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संविधान, लोकतन्त्र व राज्यपाल

आजाद भारत ने संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र को अपनाते हुए जब बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था को अपनाया तो आशंका व्यक्त की गई
संविधान, लोकतन्त्र व राज्यपाल
आजाद भारत ने संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र को अपनाते हुए जब बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था को अपनाया तो आशंका व्यक्त की गई कि अंग्रेजों की दासता में दो सौ वर्ष तक जकड़े रहने वाले इस देश के अधिसंख्य गरीब, मुफलिस और अनपढ़ लोग वयस्क आधार पर मिले एक वोट के अधिकार से किस तरह अपनी उस राजनीतिक आजादी की रक्षा कर पायंगे जिसकी गारंटी इस देश के लागू नये संविधान में दी गई है, परन्तु इस प्रणाली को सफल बना कर इसी अनपढ़ कही जाने वाली जनता ने सिद्ध कर दिया कि हजारों जाति-बिरादरियों और विभिन्न धर्मों में बंटे लोगों को आजादी का अधिकार देने वाले संविधान में वह शक्ति है कि यह सैकड़ों की संख्या में बने राजनीतिक दलों के लोगों के मतभेदों को समर्पण करने की मुद्रा में ला सकता है क्योंकि संविधान के निर्माता ने 26 नवम्बर, 1949 को  नया संविधान सौंपते हुए घोषणा की थी कि विविध राजनीतिक दलों की जनता द्वारा सौंपी गई सत्ता इसी संविधान के प्रति नतमस्तक होगी और राज केवल और केवल संविधान का होगा जिससे विभिन्न सत्ता प्रतिष्ठान अपनी शक्ति को लेकर इसका राज स्थापित करेंगे।
राज्यों के संघ (यूनियन आफ इंडिया) का संघीय ढांचा इस प्रकार का होगा जिसमें विभिन्न राज्यों में लोगों द्वारा चुनी हुई प्रान्तीय सरकारों का शासन संविधान के अनुसार इस प्रकार चलेगा कि इसी संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति महोदय के प्रतिनिधि के रूप में संविधान के शासन की अनुपालना की देखरेख करेंगे। राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति महोदय की प्रसन्नता पर निर्भर करेगी। जाहिर है कि यह प्रसन्नता तभी तक कायम रह सकती है जब तक कि राज्यपाल संविधान के शासन की स्थापना के नियम की पालना करते रहें। राज्य की चुनी हुई सरकारों के पास सभी प्रकार के अधिशासी अधिकार होंगे (अनुसूची पांच व छह  के तहत  अनुसूचित जनजातियों के सन्दर्भ में दिये गये विशिष्ट अधिकारों को छोड़ कर) जिनका इस्तेमान वह विधानसभा के माध्यम से अपनी  जवाबदेही तय करते हुए करेगी। अतः किसी भी राज्य में विधानसभा को ही यह शक्ति दी गई कि वह किसी भी सरकार की सत्ता पर बैठे रहने की शर्त का निर्धारण इसके लिए बनाये गये नियम-कायदों के तहत करती रहे।
 राज्यपाल को इस संसदीय प्रणाली का हिस्सा इस प्रकार बनाया गया कि वह चुने हुए प्रतिनिधियों के इस सदन की बैठक को सत्ता पर काबिज सरकार की सलाह पर बुला सकें और उसका सत्रावसान कर सकें। किसी भी चुनी हुई सरकार को राज्यपाल की ‘अपनी’ सरकार का दर्जा दिया गया जिससे जनमानस के एक वोट के अधिकार से गठित बहुमत की सरकार को राज्य में संविधान के संरक्षक राज्यपाल आम मतदाता का मस्तकाभिषेक करते हुए लगें मगर विधानसभा की आन्तरिक बुनावट इस प्रकार तय की गई कि इसकी स्वायत्तशासी हैसियत इस प्रकार की हो उसमें किसी भी अन्य संस्था का प्रवेश निषेध हो और इसका संरक्षण विधानसभा द्वारा चुने गये अध्यक्ष के हाथों में हो। 1986 में बने दल बदल कानून की संरचना भी इसी सिद्धान्त को केन्द्र में रखते हुए की गई और इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में दर्ज किया गया जिससे भारत की स्वतन्त्र न्यायपालिका का कार्य क्षेत्र विधानसभा की भीतरी कार्यवाही से निरपेक्ष बना रहे। पूरे मामले में राज्यपाल की भूमिका संविधान के रक्षक के तौर पर विधानसभा के अधिकारों के संरक्षक की बनाई गई क्योंकि विधि द्वारा स्थापित इस सदन की संरचना की जिम्मेदारी चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचित हो जाने के बाद राज्यपाल को ही दी गई और उन पर ही बहुमत का शासन स्थापित करने का दायित्व छोड़ा गया।
हमारे संविधान निर्माताओं ने यह शानदार कशीदाकारी इस तरह की कि हर कदम पर आम जनता का इकबाल बुलन्द रहे और उसी से ताकत लेकर बनी बहुमत की सरकार अपना इकबाल बुलन्द रखे, परन्तु राजस्थान में आजकल जो संकट बना हुआ है उसका कारण राजनीतिक दलों की आपाधापी है जो संघीय व्यवस्था के रंग-बिरंगे लोकतान्त्रिक स्वरूप को असंयत बना देना चाहता है। पूर्व में आज की विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने भी ऐसी बहुत सी गलतियां की हैं जिनकी वजह से राज्यपाल का पद विवादास्पद बना और चुनी हुई सरकारों को बेवजह परेशान होना पड़ा। ऐसा भी​ हुआ कि केन्द्र में बैठी एक पार्टी की सरकार ने राज्यों मे काबिज दूसरी पार्टियों की सरकार को थोक के हिसाब से बर्खास्त किया। ऐसा इन्दिरा शासनकाल और मोरारजी देसाई शासनकाल में हुआ, परन्तु ऐसा कभी नहीं हुआ कि स्वयं राज्यपाल ही अपनी प्राथमिक संवैधानिक जिम्मेदारी को अनदेखा करके चुनी हुई सरकार की सलाह पर अमल न करें और स्वयं विधानसभा की कार्यप्रणाली के बारे में बजाय उसकी राय मानने के अपनी राय थोपने  का प्रयास करते रहें। इसे संवैधानिक त्रासदी की संज्ञा दी जा सकती है। हालांकि ऐसी त्रासदियां पहले भी कई बार हो चुकी हैं परन्तु उनका परिमार्जन भी होता रहा है जैसा कि हमने 2016 में अरुणाचल के मामले में देखा था।
अब सवाल यह है कि संविधान का शासन आधा-अधूरा प्रतीत न हो। राजनीतिक दलों के दांवपेंच राज्यपाल महोदय को उन्हीं पर छोड़ देने चाहिए और अपना संवैधानिक दायित्व निभाना चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि वह कानूनी मामलों पर राज्य के एडवोकेट जनरल की राय जरूर लें।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com
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