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सिस्टम की लापरवाही बयां करते खुले मैनहोल

04:15 AM Jul 08, 2026 IST | Team Desk
सिस्टम की लापरवाही बयां करते खुले मैनहोल

देश में शहर कोई भी हो, कस्बा कोई भी हो, मैनहोल-बोरवैल का खुला रह जाना सामान्य सी बात है। ऐसे में बारिश के मौसम में अगर आप वाहन से या पैदल किसी सड़क से निकल रहे हैं तो बहुत सावधानी बरतें। सड़क के बीचोंबीच कोई मैनहोल खुला हो सकता है और आप मौत के कुएं में समा सकते हैं। हाल ही में मुंबई की बारिश ने एक बार फिर नगर निगम के दावों की पोल खोल दी। सड़क पर खुले पड़े मैनहोल ने एक और जिंदगी निगल ली। मामूली बारिश के बीच 55 वर्षीय शख्स सड़क पर चल रहा था, लेकिन खुले मैनहोल में गिरने के बाद वह सीधे मौत के मुंह में समा गया। सवाल यह है कि आखिर हर मानसून में मौत के ऐसे जाल क्यों बिछे रहते हैं?
यह सिर्फ मुंबई की समस्या नहीं है। देशभर के कई शहरों में हर मानसून के मौसम में ऐसी ही घटनाएं होती हैं। कहीं मैनहोल के ढक्कन गायब रहते हैं, तो कहीं चेतावनी देने वाले साइन बोर्ड नहीं लगे रहते हैं। इन लापरवाही से पैदल चलने वालों, दोपहिया वाहन सवारों और बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा होता है। हर साल खुले मैनहोल, सीवर और नालों से जुड़े हादसों में 800-900 लोग अपनी जान गंवा देते हैं। औसतन, हर दिन ऐसे हादसों में लगभग दो से तीन लोगों की मौत होती है। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे सैंकड़ों परिवारों की कहानियां छुपी हैं जिन्होंने ऐसे हादसों में किसी अपने को खोया है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर हर मानसून के बाद भी हालात नहीं बदलते हैं तो इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?
देशभर में मानसून की पहली बारिश होते ही सड़कें नदियों में बदल जाती हैं, गाड़ियां पानी में डूब जाती हैं, ट्रेनें प्रभावित होती हैं, लोग घंटों जाम में फंस जाते हैं और कई बार तो घर से निकला इंसान जिंदा वापस भी नहीं लौट पाता। सवाल सिर्फ बारिश का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो हर साल एक जैसी त्रासदी के बावजूद सबक नहीं लेती। मुंबई के साकीनाका का हादसा किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुआ। बीएमसी ने सफाई के लिए मैनहोल का ढक्कन खुला छोड़ा था, लेकिन वहां न बैरिकेट लगाए गए, न चेतावनी बोर्ड और न ही सुरक्षा के कोई इंतजाम किए गए। यह हादसा किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुआ। मुंबई जैसे शहर में कई दु:खद घटनाओं के बावजूद मैनहोल को सुरक्षित न कर पाना प्रशासनिक विफलता का सबूत नहीं तो और क्या है। 2017 में मुंबई में जाने-माने गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. दीपक अमरापुरकर की मौत चर्चा में आई थी, जब बारिश में मैनहोल में गिरने से उनकी मौत हो गई थी।
बीते दिनों पुणे के लोणी काळभोर इलाके में दो वर्षीय सोहम लखन कस्बे घर के बाहर खेल रहा था। सीवेज और बारिश के पानी की निकासी के लिए खोदे गए गड्ढों को बिना बैरिकेटिंग के खुला छोड़ दिया गया था। बारिश का पानी भरने से गड्ढा दिखाई नहीं दे रहा था। खेलते समय सोहम उसमें गिर गया और डूबने से मौत हो गई। बीती फरवरी को दिल्ली के रोहिणी स्थित बेगमपुर इलाके में मैनहोल में गिरने से 30 वर्षीय युवक बिरजू कुमार की मौत हो गई थी। इस घटना से पहले पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी इलाके में दिल्ली जल बोर्ड की ओर से खोदे गए गड्ढे में गिरने से 25 वर्षीय बैंक कर्मचारी की मौत हो गई थी। हाल ही में इस से जुड़ी घटना छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिली जहां 10 वर्ष का राहुल 65 घंटे से भी ज्यादा मैनहोल में फंसा रहा। वहीं बिहार के पटना में कई जगह मैनहोल हैं जिन पर ढक्कन नहीं है जिसकी वजह से आए दिन वहां दुर्घटनायें होती रहती हैं।
