अली फजल की 'राख' ने ताजा की रंगा-बिल्ला की खौफनाक यादें, जब दिल्ली गीता-संजय के मर्डर केस से दहल गई थी
Raakh True Story Explained : अमेज़न प्राइम पर इस समय एक वेब सीरीज खूब चर्चा बटोर रही है जिसका नाम है 'राख'. यह सीरीज रियल घटना पर आधारित है जिस घटना ने एक समय दिल्ली की सड़कों को खामोश कर दिया था, लोगों को भीतर तक दहला दिया था और अपराध श्रेणी में दिल्ली को पहला बदनामी का दाग दे दिया था.
मामला है रंगा बिल्ला नाम के दो अपराधियों का, जिन्होंने 2 मासूम बच्चों को किडनैप कर उनके साथ हैवानियत की हद पार कर दी थी और उनकी निर्मम हत्या कर दी थी. इस अपराध के लिए उन्हें 31 जनवरी 1982 को फांसी पर लटका दिया गया.
'राख' वेब सीरीज इन्हीं दो कुख्यात अपराधियों पर है. जो इस समय इन्टरनेट पर फिर से उन यादों को ताजा कर गई है. वेब सीरीज में इस केस को सुलझाने वाले एक्टर अली फजल जय प्रकाश जाटव का किरदार निभा रहे हैं.
वह ऐसे दौर का केस सुलझा रहे हैं जब न तो इन्टरनेट था, न सीसीटीवी न, मोबाइल फोन. सब तफतीस बिना तकनीक के, तब फोरेंसिक भी नया नया शुरू हुआ था और अपराधी के पास बच निकलने के कई रास्ते हुआ करते थे. आज हम रंगा बिल्ला के रियल इंसिडेंट के बारे में आपको बताएंगे.
Ranga Billa 1978 Case Explained : क्या है रंगा-बिल्ला अपराध मामला

रंगा-बिल्ला कांड भारत के सबसे चर्चित और दहला देने वाले आपराधिक मामलों में से एक है। अगस्त 1978 में नई दिल्ली में नौसेना अधिकारी के दो बच्चों के अपहरण, क्रूरता और हत्या की इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
घटना 26 अगस्त 1978 की है जब कुलजीत सिंह उर्फ रंगा (ट्रक ड्राइवर) और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला (पेशेवर अपराधी) ने दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो जा रहे दो नाबालिग भाई-बहनों, गीता और संजय चोपड़ा का लिफ्ट देने के बहाने अपहरण कर लिया गया।
जानकारी के अनुसार फिरौती की मांग के लिए यह अपहरण किया गया था, लेकिन जब बच्चों के पिता के नौसेना अधिकारी होने की जानकारी मिली, तो पकड़े जाने के डर से दोनों ने मिलकर बच्चों की बेरहमी से हत्या कर दी। यह पूरे देश के लिए सनसनी और हाई प्रोफाइल मामला बन गया था, जिसमें दिल्ली पुलिस महकमे से लेकर सरकार तक जुट गई थी.
Ranga Billa Case : कैसे हुई गिरफ्तारी और सजा

इस मामले कि इन्वेस्टिगेशन में विपरीत परिस्थितियां होने के बावजूद दोनों अपराधियों की गिरफ्तारी 8 सितंबर 1978 को हुई. घटना के कुछ दिन बाद, दोनों आरोपी गलती से कालका मेल के सैन्य डिब्बे में चढ़ गए और सैनिकों द्वारा शक होने पर दिल्ली पुलिस के हत्थे चढ़ गए।
इस मामले में फोरेंसिक साक्ष्यों ने अहम भूमिका निभाई। रंगा और बिल्ला पर अपहरण और हत्या का आरोप लगाया गया था। इस मुकदमे ने जनता का बहुत ध्यान खींचा।
आखिरकार, दोनों को दोषी ठहराया गया और मौत की सजा सुनाई गई। बाद में उनकी अपीलें खारिज कर दी गईं और मौत की सजा बरकरार रखी गई। फिर 1982 में तिहाड़ जेल में रंगा और बिल्ला को फांसी दे दी गई।निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को मौत की सजा सुनाई।
यह मामला भारत में मृत्युदंड के "दुर्लभतम मामलों" (Rarest of Rare Cases) के सिद्धांत के लिए एक निर्णायक मोड़ बना। बताया जाता है कि रंगा को जब फांसी दी गई तो फांसी चढ़ाए जाने के बाद भी वह 2 घंटे तक जिन्दा रहा.
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