बाबरी विध्वंस का मुकदमा

12:08 AM Sep 18, 2020 | Aditya Chopra
बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने के मुकदमे में आगामी 30 सितम्बर को फैसला आयेगा। यह स्वयं विरोधाभास ही कहा जायेगा कि जिस स्थान पर यह मस्जिद खड़ी हुई थी अब वहां पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के तहत राम मन्दिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ हो चुका है।

अर्थात इस भूमि के विवाद का निपटारा हो चुका है।  इसके निपटारे का आधार ही इस भूमि पर मालिकाना हकों का न्यायिक परीक्षण था।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इसे हिन्दू धर्मावलम्बियों को देना उचित समझा और इसकी एवज में मुस्लिम मतावलम्बियों को अलग से भूमि आवंटन करने का आदेश दिया मगर यह प्रश्न अपनी जगह तार्किक है कि क्या बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए कोई आपराधिक षड्यन्त्र किया गया था।

प्रश्न यह भी है कि किसी धार्मिक स्थल के बारे में दो धर्मों के मतावलम्बियों के बीच विवाद हो जाने पर उसे एक मत के समर्थकों द्वारा ढहाया जाना क्या भारत के संविधान के अनुसार आपराधिक कार्य नहीं था? बाबरी विध्वंस मामले की जांच के लिए गठित लिब्राहन आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एम.एस. लिब्राहन ने अपनी रिपोर्ट में इस विध्वंस में शामिल राजनीति​क नेताओं को छद्म उदारवादी तक बताया था  और बाद में एक साक्षात्कार में यहां तक कहा था कि जब तक  विध्वंस मामले में चल रहे मुकदमे का फैसला नहीं हो जाता तब तक राम जन्म भूमि विवाद पर कोई न्यायिक फैसला नहीं आना चाहिए।

इस मुकदमे में भारत सरकार में कैबिनेट मन्त्री तक रहे कई नेता शामिल हैं। जिनमें पूर्व उपप्रधानमंत्री  श्री लालकृष्ण अडवानी से लेकर डा. मुरली मनोहर जोशी और सुश्री उमा भारती तक शामिल हैं। इनके अलावा पूर्व मुख्यमन्त्री व राज्यपाल कल्याण  सिंह व सांसद साक्षी महाराज आदि भी हैं।

पूरे मुकदमे में कुल 354 गवाहों की तसदीक सीबीआई न्यायालय ने की है और उसके बाद वह अपने फैसले पर पहुंचा है। हालांकि यह कोई नहीं जानता कि अदालत का फैसला क्या होगा मगर यह सच हर भारतवासी के सामने है कि मन्दिर जायज तौर पर वहीं बन रहा है जहां कभी विवादास्पद मस्जिद थी।

भारत के धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक ढांचे के अनुसार ऐसा कोई भी कृत्य भारत की एकता व अखंडता के लिए खतरा होता है जिससे किन्हीं दो समुदायों के बीच शत्रुता भाव पैदा हो। मगर सर्वोच्च न्यायालय के राम जन्मभूमि फैसले को सभी समुदायों और वर्गों ने सहर्ष स्वीकार किया है और अपनी सारी रंजिश छोड़ दी है।

इस आलोक में हमें सारे मामले को देखना ही होगा क्योंकि अन्त में यह मामला भारत की एकता व अखंडता से जाकर ही जुड़ता है।  बेशक कल्याण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उनके रहते ही बाबरी मस्जिद का विध्वंस 6 दिसम्बर, 1992 को हुआ था और यह तब हुआ था जब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को आश्वासन दिया था कि उनके पद पर रहते बाबरी मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंच सकता।

इस घटना के बाद उनकी सरकार भी बर्खास्त कर दी गई थी और उन्होंने सजा भी भुगती थी। मगर एक दूसरा पक्ष भी बहुत महत्वपूर्ण है कि राम मन्दिर आन्दोलन को चलाने वाले श्री लालकृष्ण अडवानी ने लिब्राहन आयोग के समक्ष ही अपनी गवाही में कहा था कि मस्जिद का ढहना उनके जीवन का बहुत बुरा दिन था।

उन्हें अपेक्षा नहीं थी कि ऐसा भी हो सकता है  जाहिर है यह कृत्य धार्मिक उत्तेजना से भरे उन मन्दिर समर्थकों द्वारा किया गया था जिन पर किसी भी नेता का नियन्त्रण खत्म हो गया था परन्तु यह अपराध तो था ही इस सच से भी मुकरा नहीं जा सकता है।

भारत संविधान से चलने वाला देश है और इसके संविधान के समक्ष हर छोटे-बड़े व्यक्ति की हैसियत एक बराबर होती है, अतः मुकदमे का चलना तार्किक तो था ही और अब अदालत के फैसले का सम्मान करना भी प्रत्येक भारतीय का धर्म है।  इस लिहाज से देखा जाये तो पूरे प्रकरण में कोई विरोधाभास नहीं है क्योंकि जो कार्य हुआ यदि वह गैरकानूनी था तो उसकी सजा तय होनी ही चाहिए मगर इसके साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि भारत की वह मूल आस्था अक्सर बुलन्द रहे जिसे संविधान कहा जाता है।

संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए ही राम मन्दिर के निर्माण का कार्य शुरू हुआ है और इसी संविधान की मर्यादा की खातिर बाबरी विध्वंस के दोषियों पर मुकदमा चला है। हम यदि  दोनों को इकट्ठा करके देखते हैं तो कहीं न कहीं संवैधानिक मर्यादाओं से बाहर जाते हैं क्योंकि इस प्रकरण के राजनीतिक आयाम भी हैं।

बेशक राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन एक धार्मिक आन्दोलन था परन्तु यह राजनीतिक छत्रछाया में ही पनपा था। अतः भारत की आने वाली पीढि़यों के लिए भी हमें ऐसी नजीरें छोड़नी होंगी जिससे इस देश में धार्मिक भाईचारे को कभी कोई खतरा पैदा न हो सके। यह देश का सौभाग्य है कि राम जन्म भूमि विवाद का निपटारा सर्वोच्च न्यायालय ने भारत की सांस्कृतिक मान्यताओं के तथ्यों की दृष्टि से किया।


-आदित्य नारायण चोपड़ा