बोलो गांधी बाबा की जय!

30 जनवरी 1948 के दिन जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की ‘नृशंस हत्या’ को कुछ सिरफिरे लोगों के समूह ने ‘गांधी वध’ का नाम दिया था तो स्वतन्त्र भारत की इस प्रथम ‘आतंकवादी’ घटना को महिमामंडित करके भारतीय जनमानस में ‘अमानवीयता’ को पुरस्कृत करने का शालीन उपाय खोजा था। इस हत्या से केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरा संसार हिल गया था क्योंकि सदी के अहिंसा के सर्वोच्च ‘धर्माधिष्ठाता’ को अधर्म ने अपने उस आतताई स्वरूप को मानवीय कलेवर में पेश करने की कोशिश की थी जिसमें ‘खल नायक’ को ‘नायक’ और ‘नायक’ को ‘खलनायक’ बनाने की उत्कंठा छिपी हुई थी। यह भारतीय संस्कृति की ‘शिराओं’ में बहते ‘मानवीयता और वसुधैव कुटुम्बकम’ के ‘रक्त’ में ‘विष’ मिलाने जैसा था क्योंकि भारत ऐसे सामुदायिक समुच्यों से मिलकर बना था जिसमें ‘घृणा और नफरत को प्रेम व स्नेह’ से जीतने की कला ‘संजीवनी’ बनकर इसे एक राष्ट्र के रूप में विकसित करती थी।

किन्तु यह विषैली मानसिकता 21वीं सदी में भी किस तरह पाली पोसी जा रही है इसका उदाहरण भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ रही प्रज्ञासिंह ठाकुर है जिसने बापू के हत्यारे नाथू राम गोडसे को सदैव ‘देशभक्त’ की मूमिका में बने रहने का ‘वरदान’ देकर बाद में अपने वचनों में सुधार किया है। यह संयोग नहीं हो सकता कि उसके नाम से पहले साध्वी जुड़ा हुआ है? नाथूराम गोडसे को नायकत्व प्रदान करने का यह ऐसा प्रायोजित विचार है जिससे गांधी के अहिंसा के ‘अमोघ अस्त्र’ को ‘मुर्दा’ साबित किया जा सके और ‘हिंसा’ को समाज में प्रतिष्ठापित किया जा सके। अफसोसनाक यह है कि प्रज्ञा सिंह केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी ‘भाजपा’ की उम्मीदवार है। उसकी उम्मीदवारी ही स्वयं में भारतीय लोकतान्त्रिक राजनीति के ‘पराभव’ की ‘कपाल क्रिया’ का रोम हर्षक दृश्य प्रस्तुत करती है क्योंकि ऐसा करके लोकतन्त्र के जबड़ों को खून से सानने का मनोरथी महोत्सव मनाया जा रहा है।

जिस आतंकवाद को समाप्त करने के लिए भारत की समूची सुरक्षा प्रणाली बलिदान पर बलिदान देकर सम्पूर्ण राष्ट्र की चेतना को आत्मसात करके शक्तिपुंज की अभिव्यक्ति कर रही है उसी ‘चेतना’ में आतंकवाद ‘कालनेमि’ बनकर जनमानस को ‘अवचेतन’ कर देना चाहता है। इसके लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्रज्ञा सिंह ठाकुर आतंकवाद से जुड़े प्रकरण में ही अभी तक एक अभियुक्त हैं। परन्तु देखिये कैसे-कैसे गवाह निकल कर सामने आ रहे हैं। मौजूदा सरकार में ही एक मन्त्री अनन्त कुमार हेगड़े और कर्नाटक का एक अन्य सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बयान पर ‘हर्ष ध्वनि’ कर रहे हैं। आखिरकार गोडसे से इनका नाता क्या है? प्रख्यात समाजवादी नेता डा.राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि ‘विचारों का रंग खून के रंग से भी गाढ़ा होता है।’ जिस व्यक्ति के विचार हिंसा को लोकतन्त्र में बदलाव का रास्ता मानते हैं वह न तो चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा ले सकता है और न ही भारतीय संविधान के अनुसार एक क्षण भी किसी पद पर नहीं रह सकता है।

मगर हेगड़े तो ऐसे महाहेकड़ मन्त्री हैं जो पहले भी कह चुके हैं कि वह तो संविधान बदलने के इरादे से ही राजनीति कर रहे हैं। इसके लिये उन्होंने बड़े मरे मन से संसद में ‘खेद’ प्रकट किया था ‘माफी’ नहीं मांगी थी। परन्तु अब देश के चुनाव लगभग पूरे होने जा रहे हैं और रविवार को अन्तिम रूप से सातवें चरण का मतदान निपट जायेगा। इससे कम से कम यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि गोडसे को नायक मानने वाले ऐसे लोग भी चुनावी मैदान में हैं जो ‘गांधी हत्या’ को ‘गांधी वध’ के रूप में देखते हैं। जिस महामानव से मिलकर पिछली सदी के महान वैज्ञानिक ‘आइनस्टाइन’ ने यह कहा हो कि ‘आने वाली पीढि़यां हैरान होंगी कि कभी इस धरती पर कोई ऐसा व्यक्ति गांधी भी जन्मा था जिसका शरीर हाड़-मांस से बना हुआ था’ तो उसके हत्यारे को राष्ट्रभक्त बताने वाले लोगों से राष्ट्रभक्ति ही ‘शर्मसार’ क्यों नहीं होगी? संसदीय प्रणाली की राजनीति में हार-जीत मायने रखती है और इसे दिलाने वाली जनता ही होती है और जनता को स्वतन्त्र भारत में यह अधिकार देने वाले गांधी ही थे जो उन्होंने बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर से संविधान लिखवा कर दिया था।

इसमें बापू का भारत की उस मुफलिस अवाम की बुद्धि पर अटूट विश्वास समाहित था जिसे अंग्रेजों ने अपने दो सौ साल के शासन में डरपोक और गुलाम बनाकर रख दिया था। उन्हें पक्का यकीन था कि भारत के लोग कभी भी हिंसक विचारों से प्रभावित नहीं हो सकते। वह यही कहते थे कि ‘जहां अहिंसा है वहीं ईश्वर है और जहां सत्य है वहीं खुदा है।’ यह गीता और कुरान शरीफ का ‘सत्व’ है। मगर इस ऐतिहासिक सच को कौन नकार सकता है कि महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ का सम्बोधन सबसे पहले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ही तब किया जब उन्होंने आजाद हिन्द फौज बनाकर अंग्रेजों से सैनिक युद्ध लड़ने की घोषणा कर दी थी। उनके हत्यारे को राष्ट्रभक्त बताना किसी राष्ट्रद्रोह के जुर्म से कम करके कैसे देखा जाना चाहिए। इन चुनावों में हमने क्या अपने राष्ट्रीय मानकों के विध्वंस की कसम खा रखी है कि प. बंगाल में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की प्रतिमा को तोड़ देते हैं तो कभी अली और बजरंग बली को ही भिड़ाने की तदबीरें निकालने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि उस धरती मां का कोई धर्म नहीं होता जो अपने पर बसने वाले सभी बाशिन्दों को अपने मतों से बिना किसी भेदभाव के नवाजती है। इसलिए गांधी ने कहा था कि प्रकृति ने सभी प्राणियों की आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रबन्ध तो किया है मगर उनके लालच का कोई इलाज उसके पास नहीं है। यह उक्ति जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है और राजनीति भी इससे अलग नहीं है। इसलिए बोलिये ‘गांधी बाबा की जय।’

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