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जेन-जी पर भागवत संदेश

04:22 AM Aug 08, 2026 IST | Aditya Chopra
जेन जी पर भागवत संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जो समय-समय पर महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। उनके हर वाक्य और शब्द की व्याख्या और विश्लेषण भी होता है। उनके हर सम्बोधन का संदेश और अर्थ ढूंढ़े जाते हैं। नीट पेपर लीक और अन्य परीक्षाओं से जुड़ी अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों यानि कॉकरोच जनता पार्टी के सफल आंदोलन के बाद देश के शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को न केवल इस्तीफा देना पड़ा बल्कि मोदी सरकार को नीट परीक्षा सुधारों के लिए कदम उठाने पड़े। साथ ही पेपर लीक के दोषियों को दंडित करने के​ लिए सख्त कानून भी बनाना पड़ा। इस आंदोलन के बाद राजनीतिक घमासान छिड़ा हुआ है। विपक्ष इस मुद्दे को जोर-शोर से उछाल रहा है। इसी बीच संघ प्रमुख ने मुम्बई में जेन-जी से संवाद करते हुए अपना रुख पूरी तह से स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने जेन-जी और जी-अल्फा को पुरानी पीढ़ी से ज्यादा देशभक्त और ईमानदार बताया और कहा कि जेन-जी आंदोलन का अर्थ यह नहीं कि वह राष्ट्र विरोधी है। यह अपने ही लोग हैं। उनसे हमारा संबंध है। जैसे उन्हें हमारी बात समझनी चाहिए वैसे ही हमें भी उनकी बात सुननी चाहिए। उन्होंने पीढ़ीगत बदलाव की ओर संकेत करते हुए यह भी कहा कि हम लोग जब युवा अवस्था में थे तो जो बड़े कहते थे हम मान लेते थे, सवाल नहीं करते थे। आज की पीढ़ी सवाल करती है। उन्हें जवाब चाहिए और प्यार भी चाहिए।
उन्होंने सरकार की गलती पर भी कहा कि अगर सरकार ने पहले ही बात कर ली होती तो आंदोलन की जरूरत ही नहीं होती। छात्रों का आंदोलन हमारे खिलाफ नहीं बल्कि सिस्टम में सुधार के लिए है। संघ के सहकार्यवाह अतुल लिमये ने सीजेपी के आंदोलन को एक केस स्टडी बताते हुए इसे 'एंटी-कॉन्स्टिट्यूशनल' और 'एंटी-नेशनल' करार दिया था। उन्होंने कहा था कि नीट पेपर लीक पर छात्रों का गुस्सा स्वाभाविक था, लेकिन सीजेपी के नेतृत्व वाला प्रदर्शन बड़े राजनीतिक उद्देश्य के साथ संगठित था। लिमये के अनुसार, वामपंथी 'अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स' की अवधारणा को इस आंदोलन के जरिए परखा गया। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के 'ग्रामर ऑफ एनार्की' भाषण का जिक्र करते हुए अराजकतावादी ताकतों के खिलाफ सतर्क रहने की अपील की थी। उन्होंने जोर दिया था कि पेपर लीक से शुरू हुआ आंदोलन शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए था, लेकिन गलत हाथों में पड़ गया। स्वाभाविक रूप से देश के हित की ओर छात्रों का झुकाव होता है।
इसके बाद संघ प्रमुख ने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए अतुल लिमये के बयान से पैदा हुए भ्रम को दूर किया। साथ ही नेतृत्व को लेकर बहुत बड़ा संदेश देते हुए कहा कि सिर्फ भाषण देना, चुनाव जीतना या प्रवचन करना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान नहीं है। आज नेतृत्व को मंच से भाषण देने, चुनाव जीतने तक सीमित समझ लिया जाता है। जबकि वास्तविक नेतृत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। असली नेता वे होते हैं जो पीछे रहकर समाज को मजबूत करते हैं, बल्कि दूसरों को भी नेतृत्व करने योग्य बनाते हैं। उनके इस वक्तव्य को राजनीतिक गलियारों में एक अहम नसीहत के तौर पर देखा जा रहा है।
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि जेन-जी कितने ताकतवर हैं और वे सत्ता को हिलाने का दम रखते हैं। अहम सवाल यह भी है कि आखिर छात्र आंदोलन को इतनी तेजी से और व्यापक समर्थन कैसे मिला? इस समर्थन के पीछे बार-बार पेपर लीक होने से नाराज छात्र ही नहीं थे बल्कि नौकरी ढूंढने के लिए संघर्ष कर रहे बेरोजगार ग्रेजुएट भी थे। यह 30 साल से कम उम्र के भारतीयों की एक बड़ी पीढ़ी है जो यह मान चुकी है कि सरकारें चाहे किसी की भी हों वह जवाबदेह बनने को तैयार नहीं है। जेन-जी ने कई देशों में सत्ता पलट कर नई सरकारों को जवाबदेह बनने को तैयार किया है। जंतर-मंतर से लेकर रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम तक छात्र प्रदर्शन टूटे वादों और संस्थागत विफलता के खिलाफ छात्रों के आक्रोश को दिखाता है। छात्र आंदोलन ने यह साबित किया कि जिस पीढ़ी को हम महज डिजिटल दुनिया में खोई हुई पीढ़ी मानते रहे हैं वह पीढ़ी संस्थागत सुधारों के ​लिए पूरी चेतना के साथ सामने आ सकती है।
एक और बात जो महत्वपूर्ण रही कि युवाओं के इस आंदोलन ने देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों शिक्षा और बेरोजगारी को फिर सार्वजनिक बहस के केन्द्र में ला खड़ा किया है। शिक्षा और बेरोजगारी केवल चर्चा तक सीमित रहे, चुनावी मुद्दा नहीं बने। मोदी सरकार के 12 साल के कालखंड में यह पहला अवसर है कि उसे शिक्षा सुधारों पर गम्भीर मंथन करना पड़ा है। अहम सवाल यह है कि सिर्फ कठोर कानून बनाने से शिक्षा का ढांचा सुधर जाएगा? भारत आज एक युवा देश है। देश को ऐसे शिक्षातंत्र की जरूरत है जिस पर युवाओं का भरोसा हो। प्रतिभाओं के साथ न्याय हो, सम्मान हो। शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत हिस्सा खर्च करने की भी मांग उठ रही है। क्योंकि भारत में केवल 2 प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च किया जाता है। शिक्षा तंत्र को लेकर गम्भीर आत्ममंथन की जरूरत है। शिक्षा को रोजगार उन्मुखी बनाया जाना चाहिए। संघ प्रमुख मोहन भागवत का संदेश साफ है कि अब जेन-जी को गम्भीरता से लेना ही होगा।

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Aditya Chopra

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