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नागरिकता पर सर्वानुमति बने

दरअसल यह विषय राजनीति का किसी भी रूप में मुद्दा नहीं होना चाहिए था क्योंकि भारतीय लोगों का जायज नागरिक होना संवैधानिक अधिकार है।
नागरिकता पर सर्वानुमति बने
राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को लेकर जिस तरह का भ्रम फैला हुआ है उससे नाहक ही देश के आम नागरिकों के एक समुदाय के लोगों में अपनी नागरिकता पर आंच आने का भय व्याप्त हो रहा है। दरअसल यह विषय राजनीति का किसी भी रूप में मुद्दा नहीं होना चाहिए था क्योंकि भारतीय लोगों का जायज नागरिक होना संवैधानिक अधिकार है। इसके बावजूद यह विषय दलगत राजनीति में उलझ गया है। 

इसकी वजह जानना बहुत जरूरी है। वजह संशोधित नागरिकता कानून है जिसमें धर्म के आधार पर विदेशों से शरण लेने वाले लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। तीन इस्लामी देशों से भारत में शरणार्थी बने केवल गैर मुस्लिमों को ही नागरिकता प्रदान की जायेगी। इसका असर भारत की विदेश नीति को प्रभावित कर सकता है। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार व विदेश सचिव श्री शिवशंकर मेनन के अनुसार नया कानून अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की लोकतान्त्रिक छवि को हल्का कर सकता है जिससे आर्थिक धरातल पर भी भारत के प्रति अन्तर्राष्ट्रीय  निवेशकों में शंका बढ़ सकती है। 

हमें यह पता होना चाहिए कि अभी तक भारत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी)  देशों के समूह का सदस्य नहीं बन पाया है जबकि अमेरिका से परमाणु करार हुए 11 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस करार में अमेरिका ने ही भारत से वादा किया था कि वह भारत को एनएसजी का सदस्य बनाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करेगा। अमेरिका जिस तरह भारत के साथ आंख-मिचौली खेलता रहता है वह गंभीर अध्ययन का विषय इसलिए है क्योंकि एक तरफ वह भारत के साथ ईरान के प्राचीन सांस्कृतिक सम्बन्धों की डोर पर खड़े हुए ताल्लुकात को अपने नजरिये से देखने के लिए विवश कर रहा है और दूसरी तरफ पाकिस्तान को अपने साथ खड़ा रखने के लगातार प्रयत्न कर रहा है। 

ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक आतंकवादी के खात्मे के तौर पर व्याख्या की है और कहा है कि वह भारत और ब्रिटेन में आतंकवादी हमलों की साजिश करता रहता था, लेकिन ट्रम्प साहब ने पाकिस्तान के बारे में अपनी जुबान को हमेशा इस तरह खोला है कि इसकी फौज के जनरलों पर कभी किसी तरह की आंच न आये जबकि हकीकतन पाकिस्तानी फौज ही भारत में आतंकवाद फैलाने वाली तंजीमों को पनाह देते रही है और उन्हें प्रशिक्षित करती रही है। पाकिस्तान में स्वयं अमेरिका द्वारा ही घोषित किये गये आतंकवादी आज भी इत्मीनान से जिन्दगी गुजार रहे हैं। 

मगर अमेरिका ने भारत के नये नागरिकता कानून के खिलाफ टिप्पणी करने में देर नहीं लगाई। वास्तव में भारत के पड़ोसी देशों में भी इस कानून को लेकर बेचैनी पैदा हो रही है। खासकर बंगलादेश में। जिसे भारत ने ही मानवता के आधार पर सृजित करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी क्योंकि वहां पाकिस्तानी की इस्लामी सरकार ही अपने एक हिस्से के मुस्लिम नागरिकों पर ही अत्याचार के नये-नये रिकार्ड कायम कर रही थी। एक ही धर्म के मानने वाले लोगों पर उसी धर्म के लोगों द्वारा किया गया यह पिछली सदी का सबसे बड़ा अत्याचार था जिसकी वजह से पूर्वी पाकिस्तान बंगलादेश बना था। 

यह भी विचारणीय है कि पूर्वी पाकिस्तान को एक स्वतन्त्र बंगलादेश बनाने की मुहीम में भारत का विपक्ष भी पूरी तरह शामिल था और यह कार्य तत्कालीन प्रधानमंत्री  श्रीमती इंदिरा गांधी ने मानवता की रक्षा के उद्देश्य से किया था। यह भी विडम्बना है कि विदेशों से भारत में शरणार्थी के तौर पर आने वाले कुछ लोगों के लिए हम अपने ही देश में सामाजिक अशान्ति का माहौल बना रहे हैं। पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के इस कथन पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि पाकिस्तान के सीमान्त राज्य होने की वजह से सबसे ज्यादा शरणार्थियों का जोर उस पर ही आयेगा और धार्मिक पहचान का फायदा उठा कर घुसपैठिये भी उनके राज्य में अशान्ति का माहौल पैदा कर सकते हैं। 

पाकिस्तान भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए कोई भी रास्ता अख्तियार कर सकता है। अतः सवाल केवल हिन्दू मुसलमान का नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी है, परन्तु पाकिस्तान, अफगानिस्तान व बंगलादेश  में हिन्दू होने की वजह से प्रताड़ित होने वाले लोगों को भारत में शरण लेने का पूरा अधिकार हमें देना होगा और इस कार्य में भी राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखना होगा। हमें यह तथ्य भी ध्यान में रखना होगा कि भारत में पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले अधिसंख्य नागरिक किस धर्म से ताल्लुक रखते रहे हैं ? उन आकंड़ों को भी एक बार निकाल कर पढ़ लिया जाना चाहिए।  आर्थिक लालच और भौतिक लाभ धर्म की पहचान को नहीं देखता। 

हम अजीब स्थिति में हैं कि संवैधानिक कार्य को करने से ही संविधान की शपथ लेकर गठित हुई कई राज्य सरकारें एनपीआर का कार्य करने से इनकार कर रही हैं। इससे पहले भारत में एेसी स्थिति कभी नहीं बनी। जनगणना या राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीकरण या नागरिक पंजीकरण संवैधानिक तौर पर पूरी तरह जायज है। संविधान ही इसे कराने की इजाजत केन्द्र सरकार को देता है और यह काम बिना राज्य सरकारों के सहयोग के नहीं हो सकता। यहां तक कि किसी भी स्थान पर अवैध नागरिकों की निशानदेही भी राज्य सरकारें ही करती हैं। दोनोंं ही सरकारें संविधान की शपथ लेकर राजकाज का काम करती है।  अतः हर राज्य से अलग-अलग आवाज आने से भारत की एकता को ही धक्का लगता है और इसकी संघीय ढांचे में व्यर्थ की तकीरें सी ​िखंचती हैं। 

इनका निराकरण होना राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत जरूरी है। आर्थिक उदारीकरण की नीति के चलते प्रत्येक राज्य सरकार को अपने क्षेत्र में विदेशी निवेश आकर्षित  करने का अधिकार है, परन्तु वर्तमान आपसी खींचतान के चलते यह सब कार्य पीछे खिसकता जा रहा है। अतः बहुत आवश्यक है कि सभी राज्यों के मुख्यमन्त्रियों की बैठक बुला कर आपसी विचार-विमर्श से इस माहौल को खत्म किया जाये। यह देश राज्यों का समूह (यूनियन आफ इंडिया) है। इस यूनियन में प्रत्येक राजनीतिक दल को मतदाताओं का प्रतिनिधि होने का हक है। अतः सर्वानुमति ही हमारा अंतिम हल है।
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