लोकतन्त्र का ‘लल्लू’ हो जाना !

12:17 AM May 26, 2020 | Aditya Chopra
 लाॅकडाऊन के चलते भारत के लोकतन्त्र की व्यवस्था को इसके आधारभूत प्रशासनिक नियमों व सिद्धान्तों से विमुख नहीं किया जा सकता और हर हालत में संविधान के शासन या कानून के निजाम के समक्ष नतमस्तक होने से किसी भी सरकारी अमले को नहीं रोका जा सकता।

सबसे पहले यह समझा जाना चाहिए कि किसी भी राज्य की सरकार का पहला कर्त्तव्य  लॉकडाऊन की विभीषिका से अपने राज्य की गरीब व अल्प आय जनता को सुरक्षित रखने का है, इसका सम्बन्ध केवल स्वास्थ्य (जान) से ही नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति (जहान) से भी है।

इसके साथ ही गरीबों व मजदूरों की मदद के लिए जो कोई भी संस्था या संगठन आगे आता है उसे न केवल सहयोग देना सरकार का कर्त्तव्य है बल्कि उसकी जनसेवा की भावना का सम्मान करना भी उसका धर्म है परन्तु उत्तर प्रदेश में इन भरी गर्मियों में क्या ‘पछवा’ हवा चल रही है कि उन लोगों पर आपराधिक मुकदमें दर्ज करके जेल भेजा जा रहा है जो मजदूरों और गरीबों की मदद करना चाहते थे, कांग्रेस पार्टी इसी देश की पार्टी है और प्रमुख विपक्षी दल है, राजनैतिक  लोकतान्त्रिक प्रणाली में इसके विचारों व सिद्धान्तों से मतभेद हो सकते हैं मगर लाॅकडाऊन के समय में आम जनता के बीच इस पार्टी के जन सेवा करने के जज्बे को ‘दुत्कारा’ नहीं जा सकता और इसके कार्यकर्ताओं की भावनाओं को ‘आपराधिक’ श्रेणी में नहीं डाला जा सकता।

बेशक उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री माननीय योगी आदित्यनाथ ने गरीबों व निचले तबके के लोगों के लिए प्रशंसनीय कार्य किया है मगर ऐसा ही काम करने वाले किसी भी दूसरे राजनैतिक दल को खतावार ठहरा कर सजा नहीं दी जा सकती।
राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष श्री अजय कुमार लल्लू को जिस तरह राज्य की पुलिस ने मजदूरों की मदद करने की एवज में मुजरिम बना कर जेल भेजा है और उन पर संगीन धाराओं के तहत मुकदमें बना दिये गए हैं इससे उल्टा सवाल पैदा हो गया है कि क्या मजदूरों की हिमायत और मदद करना सरकार के खिलाफ ‘बगावत’ करना है।

नहीं भूला जाना चाहिए कि श्री लल्लू विधानसभा के सदस्य भी हैं और उनकी अपनी राजनैतिक हैसियत है, उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करके पुलिस ने सिद्ध कर दिया है कि वह लाॅकडाऊन से पैदा हुई परिस्थितियों का लाभ निरंकुशता फैला कर लोगों को डराने में करना चाहती है और जनसेवा पर राजनैतिक मुलम्मा चढ़ाना चाहती है।

भारत का लोकतन्त्र इतना निरीह नहीं है कि उसे ही ‘लल्लू’ बना दिया जाये। हाल ही में विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने लाॅकडाऊन काल में हो रही मनमानी प्रशासनिक कार्यवाहियों के लिए जिस तरह सरकारों की खिंचाई की है उससे जाहिर होता है कि भारत में अन्ततः कानून का राज ही चलेगा और राजनैतिक बहुमत को संविधान की उठाई गई कसम के सामने झुकना ही पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश सरकार को उन तरीकों से बचना चाहिए जो इसे जनता के बीच मजदूर विरोधी साबित करें क्योंकि स्वयं योगी जी की मंशा मजदूरों के कष्ट दूर करने की रही है जिसकी सब तरफ भूरि-​भूरि प्रशंसा भी हुई है, मगर आश्चर्य है कि गरीब तबके के दलित व पिछड़े वर्ग के मजदूर व कामगर समुदाय को हेकड़ी से अपना वोट बैंक मानने वाली उत्तर प्रदेश की बहुजन व समाजवादी जैसी पार्टियां मुंह पर ‘मास्क’ लगा कर इस प्रकार पीठ फेर कर बैठी हुई हैं जैसे मुंह खोलते ही उन्हें ‘कोरोना’ हो जायेगा।

