिणाम है लेकिन ऐसी आपराधिक मानसिकता का विस्तार ​किसी भी तरह से समाज हित में नहीं। अब देखना यह है कि पुलिस और अन्य एजैंसियां अपराधियों के मनोबल को तोड़ने के लिए क्या कदम उठाती हैं।
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