चीन की भारत विरोधी कूटनीति

चीन और भारत कभी एक ही कालखंड में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के चंगुल से आजाद हुये थे। दोनों देशों की स्वतन्त्रता दोनों के सतत संघर्ष का ही परिणाम कहा जा सकता है। यही नहीं चीन ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम और स्वतन्त्रता सेनानियों से प्रेरणा भी हासिल की। संग्राम के अन्तिम चरण में जब बड़ी दुःखद आर्थिक स्थिति से चीन गुजर रहा था तब भारत में उसके लिये चंदा इकट्ठा कर चीन भेजा गया। भारत ने तब चीन की अन्य प्रकार से भी सहायता की। सन् 1950 में 29 एशियाई देशों का सम्मेलन बांडुंग (अफ्रीका) में हुआ था। सारे एशियाई देशों ने तत्कालीन प्रधानमं​त्री पंडित नेहरू के पंचशील के सिद्धांतों को अपनाने पर भी सहमति दिखाई। कालांतर में भारत और चीन के सम्बन्धों के पीछे भी पंचशील का सिद्धांत ही था। बाद में चीन ने तिब्बत को हड़प लिया। 

1962 में उसने भारत की पीठ में छुरा घोंपा। उसने भारत पर आक्रमण कर हमारा भू-भाग हड़प लिया। उसने पंडित नेहरू के पंचशील सिद्धांत की धज्जियां उड़ा दीं और हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे को ही हास्यास्पद बना दिया।आज भारत और चीन के सम्बन्ध कायम हैं तो उसके पीछे छिपा हुअा है अर्थतन्त्र और बाजार। 1962 के बाद हमने बार-बार कोशिश की कि दोनों देश बीती ताहि बिसार दें यानि कटुता भूलकर दोनों देश आगे बढ़े लेकिन हर बार चीन कुछ ऐसा कर देता है जिससे सभी सद्प्रयासों को पलीता लग जाता है। यह बात सत्य है कि भारत जैसे संवेदनशील देश को अपना अतीत नहीं भूलना चाहिये परन्तु यह बात भी उतनी ही सत्य है कि युग के साथ-साथ युग धर्म बदल जाता है। दोनों देशों के सम्बन्धों की गाड़ी जब भी आगे बढ़ती है तो चीन की तरफ से सीमा विवाद को लेकर बेसुरा राग छेड़ दिया जाता है। कभी अरुणाचल का तो कभी सिक्किम का। 

पाकिस्तान के कुख्यात आतंकी सरगना मसूद अजहर के वैश्विक आतंकी घोषित करने के मामले में चीन ने बार-बार अडं़गा लगाया लेकिन जब उसे लगा कि वैश्विक स्तर पर अंगुलियां उठने लगी हैं और उसे आतंकवाद पोषित करने वाले देश के समर्थक के तौर पर देखा जाने लगा है तो उसने मसूद अजहर को बचाने की कोशिशें छोड़ दीं। अब उसने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश पर अडं़गा लगा दिया है। उसका कहना है कि गैर एनपीटी सदस्य देशों की भागीदारी पर किसी विशेष योजना तक पहुंचने से पहले एनएसजी में भारत के प्रवेश पर कोई चर्चा नहीं होगी। 2016 में एनएसजी की सदस्यता के लिये भारत द्वारा आवेदन करने के बाद से ही चीन इस बात पर जोर दे रहा है कि परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को ही एनएसजी में प्रवेश की अनुमति दी जाती है। 

भारत ने हमेशा ही एनपीटी को भेदभावपूर्ण माना है और अब तक भारत ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं।दूसरी तरफ चीन ने आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को तुर्की और मलेशिया का साथ पाकर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफटीएएफ) द्वारा ब्लैक लिस्ट करने से बचा लिया है। एफटीएएफ एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जिसकी स्थापना जी-7 देशों की पहल पर 1989 में की गई थी। इस संस्था का काम दुनियाभर में हो रही मनी लांड्रिंग से निपटने की नीतियां बनाना है। वर्ष 2018 से पाकिस्तान दुनियाभर के मनी लांड्रिंग पर नजर रखने वाली संस्थाओं के राडार पर है। इन संस्थाओं के निशाने पर पाकिस्तान तब आया जब उसे आतंकवादियों को फंड देने और मनी लांड्रिंग के खतरे को देखते हुये ग्रे लिस्ट में डाल दिया गया था।भारत ने पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट करने का प्रस्ताव रखा था।

 अब पाकिस्तान को अक्तूबर तक का समय मिल गया। देखना होगा पाकिस्तान अब बचने के लिये क्या-क्या कदम उठाता है। क्योंकि अब तक एक्शन प्लान के 27 में से 18 सूचकों पर उसका काम असंतोषजनक पाया गया है। यह साफ है कि पाकिस्तान ने आतंकवादियों की फंडिंग रोकने के लिये कोई कदम नहीं उठाया है।सवाल यह है कि पाकिस्तान और चीन के सम्बन्ध कितने ही मधुर क्यों न हों, चीन भारत विरोधी नीतियां क्यों अपना रहा है। चीन की भारत विरोधी कूटनीति न तो कभी बदली है और न ही भविष्य  में बदलेगी। दरअसल चीन भी भारत की बढ़ती ताकत से काफी परेशान है। भारत आज 1962 का भारत नहीं है बल्कि वह 2019 तक आते-आते काफी शक्तिशाली हो चुका है। तभी भारत डोकलाम में उससे आंख से आंख मिलाकर सामना कर सका।

 डिफेंस क्षेत्र में भी भारत ने खुद को काफी मजबूत बनाया हुआ है। भारत आज विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है। स्थितियां अनुकूल रहीं तो भारत चीन को भी पछाड़ सकता है। यह बात समझी जानी चाहिये कि भारत और चीन दुनिया की इस समय सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थायें हैं और इनके आर्थिक हित एक-दूसरे को सहयोग किये बिना संरक्षित रह ही नहीं सकते। चीन अब तक भारत के लिये एक पहेली रहा है। चीन पाकिस्तान की मदद कर आतंकवाद को ही पोषित कर रहा है। व्यापार अलग चीज है, भारत को सतर्क रहकर चीन की चुनौतियों का दृढ़ता से जवाब देना ही होगा। मजबूरियां कुछ भी हों, हमें चीन से पूछना होगा कि नंगा हो चुका पाकिस्तान क्या उसकी दोस्ती के काबिल है?
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