Diljit Dosanjh की 'सतलुज' फिल्म में छुपा है प्रोपेगेंडा, जानें क्या है पूरी सच्चाई?
दिलजीत दोसांझ स्टारर फिल्म सतलुज को लेकर अलग-अलग तरह की कॉन्ट्रोवर्सी आए दिन सुनने को मिल रही है। लेकिन आखिर इन कॉन्ट्रोवर्सी के पीछे की सच्चाई क्या है और क्या सतलुज फिल्म सच में रियल लाइफ इंसीडेंट पर बनी है या उसके पीछे भी कोई प्रोपेगेंडा छुपाया जा रहा है। इस तरह के कई सवाल सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। तो चलिए उनके जवाब हम आपको आज दे देते हैं।
क्या थी जसवंत सिंह खालड़ा की सच्चाई?

लेकिन जवाब जानने से पहले आपको ये पता होना चाहिए कि इस फिल्म में जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी दिखाई गई है। वहीं जसवंत सिंह खालड़ा जिसनें 1995 के एक इंटरव्यू में आतंकवादी भिंडरान वाले को संत और नेशनल हीरो बोला था। लेकिन फिल्म में इस कैरेक्टर को इस तरह से पेश किया गया है, जैसे मानों इससे बेहतर सोशल एक्टीविस्ट और कोई था ही नहीं।
इसी के साथ जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे इमोशनल सीन भी दिखाए गए, जिसनें लोगों को उनके प्रति सहानुभूति देने के लिए मजबूर कर दिया। पर क्या आप जानते हैं कि आखिर ये आतंकवादी भिंडरान वाले कौन था?, जिसकी तारीफ करते हुए जसवंत सिंह खालड़ा थक नहीं रहा था। अगर नहीं तो चलिए हम आपको बताते हैं।
खालिस्तानियों को था पाकिस्तान का पूरा सपोर्ट

देखिए 1980 के दौरान पंजाब में एक अलग देश यानी खालिस्तान की मांग को लेकर एक आर्म्ड इंसर्जेंसी चल रही थी और यह कोई अकेले अंदर की लड़ाई नहीं थी। ये जो मूवमेंट था इसको पाकिस्तान की आईएसआई से पूरा सपोर्ट था। आईएसआई का इसमें बहुत बड़ा रोल था और यह कोई कांस्परेसी थ्योरी नहीं है। यह मल्टीपल एकेडमिक और मेन स्ट्रीम सोर्सेस में डॉक्यूमेंटेड है। आईएसआई ने लाहौर और कराची में इन खालिस्तानी मिलिटेंट्स के लिए ट्रेनिंग कैंप खोले। बब्बर खालसा इंटरनेशनल खिस्तान कमांडो फोर्स, खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स, आईएसवाईएफ इन सबको हथियार, पैसा और ट्रेनिंग सब कुछ पाकिस्तान से मिला।
AK-47 राइफल, एक्सप्लोसिव यह सब बॉर्डर पार करके आ रहे थे। यहां तक कि आईएसआई के पूर्व चीफ हामिद गुल ने खुद एक इंटरव्यू में माना था कि सिख सेपरेटिस्टों को पाकिस्तान ने अपने कांटेक्ट्स के थ्रू हथियार दिलवाए थे। अब खिस्तानी आतंकवाद था क्या? इसका अंदाजा लगाने को मैं आपको कुछ घटनाएं और आंकड़े बताता हूं।
आप खुद समझ जाएंगे। 23 जून 1985 में एयर इंडिया की फ्लाइट 182 लोगों के साथ कनिष्क मॉन्ट्रियल से लंदन होते हुए आ रही थी। आयरलैंड के तट के पास 31,000 फीट पे इसमें एक बम फटता है और पूरा प्लेन समुंदर में गिर जाता है। सवार सारे 329 लोग मारे जाते हैं। जिनमें 82 बच्चे थे जिनकी उम्र 12, 13 साल से भी कम थी।
बब्बर खालसा ग्रुप से जुड़े लोगों को खालड़ा ने किया था सपोर्ट

इस घटना का जिम्मेदार बब्बर खालसा से जुड़े लोग और मास्टरमाइंड माना गया तलविंदर सिंह परमार को बताया गया। 1991 से पहले तक ये दुनिया का सबसे बड़ा असेसिनेशन टेरर अटैक था। जिसमें एक भी आदमी जिंदा नहीं बचा था। फिर 10 नवंबर 1989 पटियाला का थापर इंजीनियरिंग कॉलेज यहां केसीएफ के आतंकवादी 19 स्टूडेंट्स को मार देते हैं और 15 जून 1991 को लुधियाना के पास दो ट्रेनें इमरजेंसी चैन खींच के रोकी जाती है और हर डिब्बों में जाकर हिंदू पैसेंजर्स को पहचान के मारा जाता है, लेकिन सिखों को छोड़ दिया जाता है।
उस एक रात में आंकड़ा सोर्सेस के हिसाब से 80 से 110 हिंदुओं तक जाता है। अब एक पैटर्न यहां पकड़ में आता है, कि चाहे कोई भी जगह क्यों ना हो। हर जगह पर भीड़ में से धर्म पूछकर, हिंदुओं को अलग करो और उन्हें मार दो और यह कोई इक्का दुक्का घटनाएं नहीं थी, साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के आंकड़ों के हिसाब से इस पूरे दौर में सिख मिलिटेंट ग्रुप्स के हाथों 11,694 सिविलियंस मारे गए थे। जिनमें 5000 के करीब तो अकेले हिंदू थे और बाकी बचे सिख थे। वो सिख जो खालिस्तान को सपोर्ट नहीं करते थे।
क्या था आतंकवादियों का प्लान?

