पाकिस्तान की अल्पसंख्यक नीति जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग
पाकिस्तान वर्षों से स्वयं को अल्पसंख्यकों का हितैषी और धार्मिक स्वतंत्रता का पक्षधर बताने का प्रयास करता रहा है। विशेषकर जब सिख श्रद्धालुओं की यात्रा, करतारपुर कॉरिडोर या अन्य धार्मिक आयोजनों की बात आती है तब वहां की सरकार और प्रशासन स्वयं को सहिष्णु और उदार राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ते लेकिन प्रश्न यह है कि यदि वास्तव में पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के अधिकारों का इतना बड़ा संरक्षक है तो उसके अपने देश में अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों की दुर्दशा क्यों दिखाई देती है? देश के विभाजन के बाद से लेकर आज तक पाकिस्तान में हजारों मंदिर, गुरुद्वारे और अन्य धार्मिक स्थल या तो पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए, या उन पर अवैध कब्जे कर लिए गए अथवा उन्हें अन्य उपयोगों में परिवर्तित कर दिया गया।
हाल ही में फैसलाबाद (पूर्व नाम फारुखाबाद) स्थित लगभग 125 वर्ष पुराने गुरुद्वारा साहिब को ध्वस्त किए जाने की घटना ने एक बार फिर पाकिस्तान के उन दावों की पोल खोल दी है जिनमें वह धार्मिक सहिष्णुता का ढोल पीटता है। इसी प्रकार कई ऐतिहासिक गुरुद्वारों से गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश हटाकर वहां स्कूल या अन्य संस्थान चलाए जाने की खबरें भी सामने आती रही हैं। यह केवल भवनों का प्रश्न नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रश्न है। विडंबना यह है कि एक ओर पाकिस्तान भारतीय सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों को श्रद्धा और सम्मान का संदेश देते हुए अपने यहां आने का निमंत्रण देता है, वहीं दूसरी ओर उसके अपने देश में रहने वाले अल्पसंख्यक भय, असुरक्षा और भेदभाव का सामना करने को विवश हैं।
धार्मिक स्थलों पर अतिक्रमण, जबरन धर्म परिवर्तन, अल्पसंख्यक समुदाय की बेटियों के अपहरण और न्याय पाने में आने वाली कठिनाइयों जैसे मुद्दे समय-समय पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी उठते रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की कथनी और करनी के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि पाकिस्तान वास्तव में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के सम्मान में विश्वास रखता है तो उसे केवल प्रचार और प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे अपने देश में स्थित सभी धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, अवैध कब्जों को हटाना होगा, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करनी होगी। यह केवल भारत या सिख समुदाय का विषय नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा वैश्विक प्रश्न है। श्री अकाल तख्त साहिब की गरिमा कायम रखना बेहद जरुरी श्री
अकाल तख्त साहिब की स्थापना छठे गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी ने की थी तभी से यह संसार भर के सिखों के लिए सर्वोच्च धार्मिक स्थल है और यहां से जारी फरमान को हर सिख मानने के लिए बाध्य रहता है। महाराजा रणजीत सिंह जैसे शक्तिशाली शासक ने भी अकाल तख्त के आदेश को सिर झुकाकर स्वीकार किया और धार्मिक अनुशासन के समक्ष स्वयं को प्रस्तुत किया, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सिख समाज के एक वर्ग में यह चिंता लगातार सुनाई देती है कि श्री अकाल तख्त साहिब के कुछ निर्णयों को लेकर निष्पक्षता पर प्रश्न उठ रहे हैं। यदि समाज के किसी वर्ग को यह महसूस होने लगे कि अलग-अलग व्यक्तियों या समूहों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाए जा रहे हैं, तो इससे संस्था के प्रति विश्वास प्रभावित हो सकता है।
चाहे यह धारणा सही हो या गलत, उसका उत्पन्न होना ही गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है। इतिहास बताता है कि श्री अकाल तख्त किसी राजनीतिक दल, सरकार, संगठन या प्रभावशाली व्यक्ति का नहीं है। यह पूरी सिख कौम की साझा विरासत है, इसलिए इसके प्रत्येक निर्णय में पारदर्शिता, समानता और मर्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए। जब संस्था हर व्यक्ति के साथ बिना किसी भेदभाव के एक जैसा व्यवहार करती है, तभी उसका नैतिक अधिकार और अधिक मजबूत होता है। यदि श्री अकाल तख्त साहिब को आने वाली पीढ़ियों के लिए उसी सम्मान और विश्वास के साथ बनाए रखना है, जैसा हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा है तो उसे हर प्रकार की राजनीतिक धारणा और विवाद से ऊपर दिखाई देना होगा। क्योंकि जब श्री अकाल तख्त की गरिमा मजबूत होगी तभी सिख पंथ की एकता और विश्वसनीयता भी मजबूत होगी। श्री अकाल तख्त साहिब केवल एक तख्त नहीं, बल्कि गुरु साहिब की स्थापित वह मर्यादा है, जिसके सामने हर सिख श्रद्धा से शीश
नवाता है। इस आस्था की रक्षा करना पूरे पंथ की साझा जिम्मेदारी है।
सतलुज - न्याय की पुकार या राजनीति का नया अखाड़ा?
