+

नागरिकता कानून में संशोधन

नागरिकता कानून में संशोधन
केन्द्र की मोदी सरकार ने तय कर लिया है कि वह नागरिकता कानून में संशोधन करके पड़ोसी मुस्लिम देशों से आने वाले ऐसे सभी गैर मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान करेगी जिनके साथ उनके देशों में धार्मिक कारणों से अन्याय हुआ हो। इन शरणार्थियों में हिन्दू, जैन, बौद्ध, पारसी, ईसाई व सिख शामिल हैं। अफगानिस्तान, पाकिस्तान व बंगलादेश ऐसे पड़ोसी देश हैं जहां से गैर मुस्लिम शरणार्थी भारत आ सकते हैं। 

इनमें भी सबसे ज्यादा पाकिस्तान से ही ऐसे लोग भारत आकर नागरिकता मांग सकते हैं और पूर्व में ऐसे लोग इसी देश से भारत आये भी हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का तर्क है कि यदि हिन्दू अपने धर्म की वजह से अपने देश में सताये जाते हों तो आखिरकार वे किस देश में जायेंगे? एक मात्र भारत ही ऐसा देश है जहां वे शरण मांग सकते हैं मगर इसके साथ ही यह सवाल भी जुड़ा हुआ है कि यदि इन्हीं देशों में मुस्लिम धर्म को मानने वाले ही ऐसे फिरके के लोग हैं जिनके साथ धर्म की बुनियाद पर ही अन्याय होता है तो वे फिर किस देश में जायेंगे? 

पाकिस्तान में ही अहमदिया या आगा खानी मुसलमानों का ऐसा तबका है जिनके साथ वहां ‘जौर-जुल्म’ किया जाता है। यह इस​लिए महत्वपूर्ण है कि 1919 तक ब्रिटिश भारत का श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान व बंगलादेश हिस्सा था। 1919 में श्रीलंका अलग हुआ, 1935 में म्यांमार अलग हुआ और 1947 में पाकिस्तान अलग हुआ जिसके 1971 में दो टुकड़े हो गये और इसमें से बंगलादेश बना। धर्म की बुनियाद पर केवल पाकिस्तान का ही निर्माण 1947 में हुआ जिसके तहत धर्म के आधार पर आबादियों की भी अदला-बदली हुई। 

इससे पूर्व अलग हुए श्रीलंका व म्यांमार का आधार अंग्रेजों ने धर्म को नहीं बनाया। 1971 में जब बंगलादेश का निर्माण हुआ तो इसके निर्माता बंगबन्धू शेख मुजीबुर्रहमान ने इसे भारत की ही तरह धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया था। इसका राजधर्म इस्लाम बहुत बाद में खूनी सैनिक सत्ता पलट होने के बाद बना। अफगानिस्तान को अंग्रेजों ने 1889 में ही भारत से अलग करके इसकी सत्ता मुस्लिम जिरगा को बादशाहत के ढांचे में सौंप दी थी। 

इसके बावजूद इस मुल्क में 1990 के बाद शुरू हुई तालिबानी तहरीक के 2000 वर्ष के बाद निजाम में बदल जाने तक सिख व पेशावरी पंजाबी हिन्दू रह रहे थे और कारोबार कर रहे थे। बौद्ध व हिन्दू संस्कृति के ऐतिहासिक अवशेष समेटे यह मुस्लिम देश यहां के गैर हिन्दुओं के साथ बराबरी का व्यवहार कर रहा था। तालिबान हुकूमत के बाद ही अफगानिस्तान से सिख समुदाय के लोगों ने भारत में शरण ली। 

1846 तक शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंह की रियासत का हिस्सा रहे अफगानिस्तान ने पिछली सदी में भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी अपनी सीमित भूमिका निभाई थी और आजादी के परवाने ‘राजा महेन्द्र प्रताप’ ने काबुल में ही भारत की सर्वप्रथम निर्वासित ‘आरजी सरकार’ गठित की थी। आजादी के बाद से ही भारत के सम्बन्ध अफगानिस्तान के साथ बहुत दोस्ताना रहे और इस देश के अन्तिम बादशाह जहीर शाह ने हिन्दोस्तान को अपना सबसे बड़ा दोस्त तब कबूला था जब जिन्ना ने मजहब की बुनियाद पर दस लाख लोगों की लाशों पर पाकिस्तान को तामीर किया था और अफगानिस्तान में शहंशाह जहीर शाह ने हर हिन्दू और सिख को पूरी तरह सुरक्षित रखा था। 