यानी यह आतंक ना हिंदू को बक्श रहा था और ना ही अपने समुदाय के उन लोगों को जो इसके खिलाफ थे। हालांकि सिविलियन किलिंग्स की सबसे बुरी हालत 1991 में भिंडरान वाले के मरने के बाद जब एक ही साल में 2591 आम निहत्त्थे लोग मार दिए गए थे इस टेररिज्म द्वारा तब हुई थी। अब यह सारा बैकग्राउंड मैं इसलिए बता रहा हूं क्योंकि जिस दौर पर 'Satluj' फिल्म बनी है वो यही दौर है। यह वो कैनवास है जिसके ऊपर खालड़ा की कहानी चलती है। लेकिन फिल्म जो है इस कैनवास को दिखाती ही नहीं है।
अब आते हैं उस सेंट्रल इवेंट पे जिसने इस पूरी टाइमलाइन को समझना जरूरी बना दिया। 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ के सिविल सेक्रेटेरियट में शाम के करीब 5:00 बजे पंजाब के सिंग चीफ मिनिस्टर बेयंत सिंह अपनी बुलेट प्रूफ कार की तरफ जा रहे थे। तभी बब्बर खालसा इंटरनेशनल का एक ह्यूमन बम दिलावर सिंह जो खुद एक पंजाब पुलिस कांस्टेबल था। वो कार के पास पहुंचता है और खुद को ब्लास्ट कर लेता है।
इस धमाके में बेयन सिंह के साथ 17 लोग मारे जाते हैं। जिसमें तीन कमांडो भी थे और इन आतंकवादियों की प्लानिंग इतनी मजबूत थी कि इन्होंने एक बैकअप मेंबर भी रख रखा था जो सुसाइड बॉम्बर था। मतलब अगर पहले वाले का प्लान फेल हो जाता तो यह आ जाता। इसका नाम था बलवंत सिंह राजवाना और इस सीन को 'सतलुज' फिल्म में इस तरीके से दिखाया गया है मानों उस पुलिस कांस्टेबल को कितना प्रताणित किया गया था।
जसवंत सिंह खालड़ा कैसे हुआ गायब?

अब इस डेट को याद रखिए 31 अगस्त 1995 क्योंकि ठीक इसके छह दिन बाद यानी 6 सितंबर 1995 को वो घटना होती है जिस पे ये पूरी फिल्म बनी है। 6 सितंबर 1995 को अमृतसर में जसवंत सिंह खालड़ा अपने घर के सामने अपनी कार धो रहा था। तभी पंजाब पुलिस के लोग आते हैं और उसे उठाकर झल पुलिस स्टेशन ले जाते हैं, जिसके बाद खालड़ा कभी वापस नहीं आया। अब खालड़ा था कौन? खालड़ा एक बैंक एंप्लई था जो आगे चलके ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट बन गया। सो कॉल्ड इसने क्लेम खड़ा किया कि पंजाब पुलिस ने इमरजेंसी के दौरान हजारों लोगों को अनआइडेंटिफाइड बॉडीज बता के गैर कानूनी तरीके से क्रिमेट कर दिया।
यानी बिना पहचान बताए जला उन बॉडीज़ को जला दिया गया। इसका आंकड़ा कितना था? करीब 25,000 का। अब ये आंकड़ा आपको अलग-अलग जगह अलग-अलग मिलेगा और यह खुद एक डिबेट का टॉपिक है। लेकिन जो सबसे ज्यादा क्वोट होता है वो लगभग यही है और यहां पर मैं एक चीज बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं क्योंकि इसके बिना यह कहानी अधूरी रह जाएगी।
खालड़ा की हत्या को इंडिया की खुद की अदालतों ने माना, 2005 में पांच पंजाब पुलिस अफसर दोषी करार दिए गए। इसके बाद साल 2007 में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने उन चारों बाकी अफसरों की सजा उम्रकैद तक बढ़ाई और 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने ये सजा बरकरार रखी। लेकिन फिल्म में ये दिखाया ही नहीं गया कि उन पांच पुलिस वालों को क्या सज़ा मिली या उन्हें कब तक सज़ा सुनाई गई।
कहानी में छुपा है प्रोपेगेंडा
Showing Partial history is nothing but Propaganda. pic.twitter.com/o0wbnmDG76
— Ravneet Singh Bittu (@RavneetBittu) July 10, 2026
अब हम यह नहीं कह रहे हैं कि खालड़ा के साथ जो हुआ वो नहीं हुआ था। ऐसा कहना एकदम झूठ होगा। लेकिन आतंकवादियों का समर्थन करना वो कैसे ठीक हो सकता है। आतंकवादियों के साथ कैसा कानून और कैसे ह्यूमन राइट्स? बस इसी दोगलेपन की वजह से इस फिल्म में दिखाई गई चीजों पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल हो गया है। हालांकि अगर आप मनोरंजन के तौर पर देख रहे हैं, तो ये फिल्म एकदम ठीक ही लगेगी, लेकिन कहानी के पीछे छुपाए जा रहे प्रोपेगेंडा को अगर आप इग्नोर कर रहे हैं। तो हो सकता है कि ये आपकी सबसे बड़ी भूल हो।

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