बैरागी विपक्ष का बेसुरापन

स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में 17वीं लोकसभा से अधिक ‘मुर्दार’ विपक्ष पहले कभी नहीं देखा गया, यह तथ्य बिना किसी पिछले रिकार्ड को रोशनी में लाये इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि सर्वमान्य रूप से पूरे देश में आज किसी भी विपक्षी पार्टी का कोई एक नेता ऐसा नहीं है जिसे देश की 56 प्रतिशत जनता की आवाज के सुर में सुर मिलाता हुआ कहा जा सके। इसकी वजह एक ही हो सकती है कि विपक्षी दल अपने-अपने राजनैतिक स्वार्थों के चलते अपने-अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बचाये रखने की सियासत में मशगूल हैं। 

इसके प्रमाण में एक यही उदाहरण काफी है जिसमें उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के तीन सांसद नीरज शेखर (स्व. चन्द्रशेखर के पुत्र), सुरेन्द्र सिंह व संजय सेठ ने अपनी पार्टी व संसद की सदस्यता से इस्तीफा देकर पुनः राज्यसभा का चुनाव लड़ा और वे भाजपा के टिकट पर जीत कर सदन में आये। सत्तारूढ़ पार्टी में इस प्रकार प्रवेश की घटना संसदीय इतिहास में अनूठी थी क्योंकि तीनों ही सांसदों ने अपने आगे के संसदीय कार्यकाल के लिए निश्चितिता प्राप्त कर ली थी। 

इसमें सत्तारूढ़ दल से ज्यादा विपक्षी दल समाजवादी पार्टी का दोष है जिसने अपने सांसदों के दल-बदल की सूचनाओं पर वक्त रहते कार्रवाई न करके उनके आगे का रास्ता निष्कंटक बना दिया परन्तु इससे सत्तारूढ़ दल का भी दीर्घकालीन भला नहीं हुआ है क्योंकि इस घटना के बाद विभिन्न राज्यों में जो भी उपचुनाव या चुनाव हुए हैं उनमें सत्ताधारी पार्टी की हालत कमजोर हुई है परन्तु इसके बावजूद विपक्ष को हम किसी भी दृष्टि से मजबूत होता नहीं मान सकते। मजबूती अगर कहीं दिखी है तो वह जमीनी राजनीति में आम जनता की भूमिका को लेकर जरूर दिखी है, चाहे वह हरियाणा हो या महाराष्ट्र अथवा प. बंगाल परन्तु यह छिट-पुट विजय घंटिकाएं हैं जो विशिष्ट राज्य की परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। 

हरियाणा में जहां पहले शासन कर रही भाजपा के विरोध में स्पष्ट रूप से जनादेश आया वहीं फिर से उसी की सरकार चुनावों में पानी पी-पी कर कोसने वाले दुष्यन्त चौटाला की पार्टी की मदद से गठित हो गई और महाराष्ट्र में जहां भाजपा व शिवसेना को दर दृष्टि से जनादेश पुनः सत्ता में आने का मिला वहां भाजपा को गला तर करके विरोध करने वाली पार्टियों कांग्रेस व राकांपा ने उसकी साथी शिवसेना की सरकार काबिज करा दी। दोनों ही मामलों में अंततः विपक्ष कमजोर साबित हुआ है। 

हरियाणा में भाजपा का विरोधी ही सरकार बनाते समय उसके समर्थक में बदल गया और महाराष्ट्र में समूचे विपक्ष ने उस शिवसेना के समक्ष हथियार डाल दिये जिसने चुनावों में उसे जी भर कर शासन करने के अयोग्य बताया था। महाराष्ट्र में यदि सरकार कांग्रेस या राकांपा के नेतृत्व में बनती तो स्थिति दूसरी होती क्योंकि तब शिवसेना को स्वीकार करना पड़ता कि उसने कांग्रेस व राकांपा के गठबंधन महाअघाड़ी का विरोध करके राजनैतिक रूप से गलती की थी परन्तु अपने नेतृत्व में दोनों पार्टियों को लाकर उसने तो यह सन्देश दे दिया कि नेतृत्व करने की क्षमता उसके पास ही है। 