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन से प्रेरित फिल्म पंजाब-95, जिसे बाद में सतलुज नाम से प्रस्तुत किया गया, एक बार फिर पंजाब के इतिहास के उस दर्दनाक दौर को चर्चा के केंद्र में ले आई है, जिसे भूल पाना आज भी आसान नहीं है। लंबे समय तक रिलीज़ को लेकर चली अनिश्चितता के बाद जब यह फिल्म डिजिटल मंच पर उपलब्ध हुई तो अनेक लोगों ने इसे देखा और 1980-90 के दशक के पंजाब, मानवाधिकारों और न्याय से जुड़े प्रश्नों पर फिर से चर्चा शुरू हो गई। बाद में फिल्म के प्लेटफ़ॉर्म से हटने की खबर ने भी लोगों के मन में कई सवाल पैदा किए। ऐसे मामलों में पारदर्शिता और स्पष्ट संवाद हमेशा आवश्यक होते हैं, ताकि अटकलों की जगह तथ्य सामने आ सकें लेकिन इस पूरी बहस का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जसवंत सिंह खालड़ा जैसे व्यक्ति जिन्होंने मानवाधिकारों और जवाबदेही के मुद्दों को उठाया, उनका नाम आज भी कई बार राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है। इतिहास के ऐसे संवेदनशील विषयों को राजनीतिक लाभ या हानि के चश्मे से देखने के बजाय न्याय और सत्य के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर जसवंत सिंह खालड़ा की धर्म पत्नी परमजीत कौर खालड़ा एवं उनकी बेटी के पुराने साक्षात्कार व्यापक रूप से साझा किए जा रहे हैं। इन साक्षात्कारों में वे दावा करती हैं कि 1997 के पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ राजनीतिक नेताओं ने जसवंत सिंह खालड़ा मामले में दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई और न्याय दिलाने का वादा किया था लेकिन सरकार बनने के बाद उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप कदम नहीं उठाए गए।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, किंतु यदि यह धारणा समाज में बनी रही है, तो यह भी लोकतांत्रिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय है। यदि किसी राजनीतिक दल ने जो सदैव स्वयं को पंथक हितैशी के तौर पर पेश करके राजनीति लाभ की पूर्ति करता आया हो, मगर राज सत्ता को सुख भोगी बनने के बाद उनकी सुनवाई न की हो तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उन वादों का क्या परिणाम निकला, वहीं यदि ऐसे दावे तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं, तो उनका स्पष्ट और प्रमाण आधारित उत्तर भी सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में जवाबदेही केवल वर्तमान की नहीं, बल्कि अतीत की भी होती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जसवंत सिंह खालड़ा का संघर्ष किसी एक दल, सरकार या विचारधारा का नहीं था। उनका नाम मानवाधिकार, कानून के शासन और सत्य की खोज से जुड़ा है। इसलिए उनकी विरासत का सम्मान तभी होगा जब उसे चुनावी बहस या राजनीतिक लाभ का माध्यम बनाने के बजाय न्याय और ऐतिहासिक सत्य के संदर्भ में देखा जाए।
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