हिन्दोस्तान का निर्माण ही विभिन्न संस्कृतियों के संगम से हुआ है, यही वजह है कि आज के पाकिस्तान में भी एक ‘हिन्दोस्तान’ रहता है। भारत की सांस्कृतिक धरोहर तक्षशिला विश्वविद्यालय के अवशेष इस्लामाबाद से थोड़ी ही दूरी पर ही स्थित हैं और मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की संस्कृति की धरोहर भी पाकिस्तान में है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि किसी भी दूसरे देश में अपने धर्म की वजह से पीड़ित व प्रताड़ित होने वाले हिन्दुओं के लिए भारत ही एकमात्र देश है परन्तु नागरिकता प्रदान करने को धर्म केन्द्रित बनाने का विरोध देश की विपक्षी पार्टियां कर रही हैं मगर इस डर के साथ उन्हें हिन्दू विरोधी न मान लिया जाये। 

उनका डर वाजिब है क्योंकि भारत की आबादी में 80 प्रितशत हिन्दू ही हैं और उनके वोट की ताकत से ही हुकूमत की बागडोर मिलती है। इस सन्दर्भ में हमें विहंगम दृष्टिपात करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप की वर्तमान राजनीतिक स्थिति का जायजा लेना होगा। बंगलादेश हमारा ऐसा परम मित्र देश है जो पाकिस्तान के खिलाफ हर मोर्चे पर हमारा समर्थन करता है।  यहां तक कि इस देश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजेद ने मुस्लिम देशों के सम्मेलन में भी भारत का ही पक्ष लिया था। 

पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए बंगलादेश हमारा कूटनीतिक अस्त्र है जिसके साथ हमारी सीमाएं लगती हैं और वहां पर केवल कुछ समय को छोड़ कर हमेशा काजी नजरुल इस्लाम से लेकर गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के अमन व शान्ति के नगमे ही बिखरे रहते हैं। इस देश में रहने वाले हिन्दुओं के अधिकार किसी मुसलमान नागरिक से कम नहीं हैं। यहां के नोआखाली विश्वविद्यालय में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के दर्शन पर गोष्ठियों की बहार लगी रहती है, किन्तु यहां की कट्टरपंथी इस्लामी तंजीम ‘जमायते इस्लामी’  इस देश के उदारवादी बंगला मुसलमानों के लिए भी उतनी ही विषैली है जितनी कि इसमें रहने वाले बौद्ध व हिन्दुओं के लिए। 

बेशक माना कि यह नया कानून भारत में रहने वाले नागरिकों पर लागू नहीं होगा बल्कि विदेशों से आने वाले लोगों पर लागू होगा परन्तु इसके बाद तो वे बनेंगे भारत के ही नागरिक जो घोषित रूप से दुनिया का ऐसा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है जिसका राष्ट्रपति भी मुस्लिम हो सकता है सिपहसालार भी। एयर चीफ मार्शल लतीफ का नाम भी सिपहसालारों में है, ब्रिगेडियर उस्मान का नाम भी नौशेरा के शेर के रूप में हर हिन्दोस्तानी को याद है। इसलिए इस मामले में अभी और गहन मंथन किया जाये तो बेहतर होगा। 

भारत के मुसलमानों को इस बात पर हमेशा फख्र रहा है कि वे हिन्दुओं की सुरक्षा में रहते हैं।  यह सुरक्षा पंक्ति ही हमारी मजबूती की नींव है और पाकिस्तान जैसे मुल्क को गारत करने के लिए काफी है क्योंकि इस मुल्क में रहने वाले शिया मुस्लिम तक महफूज नहीं हैं। पख्तूनों और ब्लाेचों की बात तो क्या की जाये?
facebook twitter