हाय राम : लूट या चोरी?
जब भारत सरकार के एक पूर्व सचिव ने यह बताया कि उन्होंने और उनके परिवार ने अयोध्या स्थित राम मंदिर को स्वर्ण-मंडित रामचरितमानस भेंट की है, तो यह खबर व्यापक चर्चा का विषय बन गई। लेकिन इससे भी अधिक चिंता तब हुई, जब यह सामने आया कि इस ग्रंथ का मूल्य लगभग पांच करोड़ रुपये था। प्रारंभ में इसे मंदिर परिसर में प्रदर्शित किया गया, किंतु बाद में वहां से हटाकर किसी अन्य स्थान पर रख दिया गया। वर्ष 2023 में एस. लक्ष्मी नारायण और उनकी पत्नी सरस्वती ने 151 किलोग्राम वजनी रामचरित मानस, जिसे तांबे पर स्वर्णाक्षरों में अंकित किया गया था, अयोध्या के राम मंदिर को समर्पित किया था। इस ग्रंथ के निर्माण के लिए दंपति ने अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी, यहां तक कि परिवार की कुछ संपत्तियां बेचकर प्राप्त राशि भी खर्च कर दी। इसके निर्माण पर लगभग पांच करोड़ रुपये की लागत आई थी।
इस अलंकृत ग्रंथ में कुल 10,902 चौपाइयां और श्लोक तांबे के पृष्ठों पर अंकित हैं। इन पृष्ठों पर 24 कैरेट सोने की परत चढ़ाई गई है तथा अक्षरों को भी स्वर्ण से अलंकृत किया गया है। यह ग्रंथ अप्रैल 2024 में मंदिर को समर्पित किया गया। प्रारंभिक दिनों में इसे प्रतिदिन भगवान रामलला की प्रतिमा के समक्ष पूजा-अर्चना के लिए रखा गया था, जिसकी तस्वीरें भी लक्ष्मी नारायण को भेजी गई थीं। हालांकि, कुछ समय बाद यह ग्रंथ सार्वजनिक रूप से दिखाई देना बंद हो गया।
मंदिर के कई चक्कर लगाने और ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से मिलने के लिए कई दिनों तक इंतजार करने के बाद जब लक्ष्मी नारायण की उनसे मुलाकात हुई, तो उन्हें बताया गया कि मंदिर को प्राप्त सभी भेंटों को प्रदर्शित करना संभव नहीं है। लक्ष्मी नारायण का आरोप है कि अंतिम बातचीत के दौरान चंपत राय ने उनसे कहा-मैं जो चाहूंगा, वही करूंगा। मुझे बार-बार परेशान मत कीजिए। आज लक्ष्मी नारायण स्वयं को आहत और निराश महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी श्रद्धापूर्वक की गई यह भेंट “लूट” ली गई है।
अपने परिवार के भगवान राम और राम मंदिर आंदोलन से गहरे जुड़ाव को याद करते हुए लक्ष्मी नारायण ने बताया कि उनके परिवार के पास सदियों पुरानीरामायणकी एक प्रति है। उनका कहना है कि जब लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राम मंदिर आंदोलन के दौरान पहली बार राम मंदिर के लिए ईंट संग्रह अभियान शुरू हुआ था, तब पहली ईंट उनकी पत्नी के त्रिवेंद्रम स्थित मायके से भेजी गई थी, जिसे बाद में कन्याकुमारी ले जाया गया। लक्ष्मी नारायण ने यह भी बताया कि उनके द्वारा श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को भेंट की गई इसी प्रकार की श्रीमद्भागवत का वहां प्रतिदिन विधिवत पूजन होता है। इसके लिए उन्हें समुचित दस्तावेज और आधिकारिक रसीद भी उपलब्ध कराई गई थी। हालांकि, लक्ष्मी नारायण अकेले ऐसे दानदाता नहीं हैं। यह कोई एकाकी घटना भी नहीं है। दान की राशि या मूल्य चाहे जितना भी रहा हो, ऐसे कई अन्य लोग हैं जो इसी प्रकार के अनुभव साझा कर रहे हैं।
राम मंदिर को दान में दी गई चांदी की ईंटों और सिल्लियों के गायब होने के भी कई आरोप सामने आए हैं। उदाहरण के तौर पर, चार किलोग्राम वजनी चांदी की एक ईंट के लापता होने का मामला भी चर्चा में है। इसके अलावा यह आरोप भी लगाए गए हैं कि मंदिर को दान में मिले स्वर्ण आभूषण चोरी कर उन्हें पिघलाकर सोने के बिस्कुटों (गोल्ड बिस्किट) में बदल दिया गया। ऐसा किए जाने की आशंका इसलिए भी जताई जा रही है क्योंकि इससे मूल दान की पहचान समाप्त हो जाती है। इन सभी आरोपों की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा की जा रही है। अयोध्या राम मंदिर में दान की कथित चोरी के मामले पर आलोक कुमार ने एक राष्ट्रीय दैनिक से कहा, ‘हम आहत हैं, हमें शर्म है और हमें खेद है।’ चूंकि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के संचालन की जिम्मेदारी चंपत राय के पास है, जो स्वयं विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारी भी हैं, इसलिए इस पूरे मामले में विश्व हिन्दू परिषद का रुख अपेक्षाकृत नरम माना जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि विश्व हिन्दू परिषद के उपाध्यक्ष चंपत राय राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव हैं और वर्तमान में जांच के दायरे में हैं। आलोचकों का कहना है कि नैतिक आधार पर चंपत राय से स्वयं को अलग करने, उनके विरुद्ध संगठनात्मक कार्रवाई करने या सार्वजनिक रूप से जवाबदेही तय करने के बजाय विश्व हिन्दू परिषद उनकी भूमिका को महज ‘लापरवाही’ तक सीमित बताकर मामले की गंभीरता को कम करके पेश कर रही है। आलोक कुमार ने इस पूरे घटनाक्रम को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताते हुए मामले की गहन जांच की आवश्यकता पर बल दिया है। हालांकि, अब तक विश्व हिन्दू परिषद की ओर से ‘हम आहत हैं’ कहने के अलावा कोई ठोस कदम सामने नहीं आया है। संगठन ने न तो चंपत राय से सार्वजनिक दूरी बनाई है और न ही उन्हें परिषद से हटाने की दिशा में कोई कार्रवाई की है। हालांकि आलोक कुमार के हवाले से यह कहा गया है कि ‘किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी’ लेकिन फिलहाल इस दिशा में कोई ठोस पहल दिखाई नहीं देती। फिलहाल ये बातें महज़ खोखले आश्वासन प्रतीत होती हैं। कानूनी कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन इससे पहले यह भी अपेक्षित है कि चाहे विश्व हिन्दू परिषद हो या स्वयं राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, जांच के दायरे में आए लोगों के विरुद्ध संगठनात्मक स्तर पर भी सख्त कार्रवाई करे। शुरुआत ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा से होनी चाहिए।
यद्यपि मामले की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) कर रहा है, लेकिन राज्य सरकार द्वारा गठित किसी भी जांच एजेंसी की अपनी विश्वसनीयता संबंधी चुनौतियां होती हैं। उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है और उस पर सत्ता के इशारे पर काम करने के आरोप भी लग सकते हैं। विशेष रूप से इस मामले में स्थिति दोधारी तलवार जैसी है और जांच की निष्पक्षता तथा वस्तुनिष्ठता को लेकर पर्याप्त आशंकाएं मौजूद हैं। एक ओर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लंबे समय से इस बात से असंतुष्ट बताए जाते रहे हैं कि राम मंदिर के संचालन और प्रबंधन में राज्य सरकार की कोई भूमिका या अधिकार नहीं है।
उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में केंद्र और राज्य-दोनों सरकारों को अत्यंत सावधानी से कदम उठाने होंगे, क्योंकि मंदिर में दान की कथित लूट का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव गंभीर हो सकता है। दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई होगी, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आखिर जवाबदेही किस स्तर तक तय की जाती है और किन-किन लोगों पर इसकी आंच पहुंचती है।
फिलहाल कार्रवाई की जद में अपेक्षाकृत छोटे स्तर के लोग दिखाई दे रहे हैं। बड़ा प्रश्न यह है कि प्रभावशाली और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों का क्या होगा? क्या केवल इस्तीफे पर्याप्त होंगे? यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि चंपत राय, अनिल मिश्रा या अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी कथित अनियमितताओं में प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे या नहीं। किंतु यदि वे इन घटनाओं से अनभिज्ञ रहे अथवा जानबूझकर आंखें मूंदे रहे, तो उनके विरुद्ध ठोस कार्रवाई का समय आ चुका है। यदि यह केवल लापरवाही भी मानी जाए, तो वह साधारण नहीं बल्कि आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आएगी, जिसे न तो नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही क्षमा किया जा सकता है। जैसा कि विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने स्वयं कहा है, यह ‘दंडनीय’ है।
समग्र रूप से देखा जाए तो यह मामला केवल सोना, चांदी और नकदी की कथित चोरी या लूट तक सीमित नहीं है। यह देशभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा प्रश्न है-वह आस्था जिसे भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर आंदोलन के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया और जिसे लंबे समय तक अपने राजनीतिक विमर्श का प्रमुख आधार बनाया। ऐसे में संबंधित पक्षों पर केवल देश के सामने स्पष्टीकरण देने की ही नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि इस गंभीर त्रुटि का प्रभावी और पारदर्शी ढंग से समाधान किया जाए तथा भगवान राम के श्रद्धालुओं और पूरे देश के विश्वास की पुनर्स्थापना हो।

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