अमेरिका की दादागिरी और भारत

अमेरिका और ईरान में दुश्मनी का बहुत पुराना इतिहास रहा है। अब यह दुश्मनी एक बार फिर सतह पर आ गई है। अमेरिका ने ईरान पर चौतरफा प्रतिबन्ध लगा रखे हैं जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था चौपट हो रही है। ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने चेतावनी दी है कि अगर दुनिया की ताकतें अपने वादे निभाने में नाकाम रहीं तो वे अपने परमाणु कार्यक्रम पर वापिस लौट आयेंगे। 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक ढंग से चुने गये प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर ईरानी शाह रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी थी। मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल कुंओं का राष्ट्रीयकरण किया था और वह चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो।

किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण समय में अपदस्थ करने का काम अमेरिका ने पहली बार ईरान में किया था लेकिन यह आखिरी नहीं था। इसके बाद अमेरिका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया। 1953 में ईरान में अमेरिका ने जो तख्ता पलट किया था उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी। इसके बाद ईरान और अमेरिका में कड़वाहट कम नहीं हुई। ज्यादातर उग्र क्रांतिकारी क्रांति के बाद रूढ़िवादी बन जाते हैं, ऐसा ही ईरान के साथ हुआ। सत्ता में आने के बाद खुमैनी की उदारता में अचानक परिवर्तन आ गया। खुमैनी ने भी विरोधी आवाजों को कुचलना शुरू कर दिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था से दूरी बना ली।

ईरान और अमेरिका के राजनयिक सम्बन्ध खत्म हो गये थे। तेहरान में ईरानी छात्रों ने अमेरिकी दूतावास को अपने कब्जे में ले लिया था और 50 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर से इनकी मांग थी कि शाह को वापिस भेजे जो न्यूयार्क में कैंसर का इलाज कराने गये थे। बंधकों को तब तक नहीं छोड़ा गया जब तक कि रोनाल्ड रीगन अमेरिका में राष्ट्रपति नहीं बन गये। जब इराक ने ईरान पर हमला किया तब भी अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का साथ दिया था। दशकों की शत्रुता के बाद ओबामा सरकार ने 2015 में ईरान से परमाणु समझौता किया जो डोनाल्ड ट्रंप ने तोड़ दिया और ईरान पर नये प्रतिबन्ध लगा दिये। ईरान को लेकर अमेरिका और यूरोप में मतभेद सामने आ चुके हैं।

ट्रंप की शत्रुतापूर्ण नीतियों के चलते इस इलाके में शांति स्थापित नहीं हो सकती​। यूरोपीय संघ का नजरिया ट्रंप के खिलाफ है। वह ईरान से बातचीत का पक्षधर है। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति पद हासिल करने के लिये ईरान से छोटी लड़ाई लड़ सकते हैं ताकि चुनावों में उन्हें लाभ मिल सके। कूटनीतिक क्षेत्रों में अमेरिका-ईरान टकराव को ट्रंप के षड्यन्त्र के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका-ईरान टकराव में भारत पूरी तरह उलझ गया है। अमेरिका अपने सहयोगी देशों को ईरान से तेल न खरीदने पर मजबूर करके ईरान की अर्थव्यवस्था को धराशायी कर देना चाहता है।

अमेरिका ने भारत को ईरान से तेल खरीदने की छूट भी अब खत्म कर दी है। अगर भारत अमेरिकी लाइन का अनुसरण करता है तो तेल आयात करना मुश्किल होगा। भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिये ईरान एक अहम देश है। ईरान भारत के लिये तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। ईरान भारत को कई प्रकार की छूट भी देता है। 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ईरान गये थे। मोदी के दौरे को चाबहार पोर्ट से जोड़ा गया। भारत के लिये यह चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती की काट के रूप में देखा गया। मार्च 2017 में भारत और ईरान के बीच कई बड़े ऊर्जा समझौते हुये थे। अरब की खाड़ी में ईरान के समुद्री क्षेत्र में प्राकृतिक गैस की खोज 2008 में एक भारतीय टीम ने ही की थी। अब सवाल यह है कि अमेरिका भारत को कैसे कह सकता है कि वह ईरान से तेल नहीं खरीदे। यह उसकी दादागिरी ही है।

सवाल यह भी है कि भारत अब क्या रुख अपनाये। अगर भारत किसी और देश से तेल आयात करता है तो वह महंगा पड़ेगा और देश में तेल के दाम बढ़ेंगे। भारत की चिंता ईरान में रह रहे भारतीय मूल के नागरिक भी हैं। ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद आरिफ ने दिल्ली आकर विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज से मुलाकात की है और तेल आयात पर अमेरिकी प्रतिबन्ध के चलते होने वाले प्रभाव के बारे में बातचीत की है। विदेश मंत्रालय का कहना है कि दोनों देशों के बीच सार्थक एवं रचनात्मक चर्चा हुई। भारत ईरान से तेल आयात को लेकर अमेरिकी प्रतिबंध के पड़ने वाले असर से निपटने के लिए तैयार है।

भारत के समक्ष परीक्षा की घड़ी है क्योंकि ईरान और अमेरिका दोनों भारत के मित्र हैं। जहां ईरान के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंध भी रहे हैं और हमारा मित्र रहा है वहीं विगत कुछ दशकों से अमे​िरका के साथ भी करीबी बढ़ी है। अमेरिका ने पाकिस्तान पर लगाम कसी है। मसूद अजहर मामला समेत कई मोर्चों पर हमारा साथ दे रहा। यूएनएससी, एनएसजी में सदस्यता मामले में भी हमारा मददगार हो सकता है। ऐसे में भारत के समक्ष चुनौती यह है कि वह अपने दोनों दोस्तों के बीच किस तरह सामंजस्य बिठाए ताकि दोनों संतुष्ट रह सकें और भारत का राष्ट्रीय हित भी हो सके।

Download our app