कालेधन की नकाबपोशी खत्म

भारत में कालेधन को लेकर दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ब्रिटिश काल के समय से ही भारी संशय का माहौल रहा है जो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद विरासत में इसे मिला परन्तु संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था के दौर में लोकतान्त्रिक राजनैतिक प्रणाली के तहत जिस तरह भ्रष्टाचार का सीधा सम्बन्ध चुनाव प्रणाली से होता चला गया, उसने संशय के वातावरण को इतना गहरा कर दिया कि इसके तार विदेशी बैंकों खासकर स्विस बैंकों से जुड़ने लगे। दरअसल अंग्रेजों ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में सेना को विभिन्न वस्तुओं की सप्लाई करने के कारोबार में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए ‘विशेष दिल्ली पुलिस अधिनियम’ को लागू करके जो ‘विशिष्ट प्रकोष्ठ’ बनाया था उसे ही 1963 में संशोधित करके तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने केन्द्रीय जांच ब्यूरो या ‘सीबीआई’ का नाम दिया। 

यह संयोग ही कहा जायेगा कि सीबीआई की स्थापना 1962 में हुए चीन से युद्ध के बाद की गई परन्तु जैसे-जैसे भारत में चुनाव लगातार खर्चीले होते गये वैसे-वैसे ही भ्रष्टाचार की विभीषिका भी तेज होती गई परन्तु यह तस्वीर का एक पहलू है जो परोक्ष रूप से राजनीति से जुड़ा हुआ है। दूसरा पहलू प्रत्यक्ष है जो दैनिक व्यवहार की ‘राजनैतिक-प्रशासनिक’ प्रणाली के तन्त्र से जुड़ा हुआ है जिसमें सरकारी खजाने से सीधे धन का खर्च कार्यपालिका (ब्यूरोक्रेसी) की मार्फत होता है। अतः कालेधन का सृजन इस व्यवस्था का अन्तर्निहित अंग राजनैतिक आश्रय में ही बना, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं। 

इस व्यवस्था में व्यापारी या वाणिज्य अथवा उद्योग जगत को स्वयं को जीवन्त बनाये रखने के लिए पूरे तन्त्र से समझौता या इसका लाभ उठाकर ही चलना होता है। अतः उसने इस प्रणालीगत भ्रष्टाचार को और अधिक बढ़ाकर अपना रास्ता सुगम बनाया और अपने लिए सुरक्षा भी तलाश की जिससे भ्रष्टाचार संस्थागत रूप लेता गया और दैनिक जीवन का अंग बन गया। अतः 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद से जब देश में कालेधन के खिलाफ मु​िहम का वातावरण लोकसभा में तत्कालीन विपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण अडवानी ने बनाना शुरू किया तो आम जनता ने इसे भारी उत्सुकता से देखा और स्विस बैंकों में भारतीयों के कालेधन रखे होने की गूंज सड़कों पर सुनाई देने लगी किन्तु 2009 के लोकसभा चुनावों में मनमोहन सरकार के पुनः शानदार तरीके से सत्ता पर काबिज होने के बाद जब पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी वित्त मन्त्री बने तो विपक्षी पार्टियों ने पुनः कालेधन का मुद्दा उठाना शुरू किया। 

2011 के आते-आते बहुचर्चित और विवादित ‘विकीलीक्स’ ने अपुष्ट रहस्योद्घाटन किया कि भारत के सरनाम राजनीतिज्ञों समेत कुछ व्यापारियों के 20 स्विस बैंक खाते हैं जिनमें लाखों करोड़ डालर की धनराशि जमा है।विकीलीक्स ने भारत में ऐसा वातावरण बनाया कि मानों भारत के राजनीतिज्ञ अपने देश का धन चोरी करके विदेशों में जमा करने वाले बेइमान हैं। इससे स्विस बैंक खातों का रहस्य गहराने लगा और भारत की सरकार पर दबाव बढ़ने लगा कि वह उन भारतीयों के नाम जाहिर करे जिनके स्विस बैंक में खाते हैं। अतः श्री प्रणव मुखर्जी ने इस चुनौती को संसद में खड़े होकर स्वीकार किया और ऐलान किया कि वह कालेधन पर एक ‘श्वेत पत्र’ संसद में ही प्रस्तुत करेंगे जिससे जनता के सामने दूध का दूध और पानी का पानी साफ हो जायेगा। 

