कटुता बढ़ाती चुनावी बयार!

लोकसभा चुनावों के सातवें चरण के करीब आते-आते राजनीतिक माहौल में जिस तरह की कटुता, कड़वापन और कलुिषता अपनी चरम सीमा पर पहुंची है, उससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि ये पूरे चुनाव किस दिमागी ​दिवालियेपन के दौर से गुजर कर आगामी 19 मई को अपनी मंजिल पर पहुंचेंगेे। सवाल किसी एक पार्टी के किसी एक नेता का नहीं है बल्कि ऐसा कहा जा सकता है कि पूरे कुएं में ही भांग मिला दी गई है और नशे को भरी गर्मियों में चल रहे मतदान में ‘शीतल पेय’ बना दिया गया है, परन्तु इस विषैली हवा के बीच कांग्रेस नेता श्रीमती प्रियंका गांधी ने उस ठंडे झोंके का नजारा भी पेश कर दिया जो इस देश की राजनीति की कभी विशेषता माना जाता था। उन्होंने मध्य प्रदेश में अपने प्रचार के दौरान सड़क किनारे ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाते भाजपा कार्यकर्ताओं से अपनी कार से उतर कर हाथ मिलाया और उनके अपने उद्देश्य में सफल होने की कामना की।

सितम यह है कि ताजा माहौल में यह ‘हादसा’ जैसा ही लग रहा है। खैर, लोकतन्त्र में ऐसी हालत तब पैदा होती है जब राजनीतिक दलों की बुद्धि जनता की बुद्धि के सामने मात खाने लगती है। ये चुनाव इसी हकीकत का 23 मई को बयान करेंगे और सिद्ध करेंगे कि जब राजनीतिक दल एजेंडा तय करने में विफल हो जाते हैं तो मतदाता स्वयं आगे बढ़कर एजेंडा तय कर देते हैं। विगत 11 अप्रैल से शुरू हुए इन चुनावों में जिस तरह मतदाताओं को हवाबाजी के मुद्दों पर उलझाने की कोशिश की गई है उसमें सबसे बड़ा तथ्य यह निकल कर सामने आया है कि राजनीतिज्ञों के पास आम जनता को देने के लिए कुछ नहीं है, वे केवल आपस में ही अपना हिसाब-किताब कर रहे हैं।

भारतीय लोकतन्त्र की ताकत बेशक इसकी स्वतन्त्र न्याय प्रणाली से लेकर कार्यपालिका, विधायिका व स्वतन्त्र मीडिया है, मगर पूरी तरह ‘अराजनीतिक’ सेना इसका ऐसा सुरक्षा कवच है जो युद्ध से लेकर शान्ति के समय तक संविधान सम्मत व्यवस्था की हिफाजत करता है। यह बेसबब नहीं है कि गणतन्त्र दिवस 26 जनवरी के दिन भारत की सेनाएं राष्ट्रपति को सलामी देती हैं जो कि जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा ही पांच साल के लिए चुने जाते हैं, इसका मतलब यही है कि भारत की सेनाएं पूरी शक्ति के साथ गणतान्त्रिक प्रणाली की सुरक्षा में सन्नद्ध हैं, परन्तु उनका सम्बन्ध उस राजनीतिक ताने-बाने से दूर-दूर तक नहीं है जो इस गणतन्त्र की शासकीय व्यवस्था को बुनता है। उनका सम्बन्ध संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति की कमांडरी में अपने दायित्व का निर्वाह करना है और राष्ट्रपति की हर वह सरकार उनकी ‘अपनी’ सरकार होती है जिसे भारत की आम जनता अपने एक वोट के अधिकार से चुनती है, इसका राजनीतिक चरित्र कुछ भी हो सकता है।

मसलन यह कांग्रेस या भाजपा अथवा गठबन्धन की सरकार भी हो सकती है। यह बेमिसाल और नायाब लोकतान्त्रिक व्यवस्था जब हमारे संविधान निर्माता हमें सौंप कर गये हैं तो राजनीतिक लाभ के लिए इसे विवादों में घसीट कर हम आने वाली पीढि़यों के लिए क्या उदाहरण पेश करना चाहते हैं? चुनावों के परिणाम चाहे जो भी निकलें मगर इतिहास में यह दर्ज हो चुका है कि 17वीं लोकसभा के चुनाव आम जनता के मुद्दों से हटकर लड़े गये। मगर गजब का खेल चल रहा है। चुनावों में वे मुद्दे उभर रहे हैं जिनका सम्बन्ध इतिहास से ही है। यह निश्चित है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी। वह आतंकवादी था इसमें भी किसी राष्ट्रभक्त नागरिक को कोई सन्देह नहीं हो सकता।

वह हिन्दू था इस हकीकत से भी कोई इन्कार नहीं कर सकता मगर उसके हिन्दू होने से पूरे हिन्दू समाज को आतंकवादी कैसे घोषित किया जा सकता है? इस बारे में 27 फरवरी, 1948 को सरदार पटेल का पं. जवाहर लाल नेहरू को लिखा पत्र पढ़ा जाना आवश्यक है जिसमें उन्होंने लिखा था कि हिन्दू महासभा के नेता दामोदर सावरकर का शिष्य नाथूराम गोडसे घृणा और नफरत के अतिवादी विचारों से प्रेरित था। यह एेतिहासिक दस्तावेज है जिसे कोई नहीं बदल सकता। अतः यह सही है कि नाथूराम गोडसे स्वतन्त्र भारत का प्रथम आतंकवादी था और हिन्दू था मगर इसे ‘हिन्दू आतंकवाद’ कभी नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह एक ऐसे हत्यारे का कृत्य था जो गांधी को मिटाकर अपने हिन्दू होने का प्रमाण देना चाहता था।

इसी प्रकार आजकल चल रहे आतंकवाद में अधिसंख्य मुस्लिम नाम आते हैं मगर इसे इस्लामी आतंकवाद नहीं कहा जा सकता, बेशक इस्लाम के नाम पर गफलत फैला कर कुछ सिरफिरे लोग दहशतगर्दी फैला रहे हैं मगर इससे आम मुसलमान का क्या लेना-देना है, वह तो स्वयं उनके अत्याचारों का शिकार है। दहशतगर्दों का कोई मजहब किस तरह हो सकता है और इसे जेहाद या धर्म युद्ध कैसे कहा जा सकता है। जो स्वयं अन्यायी या आतताई है वह कौन सा युद्ध लड़ सकता है ? मगर इस विचारधारा के लोग हर समुदाय में होते हैं। पिछले महीने न्यूजीलैंड की एक मस्जिद में एक आस्ट्रेलियाई ईसाई व्यक्ति ने बम विस्फोट करके लोगों को मार डाला। क्या इसे हम ईसाई आतंकवाद कहेंगे? लेकिन इसके बावजूद श्री कमल हासन जैसे व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह किसी एक घटना को ‘हिन्दू आतंकवाद’ कह सकते हैं। चुनावी मौसम में बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती अतः उन्हें तुरन्त स्पष्टीकरण जारी करना चाहिए।

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