विपक्षी दलों का ऐसा व्यवहार साफ बताता है कि उनमें सत्तारूढ़ दल काे सीधे सामने से लेने की क्षमता नहीं है। क्षमता का यह अभाव ही बताता है कि विपक्ष नेतृत्व विहीन है और वह काम चलाऊ तरीके से दैनिक आधार पर सरकार का विरोध करने की नीतियां बनाता और बिगाड़ता रहता है। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह निश्चित रूप से विकट संकट का समय है क्योंकि विपक्ष किसी भी मोर्चे पर वैकल्पिक प्रावधान करने की हैसियत में नहीं है। आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर  मौके के हिसाब से पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह को खड़ा कर देने से क्या होगा जबकि अभी तक विपक्ष की तरफ से कोई भी ऐसा ठोस कार्यक्रम नहीं रखा गया है जिसमें अर्थव्यवस्था के चक्र को फिर से तेजी से घुमाने के रास्ते बताये गये हों? 

इसकी असली वजह यही हो सकती है कि समग्र राष्ट्रीय परिवेश में विपक्ष टुकड़ों में सोच रहा हो। माना कि प. बंगाल के तीन विधानसभा उपचुनावों में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को विस्मयकारी विजय मिली है जिसका सम्बन्ध राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर से जोड़ा जा रहा है। इस मुद्दे पर यदि विपक्ष एकमत है तो वह सरकार के सामने अपनी राय खुल कर स्पष्ट करने से क्यों हिचक रहा है। यहां तक कि राम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ जाने के बावजूद विपक्षी दल इस मामले की अपने-अपने हिसाब से समीक्षा करने में लगे हुए हैं। 

ठीक यही स्थिति हमें कश्मीर मसले पर भी देखने को मिल रही है। सवाल यह नहीं है कि लोकतंत्र में सरकार की हर बात पर राजी हुआ जाये मगर जिस पर विरोध प्रकट किया जाये वह तो कम से कम साफ और दो टूक तरीके से हो। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक कि विपक्ष का कोई एक सर्वमान्य जन नेता नहीं होगा। ऐसे नेता की खोज विपक्षी दलों को अपना-अपना अहम त्याग कर करनी ही होगी तभी वे अपनी-अपनी पार्टियों का वजूद बनाये रख सकते हैं। क्या कयामत है कि सत्ता में आने के लिए परस्पर विरोधी पार्टियां एक न्यूनतम सांझा कार्यक्रम बना सकती हैं परन्तु अपना मूल लोकतान्त्रिक दायित्व पूरा करने के लिए एकीकृत विरोध का न्यूनतम कार्यक्रम नहीं बना सकतीं। इसकी चर्चा होते ही इनमें छोटे-बड़े और ऊंच-नीच का भाव जागृत हो जाता है। 

विपक्ष में बैठे खुद को बड़ा समझने वाले ऐसे नेताओं को कबीर का यह दोहा हमेशा याद रखना चाहिए और अपने बीच से उस वृक्ष के बीजों को सड़कों पर लगा देना चाहिए जो छायादार और फलदार बन कर आम जनता को सुख दें। लोकतंत्र का यही परम रहस्य होता है जिसे संभवतः भाजपा ने भलि भांति समझ कर ही अपनी रणनीति तैयार की है मगर लोकतंत्र में विपक्ष अमर बेल के समान होता है जो बिना मूल (जड़) के ही फैलती जाती है। इतना सा रहस्य विपक्षी दल नहीं समझ पा रहे हैं। संसद का सत्र चल रहा है और विपक्ष के नेता बैरागी बन कर संसद के बाहर ही विरोध प्रदर्शन करने में अपना सम्मान समझ रहे हैं। लोकतंत्र में जिव्हा ही जाह्नवी (गंगा) का काम करती है।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर 
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर। 
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