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रोटी के बदले जिस्म!

रोटी के  बदले जिस्म!
‘‘क्यों नहीं हवा का तेज झोंका आता और
हैवान को अपने साथ उड़ा ले जाता
क्यों नहीं हाथियों का एक झुंड आता और
हैवान को अपने पैरों तले कुचल देता
क्यों नहीं वज्रपात होता और
हैवानियत का खेल धरा रह जाता
क्यों नहीं धरती मां का हृदय फट जाता और
मेरा शरीर उसमें समा जाता
क्यों सृष्टि ऐसे हैवान की रचना करती
जिसकी हैवानियत की कोई सीमा नहीं!
सृष्टि शांत क्यों है-सृष्टि शांत क्यों है।’’
उत्तर प्रदेश के हैवान एक-एक करके सामने आ रहे हैं। कानपुर के बिकरू गांव में 8 पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद अपराधी एक-एक करके मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं। हत्यारे जगह-जगह छिपने की कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन समाज में जगह-जगह हैवान हैं।
कहते हैं गरीबी और लाचारी एक ऐसा अभिशाप है जो इंसान को कुछ भी करने पर मजबूर कर देता है। पेट की भूख मिटाने को पढ़ने-लिखने की उम्र में लड़कियां मजदूरी कर रही हैं लेकिन इन सबके बीच हैवान उन्हें काम देने के बदले में उनके जिस्म से भी खेल रहे हैं। यह मामला उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में सामने आया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां पहाड़ों पर पत्थर तोड़ने के लिए लगाए गए क्रैशर में काम करने वाली कम उम्र की लड़कियों के जिस्म के साथ ​घिनौना खेल खेला जा रहा है। यहां काम पाने के बदले उन्हें रोजाना अपना जिस्म ठेकेेदारों और उनके गुर्गों को सौंपना होता है। जब लड़कियां खदान में जाकर काम मांगती हैं तो वहां के लोग कहते हैं कि शरीर दो तभी काम मिलेगा। ये लड़कियां परिवार को पालने का बोझ अपने कंधों पर उठा रही हैं। मेहनताने के लिए उन्हें अपने तन का सौदा करना पड़ता है। कुछ बोलती हैं तो फिर पहाड़ से फैंकने की धमकियां मिलती हैं। लड़कियों की दास्तान सुनकर किसी को भी रोना आ जाएगा। पहले मुजफ्फरपुर, फिर देवरिया, फिर कानपुर के बाल संरक्षण गृह और अब चित्रकूट की खदानों में महापाप की हकीकत सामने आ चुकी है। हैरानी की बात तो यह है कि पुलिस और प्रशासन खबरिया चैनल की रिपोर्ट के बाद ही क्यों जागा? पुलिस आैर प्रशासन को क्या क्षेत्र में चल रहा है, इस संबंध में कोई जानकारी नहीं थी?
अब प्रशासन की नींद उड़ चुकी है। आधी रात को प्रशासनिक अमले ने गांव में डेेरा डाल दिया। जिस प्रशासन को कभी दिन के उजाले में इन बेटियों का दर्द नहीं दिखा वो प्रशासन रात के अंधेरे में ही उनके गांव पहुंच गया। मामले की मैजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दे दिए गए हैं। मीडिया ने एक बार फिर अपनी भूमिका निभा दी है। लड़कियों के यौन शोषण की घटनाओं के विभिन्न आयाम हैं जिसके कारण पीड़िताओं को शारीरिक और मानसिक रूप से आघात सहने पड़ते हैं। यौन शोषण कोई नई समस्या नहीं। ये समस्या 1970 और 1980 के दशक के बाद एक सार्वजनिक मुद्दा बन गई है। उस दौर में तो ऐसे मामलों में एफआईआर तक नहीं लिखी जाती थी। पीडि़ताओं को समाज में बदनामी का डर दिखा कर खामोश रहने के लिए मजबूर कर दिया जाता था। समाज में खामोश रहने की मानसिकता बुरे लोगों को प्रोत्साहित करने का काम करती रही। फिर यही लोग समाज की कमजोरियों का लाभ उठाते रहे। हैवान तो अपनी दबी यौन कुंठा एवं विकार से ग्रस्त होने के कारण एेसा करते हैं। 
यूं तो देश में कई माफिया हैं-भूमाफिया, खनन माफिया, बिल्डर माफिया, शराब माफिया लेकिन खनन माफिया काफी दुर्दांत है। हरेक माफिया को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। माफिया पनपता ही तब है जब उसे राजनीतिज्ञों का बरदहस्त प्राप्त होता है और अफसरों की पूरी सांठगांठ होती है। देश के खनन माफिया के हाथ बहुत लम्बे हो चुके हैं। इनके लिए कोई भी कुकर्म करना आसान होता है क्योंकि इनकी दबंगई के आगे कोई कुछ नहीं बोलता। चित्रकूट की लड़कियों ने कितनी पीड़ा सही होगी कि उन्होंने कैमरे के सामने अपना सारा दर्द बयान कर दिया। कई ऐसी भी होंगी जो सिसक-सिसक कर झोपड़ियों में दुबक कर रहने को मजबूर होंगी। निर्भया कांड के बाद हुई सामाजिक क्रांति ने सत्ता की चूलें हिला दी थीं। सामाजिक क्रांति के अगुआ रायसिना हिल्स पर राष्ट्रपति भवन के प्रवेश द्वार तक पहुंच गए थे। ऐसा आंदोलन चला कि सत्ता को यौन अपराधियों के लिए कानून को सख्त बनाना पड़ा। अब सवाल यह है कि गरीबों की बेटियों के लिए क्या देश में कोई सामाजिक आंदोलन होगा। दोषियों को दंडित करने के लिए चित्रकूट की धरती पर लोग सामने आएंगे क्योंकि खनन माफिया बहुत प्रभावशाली और ताकतवर है। अब परीक्षा पुलिस प्रशासन की है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार राज्य को अपराध मुक्त बनाने के लिए कड़े कदम उठा रही है। अब उसे अपराधियों के साथ समाज में हैवानों से भी निपटना होगा। देश की बेटियों के साथ ऐसी क्रूरता स्वस्थ लोकतंत्र में असहनीय है। दोषियों को सजा देनी ही होगी क्योंकि समाज में उनका रहना खतरनाक होगा। उनकी जगह जेल की सलाखों के भीतर ही है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि समाज की मानसिकता बदले तो कैसे बदले।
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