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कालीकट दुर्घटना की वजह?

कालीकट में हुई विमान दुर्घटना हमें अपनी विकास यात्रा की समीक्षा करने की चेतावनी दे रही है। हवाई अड्डे के रनवे पर विमान दुर्घटना होना कई प्रकार के गंभीर प्रश्न पैदा करता है
कालीकट दुर्घटना की वजह?
कालीकट में हुई विमान दुर्घटना हमें अपनी विकास यात्रा की समीक्षा करने की चेतावनी दे रही है। हवाई अड्डे के रनवे पर विमान दुर्घटना होना कई प्रकार के गंभीर प्रश्न पैदा करता है जिनका सीधा सम्बन्ध हवाई परिवहन नियन्त्रण प्रणाली (एटीसी) से लेकर विमानन क्षेत्र के प्रबन्धन तन्त्र और विमान चालकों की दक्षता से  है। यह संयोग नहीं है कि हवाई अड्डों के निर्माण व विकास और आधुनिकीकरण की परियोजनाएं निजी क्षेत्र के सहयोग में केवल प्रमुख बड़े शहरों तक ही सीमित हंै। यही स्थिति निजी विमान सेवाएं शुरू होने के बाद हवाई मार्गों की भी थी।  सभी निजी कम्पनियां प्रमुख हवाई मार्ग (ट्रंक रूट) पर ही सेवाएं देने की इच्छुक होती थीं क्योंकि ये लाभप्रद होते थे और इन पर यात्रियों की भारी भीड़ रहती थी। सुदूर अन्तर्देशीय उड़ानों का भार हमने सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी इंडियन एयर लाइंस पर छोड़ कर इसे एक तरफ घाटे का सौदा बनाया और दूसरी तरफ इसकी दक्षता को कमजोर किया क्योंकि निजी एयर लाइनों ने इसी कम्पनी के होशियार पायलटों को अपनी तरफ आकर्षित करने में सभी मानकों को तोड़ डाला। 
यही हाल एयर इंडिया का भी किया और आज हालत यह है कि यह कम्पनी बिकने को तैयार है मगर खरीदार कोई नहीं है, जबकि इंडियन एयर लाइंस इसमें समाहित हो चुकी है। विमानन क्षेत्र की दुर्दशा की यह एक झलक है परन्तु सकल रूप से यदि हम देखें तो प्रायः सभी क्षेत्रों में एेसे ही हालात हमको देखने को मिल रहे हैं।  कोरोना वायरस से लड़ने में हिरावल दस्ते की भूमिका निभाने वाली आशा कार्यकर्ता आजकल हड़ताल पर हैं।  उन्हें जितना मानदेय सरकार इस महंगाई के जमाने में देती है उतना तो दिल्ली-मुम्बई जैसे शहरों में रहने वाले सम्पन्न लोग अपने किसी मित्र की किसी रेस्टोरेंट में चाय-पानी की आवभगत में बिल का भुगतान कर देते हैं। अर्थात चार से पांच हजार रुपए मगर तर्क दिया जा सकता है कि आशा वर्कर का हवाई दुर्घटना से क्या लेना-देना है? लेना-देना उस सोच और दृष्टि का है जो हर मर्ज की दवा निजीकरण को समझ बैठी है।  यदि भारत में निजी स्वास्थ्य सेवा तन्त्र इतना मजबूत होता तो आशा वर्करों की क्यों जरूरत पड़ती? जाहिर है कि संकट काल में सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र ही काम आता है, चाहे वह विमानन हो या स्वास्थ्य क्षेत्र। कालीकट विमान दुर्घटना के लिए यहां के हवाई अड्डे पर बने रनवे को पहली नजर में जिम्मेदार माना जा रहा है। यह रनवे ‘टेबल टाप’ डिजाइन का है। अर्थात किसी ऊंची पहाड़ी के शिखर को समतल करके बनाया गया है जिसमें हवाई जहाज को नीचे उतारते वक्त पायलट किसी प्रकार का जोखिम नहीं ले सकता और रनवे का अन्त होने से पहले ही विमान को उसे रोक कर खड़ा कर देना होता है। इसी हवाई पट्टी के चारों तरफ ढलाननुमा जमीन होती है। कालीकट में भारी वर्षा की वजह से हवाई पट्टी पर विमान रगड़ता हुआ आगे निकल गया और 35 फुट निचले पायदान पर उतर गया जिसकी वजह से उसके दो टुकड़े हो गये और दोनों विमान चालकों समेत 18 यात्रियों की मृत्यु हो गई।  विमान में आग न लगना सौभाग्य माना जा रहा है वरना जान-माल की भारी क्षति हो सकती थी।
 सवाल यह है कि क्या ऐसे रनवे अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिए उपयुक्त हैं? इन उड़ानों में प्रायः एयर बसों का ही इस्तेमाल होता है। भारत में ऐसे हवाई अड्डे अच्छी खासी संख्या में हैं। इससे पहले मंगलुरू हवाई अड्डे पर 2010 में जो विमान दुर्घटना हुई थी उसका रनवे भी टेबल टाप डिजाइन का था। इसके बावजूद हमने आंखें नहीं खोलीं जबकि विमानन क्षेत्र के विशेषज्ञ पहले से ही यह राय देते आ रहे हैं कि एेसे हवाई अड्डों का विकास किया जाये वरना यहां बड़े विमानों की उड़ानें न हों। संसद की स्थायी समिति में भी यह मसला कई बार आया। वैसे कहा जा रहा है कि पिछले तीन महीने में कालीकट हवाई अड्डे पर कम से कम एक सौ उड़ाने उतरीं मगर यह कोई तर्क नहीं है क्योंकि हवाई अड्डे का रनवे जब विशेषज्ञों द्वारा खतरनाक और जोखिम भरा बताया जा चुका है तो निरपराध लोगों की जान भगवान भरोसे छोड़ने का कोई तुक नहीं है। कालीकट केरल में ही है और पूरा केरल आजकल भारी वर्षा के प्रकोप से जूझ रहा है।  उड्डीपी समेत मुन्नार जैसा पर्यटन स्थल जल क्रीड़ा का क्षेत्र बना हुआ है। कई जिले पानी में डूबे हुए हैं। अतः केरल पर दुधारी मार पड़ रही है, एक तरफ प्रकृति की और दूसरी तरफ मानव गलतियों की। अतः इस राज्य को तुरन्त हर प्रकार की मदद दी जानी चाहिए।
 बाढ़ व अतिवृष्टि इस राज्य की अर्थव्यवस्था को और ज्यादा चौपट कर देगी जो पहले से ही कोरोना की वजह से बैठी हुई है मगर कालीकट विमान दुर्घटना हमें सावधान कर रही है कि देश में जितने भी टेबल टाप डिजाइन के हवाई अड्डे हैं, सभी का समयानुकूल विकास होना चाहिए।  हवाई यात्रियों की संख्या को बढ़ाने का सपना हम सिर्फ हवा में ही नहीं पाल सकते हैं।  इसके लिए समुचित तन्त्र की स्थापना करनी होगी तभी हम अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं और निजी क्षेत्र को इसमें आगे आना होगा जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि राष्ट्र निर्माण में वह ठोस भूमिका निभाना चाहता है और केवल मुनाफा कमाना उसका लक्ष्य नहीं है।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com
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