नई सरकार के लिये आर्थिक चुनौतियां

अर्थव्यवस्था को लेकर रोज चिंताजनक आंकड़े सामने आ रहे हैं। सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी सुस्ती की तरफ है। गाड़ियों को बिक्री घट रही है। शो रूम बंद हो रहे हैं। इन सबके बीच ग्रामीण भारत की हालत भी बेहतर नहीं है। 2018-19 में ग्रामीण मजदूरी में मुश्किल से वृद्धि हुई है। बल्कि मांग, उपभाेग घटा है। ग्रामीण इलाकों में उपभोक्ता उत्पादों की ब्रिकी घटी है। भारतीय अर्थव्यवस्था चार इंजनों पर चलती है। यह इंजन है निर्यात, सरकार का खर्च, निजी निवेश और खपत। इसमें खपत यानी आम लोगों का खर्च सबसे बड़ी ताकत है। निर्यात पहले से ही मृत प्रायः था, बीते दिसम्बर में निजी और सरकारी कंपनियों का निवेश 14 वर्ष के न्यूनतम स्तर पर आ गया था। घाटे की मारी सरकार ने 2018-19 की आखिरी तिमाही का खर्च भी काट दिया गया है।

मकानों से लेकर कार और मोटर साइकिल से होते हुये साबुन, तेल और अन्य उत्पादों तक में मांग की कमी देखी जा रही है। यह गिरावट का ऐसा झटका है जिसके लिये अर्थव्यवस्था हरगिज तैयार नहीं है। पिछले ढाई दशक में पहली बार भारत में खपत गिर रही है यानी 135 करोड़ लोगों की अर्थव्यवस्था की सबसे मजबूत बुनियाद डगमगा रही है। आटोमोबाइल और हाउसिंग सैक्टर दो ऐसे सैक्टर हैं जो कर्ज के सहारे आगे बढ़ते हैं। बकाया ऋणों की वसूली न होने से घाटे के दबाव में बैंक नये कर्ज देने को तैयार नहीं। इस साल एनबीएफसी के वित्तीय संकट में फंसने के बाद कर्ज की पाइप लाइन पूरी तरह बंद हो गई। इसलिये आटोमोबाइल और हाऊसिंग सैक्टर प्रभावित हुआ। दुनिया के विभिन्न देशों का अनुभव बताता है कि जो देश विकास दर के दौरान पर्याप्त रोजगार नहीं बढ़ाते उनके यहां खपत दर गिरती जाती है जो अर्थव्यवस्था के लिए विस्फोटक स्थिति पैदा कर देती है।

2017 में भारत में आम लोगाें की कुल बचत दर बीस साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई थी। उपभोग का दूसरा हिस्सा बचत पर आधारित है जिसमें उपभोक्ता, उत्पाद, खाद्य, कपड़े आदि आते हैं। अगर लोगों की वित्तीय बचत के आंकड़ों को देखा जाये जो 2018 में 6.6 फीसदी रह गई। यानी बचत की कमी के चलते लोग खपत घटाने को मजबूर हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुस्त हो चुकी है। कृषि मजदूरी जनवरी में 1.5 फीसदी और फरवरी में महज दो फीसदी बढ़ी। यही हाल गैर कृषि ग्रामीण मजदूरी का भी रहा। गांवों में मजदूरी न बढ़ने का कारण कृषि उत्पादों की कीमत का नहीं बढ़ना भी रहा। इससे किसानों के सामने तो संकट आया ही बल्कि इससे दूसरे क्षेत्रों की चमक भी फीकी हो गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन राय ने कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था गहरे संकट की तरफ जा रही है। उनका कहना है कि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की तरह भारत भी धीमी गति वाला विकाससील देश बनने की ओर चल रहा है।

उन्होंने चेतावनी भी दी है कि हम एक संरक्षणात्मक मंदी की ओर बढ़ रहे हैं। 1991 के बाद से अर्थव्यवस्था निर्यात के आधार पर नहीं बल्कि भारत की शीर्ष दस करोड़ जनसंख्या के उपभाेग पर बढ़ रही है। इसका अर्थ यही है कि हम दक्षिण कोरिया की तरह नहीं बनेंगे, चीन की तरह नहीं बनेंगे तो हम ब्राजील की तरह बनेंगे। दुनिया के इतिहास में देश मध्य आय के जाल से बचते रहे हैं मगर जो एक बार फंसा तो वह उभर नहीं सका है। अब सवाल उठाया जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत वेंटीलेटर पर लिटाने जैसी हो गई है। इस साल मार्च में इंडस्ट्रियल ग्रोथ 5.3 फीसदी से घटकर -0.1 फीसदी पर आ गई है। यह आंकड़े 23 महीने में सबसे कम हैं।

विशेषज्ञ कहते हैं कि आईआईपी ग्रोथ के गिरने का अनुमान पहले से था लेकिन यह आंकड़ा अनुमान से बेहद खराब है। टैक्स की कमी से संकेत मिल हैं कि आर्थिक वृद्धि दर में कमी आई है। दूसरी छमाही में खासी उम्मीदों के बावजूद टैक्स क्लैक्शन में कमी आई है। इससे पता चलता है कि टैक्स कलैक्शन टारगेट को मुख्य रूप से इस वर्ष हासिल करना मुश्किल होगा। विश्व बैंक द्वारा देशों की लोअर मिडिल इनकम रेंज को परिभाषित किया गया जिसके अनुसार इसकी सीमा 996 डालर और 3895 डालर प्रति सकल राष्ट्रीय आय के बीच होनी चाहिये। भारत की प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय औसत आय 1795 डालर के आसपास है यानी आधे से कम है। भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर है।

मानसून चार दिन की देरी से पहुंचने और इस वर्ष कम मानसून की भविष्यवाणी की गई है। सामान्य से नीचे मानसून के रहने का अर्थ यह है कि पूरे भारत में कृषि में प्रगति सुचारू रूप से नहीं होगी। गुजरात में तो सूखा पड़ने की आशंका है। देश के कई हिस्से तो आज भी जल संकट से जूझ रहे हैं। पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कई हिस्सों में सूखे के चलते खाद्य पदार्थों के दाम बढ़े हैं। आने वाले दिनों में महंगाई बढ़ने के आसार हैं। नई सरकार के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं। उसे अपनी आर्थिक नीतियों को नए सिरे से तय करना होगा।

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