कयासों पर वह कोई टिप्पणी करना उचित नहीं मानते हैं। विकीलीक्स ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि स्विस बैंकों में सबसे ज्यादा धन भारतीयों का ही रखा हुआ है जिसकी वजह से भारत में तरह-तरह की कहानियां तैरने लगीं परन्तु यह सब ‘शेख चिल्ली’ का ख्वाब ही साबित हुआ। मई 2012 में संसद में जब वित्त मन्त्री की हैसियत से प्रणव दा ने श्वेत पत्र रखा तो ऐलान किया कि भारत की वर्तमान संसद के किसी भी सदस्य का खाता स्विस बैंक में नहीं है और किसी अन्य राजनीतिज्ञ का नाम भी नहीं है। स्विट्जरलैंड की सरकार के साथ भारत की सरकार ने बैंक सूचनाएं देने के लिए समझौता किया है परन्तु इसके लिए स्विट्जरलैंड की सरकार को अपने देश की संसद से सहमति लेनी होगी क्योंकि इस देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग उसकी बैंकिंग प्रणाली है। 

स्विट्जरलैंड की लोकतान्त्रिक प्रणाली के तहत उसकी नगरपालिका स्तर की चुनी हुई परिषदों में नये बैंकिंग कानून को पारित करना पड़ेगा जिसमें काफी लम्बा समय लग सकता है परन्तु स्विट्जरलैंड की सरकार भारत के साथ सूचना के आदान-प्रदान के लिए सिद्धान्ततःराजी हो गई है। प्रणव दा ने ये सब तब लोकसभा में खड़े होकर ही कहा था और श्वेत पत्र प्रस्तुत करते हुए  कहा था कि भारत सरकार विदेशों में भारतीयों की रखी हुई 36 हजार करोड़ की धनराशि वापस लाने में सफल रही है परन्तु भारत की सड़कों पर कालेधन को लेकर रोजाना नये-नये शगूफे छोड़े जाने के जवाब मंे उन्होंने जो कहा उसे आज याद करने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि 2014 में सत्ता में आयी मोदी सरकार ने कालेधन के मामले में ठीक वही रास्ता अख्तियार किया जो प्रणव दा ने किया था। 

उन्होंने तब कहा था कि यदि विपक्षी नेता विदेशों से कालाधन लाने के लिए इतने आक्रामक हो रहे हैं तो ‘क्या मैं उस देश में फौज भेजकर वहां की सरकार से धन वापस ले आऊं?’ उन्होंने तब संसद में खड़े होकर यह चुनौती फेंकी थी तो पूरा सदन सकते में आ गया था और विपक्षी नेता बगले झांकने लगे थे। उन्होंने कहा था कि किसी भी दूसरे सार्वभौम देश के साथ व्यावहारिक नियमावली के तहत ही भारत की सरकार आगे बढ़ सकती है। अतः वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय व द्विपक्षीय समझौतों व सहयोग के चलते हम 36 हजार करोड़ रुपये की धनराशि भारत वापस ले आये हैं। यह धनराशि वह थी जिसे भारत से कर या शुल्क चोरी करके विदेशों में जमा कर दिया गया था परन्तु केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद विदेशों से कालाधन वापस लाने के मुद्दे पर इस सरकार ने भी ठीक वही रास्ता अख्तियार किया जो श्री मुखर्जी दिखा कर गये थे और ‘टैक्स हैवंस’ कहे जाने वाले देशों के साथ सूचना आदान-प्रदान के समझौते किये। 

स्व. अरुण जेटली के रहते जब एचएसबीसी बैंक के खातों का मामला आया तो दूसरे देश के साथ बन्धी शर्तों के मुताबिक खाताधारियों का नाम नहीं खोला गया क्योंकि शर्त यह थी कि भारत का नियम भंग करने पर ही अदालत उसके नाम का खुलासा कर सकती थी। स्व. अरुण जेटली ने बहुत स्पष्ट कानूनी रुख लिया था। अतः स्विस बैंक ने अब भारत को जो खाताधारकों की सूची भेजी है उसकी तसदीक सरकार करके पता लगा सकती है कि कितना धन काले खाते का है और कितना सफेद खाते का।
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