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तुगलक के शासन में विरासत की चोरी ?

05:30 AM Aug 03, 2026 IST | Dr. Chander Trikha
तुगलक के शासन में विरासत की चोरी
तुगलक

इतिहास के पृष्ठों में विरासत की इस ऐतिहासिक चोरी को सही ढंग से तरतीब अभी भी नहीं दी जा रही। हमारे राष्ट्र-चिह्न के रूप में सम्राट अशोक के जिस कीर्ति स्तम्भ का जिक्र होता है, क्या उसे भी मूल स्थापना-साल चोरी किया गया था? प्राप्त विवरण के अनुसार सम्राट अशोक ने फतेहाबाद (हरियाणा) के बाबा पीर मोहल्ले में स्थित किले के प्रांगण में जहां एक कीर्ति-स्तम्भ स्थापित कराया था, वहां से भी उसे उन दिनों सम्राट फिरोजशाह तुगलक ने उखड़वा कर दिल्ली में स्थापित करा लिया था।

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एक अन्य विवरण के अनुसार, इसी कीर्ति स्तम्भ का एक और भाग जिला अम्बाला के टोपरा गांव और एक स्तम्भ मेरठ (उत्तर प्रदेश) में स्थापित था। इसी अशोक की लाट (स्तंभ) को 12वीं शताब्दी में दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने उखड़वा लिया था? मुख्य रूप से हरियाणा के अंबाला जिले के टोपरा गांव और उत्तर प्रदेश के मेरठ में स्थित दो स्तंभों को भारी सुरक्षा, 40 से 42 पहियों वाली विशेष बैलगाडि़यों और यमुना नदी के रास्ते ‘बजरे’ के जरिए दिल्ली पहुंचाया गया था। इस अद्भुत कीर्ति स्तम्भ चोरी को दिल्ली ले जाने व उसे वहां स्थापित करने के लिए भी परिवहन प्रक्रिया के मुख्य चरण इस प्रकार थे।

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खंभों को उखाड़ने से पहले क्षति से बचाने के लिए उन्हें कपास, सन, और मखमल की मोटी परतों से लपेटा गया था। 42 पहियों वाली एक विशाल गाड़ी का निर्माण कराया गया था, जिसे हज़ारों मजदूरों और बैलों द्वारा खींचा गया। इस विरासती-स्तम्भ का वजन 42 टन था। इसके भारी वजन को जमीन के रास्ते लंबी दूरी तक ले जाना मुश्किल था, इसलिए इसे यमुना नदी के तट तक लाया गया और वहां से नावों (बजरे) के माध्यम से दिल्ली के पास तक पहुंचाया गया?
दिल्ली पहुंचने के बाद खंभों को क्रेन और ‘सन’ की मजबूत रस्सियों की मदद से फिरोजशाह कोटला और हिंदू राव बाड़ा के पास (रिज क्षेत्र) में सीधा खड़ा किया गया।

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दिल्ली का ‘अशोक स्तंभ’ कभी हरियाणा की शान था। इसे मेरठ की शान भी माना गया था। अब यह राजधानी दिल्ली का मान बढ़ा रहा है। दिल्ली विवि के नॉर्थ कैंपस के पास हिंदूराव बाड़ा के सामने लगा अशोक स्तंभ कभी हरियाणा की भी शान हुआ करता था। विरासत की इस चोरी के प्राप्त विवरण के अनुसार, फिरोज़शाह तुगलक सन 1364 के आसपास मेरठ आया था। वह हरियाणा से भी गुजरा था। मेरठ-भ्रमण के वक्त उसकी नजर अशोक स्तंभ पर पड़ी थी। सम्राट अशोक द्वारा स्थापित कराए गए इस स्तंभ की खूबसूरती पर फिरोजशाह तुगलक रीझ गया था।

उसने तय किया कि खिज्राबाद की तरह मेरठ में लगे इस अशोक स्तंभ को भी वो अपने किले में स्थापित कराएगा। इसी इरादे को पूरा करने के लिए फिरोजशाह ने 42 पहियों की एक खास गाड़ी तैयार कराई। इस गाड़ी में 4 हजार से ज्यादा मजदूरों को लगाया गया, जो मेरठ से इस अशोक स्तंभ को उठाकर दिल्ली ले गए। रुई और मखमल के थान में लपेटकर स्तंभ को ससम्मान सहित सुरक्षित दिल्ली ले जाया गया, जहां फिरोजशाह के किले में ‘हंटिंग लॉज’ में लगाया गया था।

इतिहासकारों के अनुसार सन 1713 या 1719 के बीच यह मीनार पांच भागों में बंट गई थी। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि शिकारगाह में, जहां मीनार को लगवाया था, एक बार बारुद विस्फोट के कारण आग लग गई थी। आग लगने से मीनार के पांच टुकड़े हो गए। फिर अंग्रेजों ने 1857 में इन पांचों टुकड़ों को जोड़कर इस मीनार को बाड़ा हिंदूराव के सामने लगवा दिया, जहां यह आज भी लगी है। इतिहासकारों के अनुसार यह स्तंभ शहर के समीप दो स्थानों पर लगे होने के प्रमाण मिलते हैं। मेरठ शहर के भीतर टीले वाला कोतवाली का हिस्सा व शहर के बाहर जहां अब हापुड़-अड्डा है, वहां यह मीनार लगी थी।

अशोक स्तंभ पर लगे शिलालेख में इस बात का जिक्र है कि इसे मेरठ से लाकर दिल्ली में फिरोज़शाह तुगलक ने स्थापित किया। स्तंभ के नीचे लगे पत्थर पर अंग्रेज़ी में भी पूरा विवरण दर्ज है, जिसमें लिखा है कि तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने इस स्तंभ को स्थापित कराया था। पूरी कहानी का एक अंश शिलालेख बयां करता है। पर्यटन का आकर्षण बन सकता था। अगर यह मेरठ में ही होता या हरियाणा में होता तो युवाओं को इतिहास की जानकारी देने में अहम भूमिका निभाता। इतिहासकार डॉ. अमित पाठक ने इस दिशा में कुछ शोध कार्य भी किया था। यह विरासत की चोरी थी, जिसका पूरा विवरण अब भी सिलसिलेवार उपलब्ध नहीं है।

कभी अशोक स्तंभ मेरठ का गौरव था। बड़ी बात यह कि इसे स्वयं सम्राट अशोक ने स्थापित किया था। सम्राट अशोक ने जो कीर्ति-स्तम्भ बनवाए थे, उनमें से मेरठ में स्थापित हुई यह लाट प्रमुख थी, लेकिन सिलसिलेवार हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में स्थापित इन मीनारों, जिन्हें ‘लाट’ भी कहा जाता है। इस कीर्ति-स्तम्भ को एक सूत्र में अभी तक पिरोया नहीं जा सका। इस पर अभी भी सिलसिलेवार प्रामाणिक शोध की आवश्यकता है।

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