चढ़ावा चोरी पर राजनीति !
अयोध्या में श्रीराम मन्दिर तीर्थ क्षेत्र के लिए बने न्यास (ट्रस्ट) की बैठक में इसके महासचिव चंपत राय व सदस्य अनिल मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार कर लिये जाने के बाद यह फैसला किया गया कि मन्दिर के सामान्य संचालन के लिए एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नियुक्त किया जायेगा जिसकी खोज एक तीन सदस्यीय समिति करेगी। इसके साथ ही ट्रस्ट ने अस्थायी तौर पर अपने एक सदस्य कृष्ण मोहन को महासचिव नियुक्त कर दिया। श्री कृष्ण मोहन एक अवकाश प्राप्त वन अधिकारी हैं और श्रीराम मन्दिर आन्दोलन से भी जुड़े रहे हैं। उनकी छवि एक कुशल प्रशासक के रूप में भी देखी जाती है। ट्रस्ट ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी की खोज के लिए एेसी तीन सदस्यीय समिति घोषित की है जिसकी विश्वसनीयता पर कोई भी आसानी से सवालिया निशान न लगा सके। इसमें अवकाश प्राप्त न्यायाधीश प्रमोद कोहली, अवकाश प्राप्त लेफ्टिनेंट जनरल विष्णु कान्त चतुर्वेदी व सुरेश हावड़े होंगे।
जाहिर है कि ट्रस्ट की यह कवायद श्रीराम मन्दिर में चढ़ावा चोरी की घटना उजागर होने के बाद उसके नाम पर लगे बट्टे को थामने की प्रक्रिया है जिससे ट्रस्ट की विश्वसनीयता लौट सके। चढ़ावा चोरी के बाद उत्तर प्रदेश समेत देश की विपक्षी पार्टियां जिस तरह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को चारों तरफ से घेर रही हैं उसमें निश्चित रूप से राम भक्ति कम है और राजनीति ज्यादा है क्योंकि 2027 के मध्य तक उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। राज्य में भाजपा की योगी आदित्यनाथ की सरकार पिछले 2017 से चल रही है और उसकी लोकप्रियता भी बरकरार है परन्तु 2024 में हुए लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर भाजपा से ज्यादा सीटें जीत ली थीं इसलिए ये पार्टियां चाहती हैं कि विधानसभा चुनावों तक चढ़ावा चोरी का मुद्दा किसी न किसी रूप में जीवित रहे जिससे भाजपा को उसी के हिन्दुत्व व राम मन्दिर आन्दोलन की जमीन पर घेरा जा सके।
दूसरी तरफ मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने चढ़ावा चोरी के आरोप लगने के तुरन्त बाद जिस तरह मामले की पड़ताल करने के लिए विशेष जांच दल का गठन किया और उसे अपनी रिपोर्ट सिर्फ 15 दिन में देने के लिए कहा उससे विपक्षी पार्टियों को धक्का लगा और उन्होंने जांच दल गठित करने की प्रक्रिया को ही संदेह के घेरे में लेना शुरू कर दिया परन्तु जांच दल ने अपनी अन्तरिम रिपोर्ट पांच दिन बाद ही देकर चढ़ावा चोरी की पुष्टि की और इसके लिए मन्दिर प्रबन्धन के आठ कर्मचारियों के साथ कुछ अन्य लोगों पर भी शक की अंगुली उठाई। इसके बाद आठ मन्दिर कर्मचारियों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई और उन्हें गिरफ्तार करके अदालत के सामने पेश किया गया। जांच दल ने जिन अन्य लोगों पर शक की अंगुली उठाई थी उनमें ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय सबसे पहले निशाने पर आते थे क्योंकि महासचिव होने के नाते मन्दिर के सकल संचालन की जिम्मेदारी उन्हीं की थी। इसके अलावा एक अन्य सदस्य अनिल मिश्रा कर्मचारियों की नियुक्ति करने में अग्रणी माने जाते थे। ट्रस्ट ने कर्नाटक के गोपाल राव को भी ट्रस्ट से अलग कर दिया जो कि विशेष आमन्त्रित सदस्य के रूप में ट्रस्ट की बैठकों में भाग लेते थे। विपक्षी दल के नेता उन पर आरोप लगा रहे थे कि ट्रस्ट के केवल आमन्त्रित सदस्य होने के बावजूद वह मन्दिर प्रबन्धन में पूरा दखल रखते थे और उनका एक कथित भतीजा चढ़ावे का धन बोरियों में भरकर रेलगाड़ी से अपने राज्य कर्नाटक ले जाता था और अयोध्या वापस हवाई जहाज से लौटता था। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि मन्दिर प्रबन्धन में चढ़ावे के धन की प्रतिदिन गिनती करने वाले कुछ कर्मचारियों को जेल भेज कर सरकार बड़ी मछलियों को बचा रही है।
अतः ट्रस्ट की कल हुई बैठक के बाद इसके कोषाध्यक्ष गोविन्द गिरी महाराज ने साफ कर दिया है कि चोरी कांड की जांच करने वाले दल की हर सिफारिश को ट्रस्ट स्वीकार करेगा और दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करेगा जिससे लोगों में यह विश्वास पैदा हो सके कि उनकी श्रीराम के प्रति आस्था पर जिन लोगों ने भी चोट लगाने का काम किया है उनके साथ ‘इह-लोक’ में किसी प्रकार की नरमी नहीं बरती जायेगी। जहां तक विपक्षी दलों का सवाल है तो उनकी आलोचना राजनीति को केन्द्र में रख कर की जा रही है क्योंकि जो लोग कल तक भगवान श्रीराम के अस्तित्व को ही काल्पनिक मान रहे थे और अयोध्या में मन्दिर निर्माण के आन्दोलनकारियों पर अपनी सरकार रहते गोलियां चलवा रहे थे वे आज राम के सबसे बड़े भक्त बने घूम रहे हैं। योगी आदित्यनाथ एेसे लोगों को कालनेमि की संज्ञा पहले ही दे चुके हैं परन्तु मूल मुद्दा चढ़ावा चोरी का है जिसे वाजिब तौर पर देश का कोई भी नागरिक या संगठन उठा सकता है। मगर इसका मतलब यह भी नहीं है कि मनघड़न्त आरोपों की बौछार लगा दी जाये और कहा जाने लगे कि उनकी दान की हुई कीमती वस्तुओं को भी गायब कर दिया गया है।
ट्रस्ट की ओर से ब्यौरा दिया गया है कि मन्दिर को दान की गई हर कीमती वस्तु पूर्णतः सुरक्षित है और राम मन्दिर से जुड़े विभिन्न स्थलों की शोभा बढ़ा रही है। ट्रस्ट ने कल मन्दिर को मिले कुल दान का भी आंकड़ा जारी किया और चढ़ावे में चढ़ी कुल रकम की भी जानकारी दी। ब्यौरे में बताया गया है कि 31 मार्च, 2026 तक रकम के रूप में श्रीराम के चरणों में कुल 582 करोड़ रुपये प्राप्त हुए जिसमें से 319 करोड़ रुपये मन्दिर के रख-रखाव आदि पर खर्च हुए और शेष धनराशि बैंकों में जमा है। मन्दिर के निर्माण के लिए कुल 3246 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त हुई थी जिसमें से 2370 करोड़ इसके निर्माण पर खर्च किये गये। इसके अलावा जो अन्य कीमती सामान जैसे सोने-चांदी से बनी वस्तुएं आदि हैं वे सभी पूर्णतः सुरक्षित हैं। इसे देखकर कहा जा सकता है कि ट्रस्ट के पदाधिकारियों की निद्रा भंग हो चुकी है और वे अपनी साख को बरकरार रखने के लिए पूरी पारदर्शिता बरतना चाहते हैं। इसलिए विपक्ष को भी अब आरोप लगाने से पहले सौ बार सोचना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि उनके कथनों से कहीं हिन्दू समाज में उनकी छवि भी राम के नाम पर राजनीतिक मुनाफा कमाने वाले संगठनों के रूप में न उभरने लगे।

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