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कोरोना वैक्सीन और पेटेंट कानून

भारत पहले ही इस बात का समर्थक रहा है कि वैक्सीन को बौद्धिक सम्पदा के पेटेंट के दायरे में अस्थाई रूप से हटा दिया जाए। यह प्रस्ताव भारत और दक्षिण अफ्रीका की ओर से रखा गया था
कोरोना वैक्सीन और पेटेंट कानून
भारत पहले ही इस बात का समर्थक रहा है कि वैक्सीन को बौद्धिक सम्पदा के पेटेंट के दायरे में अस्थाई रूप से हटा दिया जाए। यह प्रस्ताव भारत और दक्षिण अफ्रीका की ओर से रखा गया था जो विश्व व्यापार संगठन के 60 देशों के समूह का नेतृत्व करतें हैं। पूरा समूह भी यही चाहता है कि कोरोना काल में वैक्सीन को बौद्धिक सम्पदा के पेटेंट से मुक्त कर दी जाए ताकि महामारी से कराह रही जनता को वैक्सीन जल्द से जल्द मिल सके। यह तभी सम्भव होगा जब वैक्सीन उत्पादन में अनावश्यक बाधाएं दूर की जाएं।
भारत ने जब यह प्रस्ताव रखा था तो तत्कालीन ट्रंप प्रशासन ने इसका विरोध किया था। ​ब्रिटेन और यूरोपीय संघ भी इसके विरोध में खड़े थे लेकिन इस बार बाइडेन सरकार ने इस प्रस्ताव का समर्थन कर दिया है, जिससे भारत की मांग को बल मिला है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने भी पेटेंट छोड़ने के विचार का समर्थन किया है लेकिन जर्मनी ने कोरोना वैक्सीन का पेटेंट छोड़ने से इंकार किया है। जर्मनी की सरकार का कहना है कि बौद्धिक सम्पदा की सुरक्षा किसी भी नए विचार का स्रोत होती है, इसलिए इसे बनाए रखना चाहिए। इस योजना का समर्थन करने वालों की ओर से कहा गया है कि पेटेंट हट जाने से कई ​निर्माता कम्पनियां वैक्सीन बना सकेंगी।
अभी पेटेंट की बाध्यताओं की वजह से ऐसा नहीं किया जा सकता। जिन कम्पनियों ने वैक्सीन विकसित की है और उसके शोध पर धन खर्च किया है, अभी वैक्सीन वही बना सकती हैं।  अगर वैक्सीन का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाए तो तेजी से टीकाकरण अभियान चलाकर दुनिया को कोरोना मुक्त किया जा सकता है। बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन होने से इसकी कीमत भी कम आएगी। अभी तमाम छोटे देशों को वैक्सीन नहीं मिल पा रही, जबकि भारत समेत कई देशों में भी वैक्सीन की किल्लत है। यूरोपीय संघ भी पेटेंट हटाए जाने के प्रस्ताव पर ​विचार को तैयार है।
बै​द्धिक सम्पदा कानून को हटाने का विरोध करने वाली फार्मा कम्पनियों का मानना है कि इससे समस्या सुलझ नहीं सकेगी। फार्मा कम्पनियों को यह भी चिंता है कि पेटेंट हटाए जाने से वैक्सीन की सुरक्षा आैर गुणवत्ता पर संकट आ सकता है।
पूरी दुनिया के लिए यह असाधारण समय है, मानव की पीड़ा देखी नहीं जा रही। छोटे और गरीब देशों में तो महामारी से लड़ने के लिए संसाधन ही नहीं हैं। हैल्थ सैक्टर में वैश्विक संकट का समय चल रहा है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में सांसें बचाने के लिए जंग लड़ी जा रही है। पूरे संसाधन जुटा कर आक्सीजन की व्यवस्था की जा रही है। जरूरी दवाएं बाजार से नदारद हैं।
हाल ही दिनों में बड़ी फार्मा कम्पनियों का असली चरित्र सामने आ रहा है। ये कम्पनियां नहीं चाहतीं कि कोरोना महामारी जैसी ​िवश्वव्यापी आपदा के दौर में इनके हितों को कोई नुक्सान पहुंचे। ड्रग इंडस्ट्री के बड़े खिलाड़ी लाबिंग कर रहे हैं कि बौद्धिक सम्पदा अधिकार निलम्बित नहीं किए जाएं। यह बात भी सबको पता है कि वैक्सीन का उत्पादन करने वाली फार्मा कम्पनियों को प​ब्लिक रिसर्च प्रयोगशालाओं का समर्थन मिला है और सरकारों ने उदार होकर फंडिंग की है। ड्रग इंडस्ट्री किस तरह अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करती है, उसका अनुमान इस बात ले लगाया जा सकता है कि बड़ी फार्मा कम्पनियों की लाबिंग करने वाली दा फार्मास्यूटीकल रिसर्च एंड मैन्यूफैक्चर्स ऑफ अमेरिका ने पिछले वर्ष की पहली तिमाही में सांसदों का समर्थन लेने के लिए खुलकर खर्च किए। हैल्थ समूह ने अपनी जांच में पाया कि इस लाबिंग में ट्रंप प्रशासन के पूर्व अधिकारी शामिल थे। यह भी पता होना चाहिए कि 2016 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन ने इसी ड्रग इंडस्ट्री से 3,36,416 डालर का चंदा जुटाया था। दुनिया की सबसे बड़ी ड्रग कम्पनियों में से एक फाइजर लैटिन अमेरिकी देशों को डरा-धमका रही है कि वह उसकी महंगी वैक्सीन को सुरक्षा देने के लिए अपने कानूनों में बदलाव करे। अब जबकि विश्व व्यापार संगठन की प्रमुख एनगोजी उकान्जो इकेला ने भी अमेरिकी पटेंट हटाने का समर्थन किया है और कहा है कि इस संबंध में एक व्याहारिक समझौते तक पहुंचना चाहिए क्योंकि वर्तमान समय में वैक्सीन के निर्माण को लेकर काफी असमानता है, जो की ठीक नहीं है।
अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और जापान की दादागिरी के चलते व्यापार संबंधित बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स) का समझौता विश्व व्यापार संगठन के समझौते का हिस्सा बन गया लेकिन उसके बाद भी जन संगठनों और दुनिया भर के नागरिकों की लड़ाई जारी है। इस समय लोगों की जानें बचाना उद्देश्य होना चाहिए न कि मुनाफा कमाना। पेटेंट कानूनों में छूट मिलती है तो भारत को भी इसका फायदा होगा और अडंगेबाजी जारी रही तो इतनी बढ़ी आबादी को कम समय में टीका दे पाना कठिन होगा। इस समय पूरी दुनिया के सामने एक ही लक्ष्य बाजार को नहीं मानवता को बचाइये।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com
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