ये घटनाएं हमें बताती हैं कि बारिश के मौसम में स्थानीय निकायों की लापरवाही व खराब इंजीनियरिंग के चलते कैसे लोगों का जीवन जोखिम में पड़ जाता है। ये असुरक्षित ड्रेनेज संरचना की घातकता को ही दर्शाता है। विडंबना है कि हमारा तंत्र सालभर सोया रहता है और जब बरसात शुरू होने को होती है, तब मरम्मत- नालों की सफाई के काम की औपचारिकता पूरी करता है। बहरहाल, इन सभी घटनाओं के मूल में एक बात तो समान है कि स्थानीय निकाय व प्रशासन जोखिमों का समय रहते अनुमान नहीं लगा पाते हैं। यह तथ्य सभी अधिकारी जानते हैं कि एक निश्चित समय पर मानसून आता है। बाकायदा समय-समय पर सूचना माध्यमों में मौसम विभाग द्वारा मानसून की भविष्यवाणी की जाती है लेकिन अधिकारी तब जागते हैं जब स्थितियां जटिल हो जाती हैं। वे इन हालातों को अप्रत्याशित आपात स्थिति के रूप में दर्शाने का प्रयास करते हैं। दरअसल,कई स्तरों पर होने वाली कमीशनखोरी व राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते अकसर ठेकेदारों की जवाबदेही तय नहीं की जाती है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 9 सालों में देश के भीतर मैनहोल या सीवर में गिरने से 1200 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। सबसे डरावनी बात यह है कि साल 2023 के मुकाबले 2024 में इन मौतों के मामलों में अचानक एक बहुत बड़ा उछाल आया है। आंकड़ें बताते हैं कि साल 2023 में जहां मैनहोल और सीवर में गिरने से कुल 119 लोगों का मौत हो गई थी। इसके अगले साल यानी 2024 में यह आंकड़ा 61 प्रतिशत से ज्यादा की छलांग लगाकर 192 पर पहुंच गया। खुले मैनहोल सिस्टम की लापरवाही की कहानी बयां करते हैं।
मैनहोल में गिरकर जान गंवाने वालों में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी शामिल हैं। सड़क चलती कई महिलाओं को इन खुले मैनहोल ने अपना शिकार बनाया है। साल 2023 में मैनहोल में गिरने से जहां 11 महिलाओं की मौत हुई थी, वहीं अगले साल 2024 में ये संख्या बढ़कर 21 हो गई। साल 2022 इन नौ सालों में सबसे भयानक रहा, जब रिकॉर्ड 207 लोगों की मौत खुले सीवर या मैनहोल में गिरने की वजह से हुई। इसमें 179 पुरुष और 28 महिलाएं शामिल थीं। वहीं 2023 में थोड़ी गिरावट के बाद 2024 में यह आंकड़ा 192 मौतों पर पहुंच गया। भारत में मानसून के मौसम में खतरा और बढ़ जाता है। लोकल म्युनिसिपल बॉडी की लापरवाही और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर मानसून के मौसम में होने वाली दुर्घटनाओं का मुख्य कारण हैं।
सरकार और प्रशासन को इसके लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करनी चाहिए। खासतौर पर बारिश के मौसम से पहले स्थानीय प्रशासन को युद्ध स्तर पर मैनहोल और खुले सीवर को बंद करना चाहिए। मरम्मत या सफाई के दौरान नगर निगम द्वारा मैनहोल के चारों ओर मजबूत बैरिकेड्स और चेतावनी बोर्ड लगाना अनिवार्य होना चाहिए। मैनहोल के मुख्य ढक्कन के नीचे एक सुरक्षात्मक लोहे की जाली लगाई जानी चाहिए, ताकि ढक्कन हटने पर भी कोई अंदर न गिर सके। इंजीनियरिंग मानकों को सख्ती से लागू किया जाए, गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच हो और ठेकेदार को कानूनी रूप से जवाबदेह बनाया जाए। मानसून शुरू होने से ठीक पहले स्थानीय निकायों द्वारा हर वार्ड के सीवरों की जांच कर टूटे ढक्कनों को तुरंत बदला जाना चाहिए। वहीं लापरवाही बरतने वाले ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर सीधे आपराधिक मुकदमा दर्ज हो। आखिरकार यहां सवाल एक जिंदगी का है।

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