दलितों और मजदूरों व पिछड़ों के हमदर्द बनने का ढोल पीटने वाली इन पार्टियों के नेता समझ रहे हैं कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष को जेल में डाल देने से उनकी राह सरल हो जायेगी और वे कह सकेंगे कि देखो उनके साथ न रहने का क्या खामियाजा भोगना पड़ता है मगर ये लोग गफलत में हैं क्योंकि इनका रंगा हुआ चोला लाॅकडाऊन ने धो डाला है और इनकी असलियत जनता के सामने उजागर हो गई है। इसी तरह दिल्ली में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ आन्दोलन के सिलसिले में जिस तरह युवा विद्यार्थियों व छात्रों को पुलिस संगीन धाराओं के तहत बन्दी बना रही है उस पर भी गौर करने की जरूरत है।

जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय जैसे उच्च श्रेणी के शिक्षा संस्थान में पढ़ने वाले छात्र किसी विशेष विचारधारा से प्रेरित हो सकते हैं मगर उन्हें किसी भी दृष्टि से न तो राष्ट्र विरोधी कहा जा सकता है और न ही विरोध व आन्दोलन करने के अधिकार का इस्तेमाल करने पर अपराधी ठहराया जा सकता है।

संसद के भीतर जब संशोधित नागरिकता कानून पारित हुआ था तो इसका भारी विरोध भी हुआ था, विरोध करने वाली वे ही पार्टियां थी जो कभी न कभी इस देश की हुकूमत चलाया करती थीं। ये सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियां इस मत की हैं कि नागरिकता कानून संविधान के मूल आधारभूत ढांचे का उल्लंघन करता है और देश की न्याय प्रणाली को इस पर अपना अन्तिम फैसला देना है।

इसमें राष्ट्र विरोध जैसी कौन सी बात है।  इन पार्टियों समेत सड़क पर मौजूद रहने वाले विभिन्न संगठन अपने लोकतान्त्रिक अधिकार का ही सक्रिय रूप से प्रयोग करना चाहते हैं, तो सरकार किस तरह इसे रोक सकती है। आश्चर्य है कि पुलिस ने ज.ने. विश्वविद्यालय की दो उच्च शिक्षित सम्मानित छात्राओं सुश्री देवांगना कालिता व नताशा नरवाल को ऐसी, संगीन कत्ल व ऐसा करने का इरादा रखने वाली और साम्प्रदायिक वैमनस्य पैदा करने की साजिश रचने वाली दफाओं के तहत गिरफ्तार किया जिसकी कल्पना सिर्फ वे लोग ही कर सकते हैं जो शिक्षित होने को ही अपराध समझते हों, क्या करामाती काम किया गया कि जब इन दोनों छात्राओं को नागरिकता कानून का विरोध करने के सिलसिले में आयोजित उनके संगठन ‘पिजड़ा तोड़’ द्वारा विगत फरवरी महीने में जाफराबाद इलाके में धरना आयोजित करने के जुर्म में पुलिस के काम में हस्तक्षेप करने के आरोप में मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तार किया गया और उनके मुकदमें को अदालत में पेश किया गया तो उन्हें जमानत दे दी गई मगर अदालत से बाहर आते ही उन पर कत्ल जैसी संगीन दफाओं के तहत नया मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया गया और 14 दिन का रिमांड मांगा गया जिसे अदालत ने सिर्फ दो दिन का ही रखा।

ये दोनोें छात्राएं सम्मानित परिवारों की ही नहीं बल्कि एम फिल और पीएचडी की विद्यार्थी हैं। यह अधिकार तो लोकतन्त्र ने ही सभी राजनैतिक दलों व संगठनों को दिया है कि वे अहिंसक तरीके से अपना विरोध प्रकट करें तो फिर फिजूल में डराने की ‘हिकमत’ से क्या होगा? इस  देश से गांधी और लोहिया की विरासत को क्या कभी अलग किया जा सकता है? हम गतिशील लोकतन्त्र है  जो ‘लल्लू’ को भी ‘लुकमान’ बनाने की क्षमता रखता है।


--आदित्य नारायण चोपड़ा