अर्थव्यवस्था में हताशा का माहौल

महीने भर में ही जिस तरह से महंगाई का ग्राफ तेजी से बढ़ा है, उससे स्पष्ट है कि नए वर्ष में भी आम आदमी को कोई राहत मिलने वाली नहीं है। सब्जियों के दाम तो बढ़े ही हैं, बल्कि दालों और अन्य वस्तुओं के दाम भी काफी बढ़ चुके हैं। 
भारतीय स्टेट बैंक की शोध इकाई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इसी माह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर 8 फीसदी से ऊपर जा सकती है। 

एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट ने यह कह कर लोगों में हताशा फैला दी है कि चालू वित्त वर्ष में नई नौकरियों के अवसर एक साल पहले की तुलना में 16 लाख कम सृजन होने का अनुमान है। उद्योग जगत में छाई सुस्ती की वजह से नए श्रमिकों की मांग घटी है। कई कम्पनियां दिवालिया प्रक्रिया का सामना कर रही हैं जिनके समाधान में देरी की वजह से ठेके पर श्रमिकों की भर्ती में बड़ी गिरावट आई है। 

असम, बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में नौकरी, मजदूरी के लिए बाहर गए व्यक्तियों की ओर से घर भेजे जाने वाले धन में कमी आई है। देश की आर्थिक वृद्धि की सुस्त पड़ी रफ्तार के बीच थोक महंगाई दर में आए बड़े उछाल से सरकार के लिए चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं। महंगाई के आसमान छूने से आम आदमी के घर का बजट बढ़ गया है। 

आम आदमी इसकी भरपाई खपत में कटौती करके करेगा। जबकि सरकार अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज करने के लिए मांग बढ़ाने पर जोर दे रही है, उसके लिए यह सब करना मुश्किल होगा क्योंकि जब आम आदमी की जेब में बचत कुछ नहीं रहेगी तो फिर खपत बढ़ेगी कैसे? रोजगार के अवसरों की कमी और वेतन बढ़ौतरी को लेकर अनिश्चितता का माहौल सरकार की राह में बड़ी बाधा है। 

आर्थिक सुस्ती की वजह से बाजार में हताशा का माहौल है। इसमें काेई संदेह नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था मंदी के भंवर में फंसती जा रही है। आंकड़ों से पता चलता है कि 2018-19 में प्रति व्यक्ति मासिक आय 10534 रुपए रही। अगर देश की जीडीपी 5 फीसदी से बढ़ेगी तो 526 रुपए और चार फीसदी से बढ़ेगी, 421 रुपए प्रति व्यक्ति सालाना आय में वृद्धि होगी। इसका अर्थ यही है कि एक फीसदी गिरावट से सालाना 1264 रुपए की आमदनी में कमी आएगी। अगर 2020 में ​विकास दर 5 फीसदी से ही आगे बढ़ती है तो मोदी सरकार का 2024 में भारत की जीडीपी को 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य दूर की कौड़ी ही साबित होगा।

आटो, कपड़ा, सूक्ष्म, लघु व मध्यम, रियल स्टेट, एफएमसीजी में नौकरियों के जाने, कम्पनियों में घाटा बढ़ने या बंद होने के समाचार लगातार मिल रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था ग्लोबल होने की वजह से वैश्विक व्यापार में मंदी और अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के असर से देश की अर्थव्यवस्था भी अछूती नहीं रही। रिजर्व बैंक ने तो पहले ही इस बात की आशंका व्यक्त कर दी थी कि महंगाई बढ़ेगी तो फिर सरकार का महंगाई प्रबंधन कौशल कहां गया? खुदरा और थोक महंगाई दर बढ़ने से रिजर्व बैंक के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। इसका सबसे बड़ा असर यह होता है कि रिजर्व बैंक के सामने नीतिगत दरें बढ़ाने के सभी रास्ते बंद हो गए हैं। जब महंगाई बढ़ती है तो बैंक पर नीतिगत दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ जाता है। आटो और होम लोन सस्ता होने की सम्भावनाएं खत्म हो जाती हैं।

पिछले महीने भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत राय के नेतृत्व वाली कमेटी ने ब्याज दरों को यथावत बनाए रखने का फैसला किया था। इससे पहले रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था को गति देने के मकसद से कई बार ब्याज दरों में आधार अंकों में कटौती कर चुका है। फरवरी में होने वाली इस कमेटी की बैठक में ब्याज दरों में कटौती या विचार होने की कोई सम्भावना नहीं। नीतिगत दरों में परिवर्तन की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है। केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को अपने बजट का ड्राफ्ट इस ढंग से तैयार करना होगा, जिससे अर्थव्यवस्था की कुछ तस्वीर बदले। पिछले कुछ वर्षों में न्यूनतम विकास दर की चिंताओं के बीच देश में बड़े बदलावों की उम्मीद है। मगर अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दे चिंता बढ़ाने वाले हैं।
अगर देश के सियासी माहौल की बात करें तो ऐसा लगता है-
‘‘कौन रोता है किसी और की खातिर ए दोस्त
सबको अपनी ही किसी बात पर रोना आया।’’
ऐसा लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था पर गम्भीर बातचीत नहीं हो रही, सब अपने-अपने एजैंडे पर बोल रहे हैं। देश असंतोष में जकड़ा हुआ प्रतीत होता है। धरने, प्रदर्शन और बंद भी किसी न किसी तरीके से अर्थव्यवस्था को ही नुक्सान पहुंचाते हैं। ऐसी स्थिति में सवाल यह है कि उच्च आर्थिक विकास के लिए पुश कहां से आएगा।

सार्वजनिक निवेश एक ऐसा क्षेत्र है जो अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर सकता है, लेकिन भारत अपना वित्तीय  दृष्टिकोण ढीला करने को तैयार नहीं। सरकार की कमाई घट रही है और वह फिर रिजर्व बैंक के आगे सरप्लस मनी के लिए गुहार लगा रही है। देखना होगा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपने दूसरे बजट में चुनौतियों का सामना कैसे करती हैं।

-आदित्य नारायण चोपड़ा
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