जातिवाद में जकड़ा भारत

आधुनिक भारत के इतिहास के आरम्भ से ही समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ और बुद्धिजीवी इस तथ्य को रेखांकित करते आये हैं कि भारत के चौतरफा विकास के लिये जाति प्रथा का अंत होना जरूरी है। जाति प्रथा और जातिवादी चेतना ने भारतीयों के जीवन में हर क्षेत्र में विध्वंसकारी भूमिका निभाई है। आजादी के 72 वर्षों बाद भी देश के संविधान और कानून में उसके निराकरण के लिये किये गये प्रावधानों के चलते समाज में कुछ परिवर्तन तो जरूर नजर आया है लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बड़ा परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा। समाज आज भी जातियों में बंटा है। चुनाव में उम्मीदवार जाति के आधार पर तय किये जाते हैं। वोट जाति के आधार पर डाले जाते हैं। हर सीट पर जातिगत समीकरणों का ध्यान रखा जाता है और जातियों के आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास किया जाता है और जाति-पाति के आधार पर ध्रुवीकरण भी होता है।

आज देश में एक भी ऐसी जाति ऐसी नहीं है जो जातिवादी चेतना से ग्रसित न हो। आज कोई भी जाति ऐसी नहीं जिसके नाम पर एक या एक से अधिक संगठन मौजूद न हों। सभी अपनी-अपनी जाति के दायरे में रहकर ही सोचते हैं। जाति की विभाजनकारी भूमिका से न तो प्रशासनिक व्यवस्था अछूती है, न ही पुलिस। जाति आधार पर गोलबंदी अधिकारियों और कर्मचारियों में भी देखने को मिलती है। यह सही है कि आजादी के बाद से ही सीमित रूप से सामंती-शोषक मनोवृत्ति से ग्रस्त सवर्णों को चुनौती मिलने लगी लेकिन सवर्ण जातियां हर कीमत पर अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक वर्चस्व को बनाये रखने के लिये दलितों की आवाज को कुचल देना चाहती हैं। वर्चस्व की लड़ाई के लिये राजनीतिक दल भी कोई कम जिम्मेदार नहीं हैं। समाज जन्म के आधार पर जातियों में विभाजित हो गया।

जाति आमतौर पर लोगों के व्यापार या समुदाय के हिसाब से तय की जाती है। हजारों की संख्या में ऐसी जातियां है जो आमतौर पर समुदाय के पारंपरिक पेशे से निर्धा​िरत होती हैं। सामाजिक उत्पीड़न की वजह से कुछ जातियां अपने पारंपरिक पेशे से मुक्ति चाहती हैं। उनमें चेतना के स्वर सुनाई दे रहे हैं। ऐसा ही एक उदाहरण गुजरात के लोर (मेहसाना) गांव के दलितों ने दिया है। दलितों ने मृत पशुओं को ठिकाने लगाने का पारंपरिक पेशा छोड़ने का फैसला किया है। दलितों ने गांव के उच्च जाति के लोगों द्वारा उनसे भेदभाव किये जाने के विरोध में यह कदम उठाया है। गांव के उच्च जाति के कहने वाले लोगों ने पिछले सप्ताह दलितों के बहिष्कार का आह्वान किया था जब एक दलित दूल्हे की बारात घोड़ी पर निकली। सवर्ण जाति के लोगों ने दूल्हे की बारात का विरोध किया।

दोनों समुदायों में कहासुनी भी हुई। इसके बाद सवर्णों ने दलितों के तालाब में नहाने, कुएं से पानी लेने, दूध-सब्जी बेचने और ऑटो में बैठने पर रोक लगा दी। दलितों का बहिष्कार करने वाले गांव के सरपंच को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के एक गांव में भी दलित दूल्हे और उसके रिश्तेदारों को मंदिर जाने से रोका गया। गुजरात के ही अरवल्ली जिले के खामवियार गांव में पाटीदार समुदाय के सदस्यों ने दलित दूल्हे की बारात रोकने के लिये बीच सड़क में जाम लगा दिया। आधुनिक भारत में ऐसी घटनायें शर्मसार कर देने वाली हैं। यही कारण है कि लोर गांव के दलितों ने परम्परागत पेशा छोड़ दिया है। क्या यह जरूरी है कि दलितों के पूर्वज जो काम करते रहे हैं वह आज भी करें। परम्परागत पेशे के चलते जातियों को तय करना कहां का न्याय है।

आज दलितों में भी युवा डाक्टर बन रहे हैं, कोई प्रोफैसर, कोई वकील, कोई पत्रकार तो कोई पुलिस अधिकारी है। क्या अगड़ी जाति के लोग आज भी उन्हें हेय दृष्टि से देखेंगे? अगड़ी जाति के लोगों ने दलितों का बहिष्कार इसलिये भी किया क्योंकि उन्होंने मृत पशुओं को उठाना बंद कर दिया है। क्या आज के दौर में किसी को भी मृत पशु उठाने के लिये विवश किया जा सकता है? गुजरात के उना कांड के बाद गुजरात के लगभग 30 गांव ऐसे हैं जहां के दलितों ने मृत पशुओं को उठाने का काम बंद कर दिया है। इससे इस बात का संकेत मिलता है कि दलित युवा समानता का व्यवहार चाहता है और किसी भी परिस्थिति में वह समझौता करने को तैयार नहीं है। प्राचीन भारत में गौतमबुद्ध और महावीर, मध्यकाल से कबीर और गुरुनानक जैसे संत, 19वीं सदी के समाज सुधारक और 20वीं सदी में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जैसे योद्धा जाति प्रथा के विरुद्ध संघर्ष करते रहे हैं।

राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डा. राम मनोहर लोहिया ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें सभी की बराबरी की हिस्सेदारी हो। डा. लोहिया रिक्शे की सवारी नहीं करते थे, कहते थे एक आदमी दूसरे आदमी को खींचे यह अमानवीय है। उन्होंने ही ‘जाति तोड़ो, दाम बांधो’ आंदोलन शुरू किया था लेकिन उनके चेलों ने ही उनका स्वप्न पूरा नहीं होने दिया। बाबा साहब अम्बेडकर, जिन्होंने भारत का संविधान लिखा, वह भी सामाजिक न्याय की अवधारणा के पक्षधर थे लेकिन राजनीतिक दलों ने संकीर्ण राजनीतिक कारणों से इसका दुरुपयोग भी किया। सवाल सबके सामने है कि भारत को जाति प्रथा से मुक्ति कब मिलेगी?

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