राखीगढ़ी की रहस्यमयी नृत्यांगना
दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय 4.1 इंच की यह एक नृत्यांगना ताम्र-मूर्ति ढेरों रहस्यों को वर्ष 1926 से अपने भीतर समाए हुए है। संभावना है कि इसे राखीगढ़ी के निर्माणाधीन संग्रहालय में भी लाया जाए। भारतीय पुरातत्व-सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल ने इसे ‘डांसिंग गर्ल’ का नाम दिया था।
प्रख्यात लेखक मुल्कराज आनंद ने इसे ‘माया’ के नाम से अपने एक बाल-उपन्यास में वर्णित किया था। वर्ष 1944 और 1948 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक मार्टिमेर व्हीलर के अनुसार, यह प्रतिमा एक ऐसी युवती की है जो हर दृष्टि से ‘सम्पूर्णता’ की झलक देती है। उसे अपने पर भी विश्वास है और आसपास की दुनिया पर भी। वह जो भी है अद्वितीय है। यह प्रतिमा हरियाणा के सर्वाधिक चर्चित पुरातत्व स्थल राखीगढ़ी से मिली है। कुछ पुरातत्वविद इसे एक नृत्यांगना के साथ-साथ एक वीरांगना के रूप में देखते हैं। कुछ इसे बलोची-मूल के साथ जोड़ते हैं तो कुछ इसे ‘द्राविडि़यन’ मानते हैं। अब तीखे नैन-नक्श वाली इस आकर्षक नृत्यांगना एवं वीरांगना की उम्र 35 वर्ष आंकी गई है और इसका गठीला बदन वर्तमान हरियाणवी महिलाओं से मिलता-जुलता है। यह निश्चित माना गया है कि इसकी पृष्ठभूमि एक सम्भ्रांत परिवार की है।
प्रख्यात पुरातत्वविद वसंत शिंदे के अनुसार, इसका डीएनए हाल ही में पाए गए दक्षिणी-एशिया के कुछ अन्य अवशेषों के साथ मिलता है। मगर उनके कुछ अन्य समकालीनों का कहना है कि किसी एक कंकाल के आधार पर किसी भी अवशेष अथवा प्रतिमा के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर निर्णय नहीं दिया जा सकता। ऐसी ही एक प्रतिमा मोहनजोदाड़ो से मिली है। राखीगढ़ी और मोहनजोदाड़ो की इन प्रतिमाओं पर अध्ययन व शोध पिछले लगभग 100 वर्षों से जारी है और इसे लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी सभ्यता के इतिहास का प्रवेश-द्वार माना जा रहा है। इन अध्ययनों को प्रारंभिक अनूठा विस्तार देने का श्रेय जॉन मार्शल, दयाराम साहनी और रखाल दास को दिया जाता है।
उधर, इन्हीं सब चर्चाओं के राजनीतिकीकरण का सिलसिला भी आरम्भ हो चुका है। इस संबंध में पहलकदमी तमिलनाडु के एमके स्टालिन ने की थी। गत 20 दिसम्बर, 2024 को स्टालिन ने एक सार्वजनिक वक्तव्य में ‘जॉन मार्शल’ के प्रति द्रविड़ों की ओर से कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए घोषणा की है कि निकट भविष्य में मार्शल की एक आदमकद प्रतिमा लगाने व सिंधु-घाटी सभ्यता को द्राविड़-मूल से जोड़ने पर विमर्श के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय-संगोष्ठी आयोजित करने की भी घोषणा की है। ‘मार्शल’ की प्रतिमा के शिलान्यास के अवसर पर उसी वर्ष 5 जनवरी, 2025 को चेन्नई में एक विशेष समारोह का भी आयोजन किया गया और इस अवसर पर एमके स्टालिन ने हड़प्पन-लिपि को ‘डी-कोड’ करने वाले किसी भी विद्वान को 10 लाख डॉलर का राज्य पुरस्कार देने की घोषणा भी की थी। स्टालिन यद्यपि विशुद्ध रूप से एक राजनीतिज्ञ हैं, मगर अपने ‘पुरातत्व-ज्ञान’ के आधार पर वह पूर्णतया आश्वस्त है कि ‘हड़प्पन-लिपि’ के अध्ययन से इस बात की पुष्टि होगी कि हड़प्पा-सभ्यता का सम्बन्ध द्राविड़-संस्कृति से जुड़ा है।
वस्तुत: सिंधु-लिपि अभी भी पूरी तरह से ‘डी-कोड’ नहीं हो पा रही। अपनी वर्ष 1924 की रिपोर्ट में मार्शल ने संकेत दिया है कि यह चित्रात्मक लिपि बहुत ही महत्वपूर्ण घटनाओं व उस काल के लोगों को पत्थरों पर उकेरती थी और पाषाण-मुहरें भी उस काल के अनेक अनसुलझे रहस्यों की ओर संकेत करती हैं। पाषाण-शिलाओं पर टंकित बैलों के चित्र अभी भी कोई स्पष्ट संकेत नहीं देते। उनकी आकृतियों की सिंधु घाटी-सभ्यता से कितनी समानता है, इस पर मार्शल के बाद भी शोध का क्रम जारी है।
इधर, लोथल (गुजरात), धोलावीरा (गुजरात), कालीबंगा (राजस्थान) और आलमगीर पुर (उत्तरप्रदेश) आदि स्थानों से प्राप्त अवशेष आर्यन संस्कृति एवं सभ्यता के करीब ले जाते हैं। बालकृष्ण थापर और बीबी लाल सरीखे पुरातत्वविदों का कहना है कि ‘सिंधु-घाटी सभ्यता’ को अब सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहा जाना अधिक तर्कसंगत है। एक अवधारणा यह भी है कि
‘डांसिंग गर्ल’ एक प्रागैतिहासिक कांस्य मूर्ति है जो लगभग 2300-1751 ईसा पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता के शहर मोहनजोदाड़ोे (आधुनिक पाकिस्तान में)में खोई हुई मोम की ढलाई में बनाई गई थी, जो सबसे शुरुआती शहरों में से एक था। मूर्ति 10.5 सेंटीमीटर (4.1 इंच) लंबी है, और इसमें एक निर्वस्त्र युवती या लड़की को शैलीगत आभूषणों के साथ दिखाया गया है, जो एक आत्मविश्वासी, स्वाभाविक मुद्रा में खड़ी है। यह मूर्ति ब्रिटिश पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके द्वारा 1926 में मोहन्जोदाड़ो के ‘एचआर क्षेत्र’ में खुदाई करके निकाली गई थी। यह अब राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में है, जिसे 1947 में भारत के विभाजन के समय भारत को आवंटित किया गया था ।
1926 में मोहन्जोदाड़ो में खुदाई के बाद यह और अन्य खोज शुरू में लाहौर संग्रहालय में जमा की गई थी लेकिन बाद में इसे नई दिल्ली में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मुख्यालय में ले जाया गया, जहां ब्रिटिश राज की नई राजधानी के लिए एक नया 'केंद्रीय शाही संग्रहालय’ बनाने की योजना बनाई जा रही थी। यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय स्वतंत्रता निकट आ रही थी, लेकिन प्रक्रिया के अंत तक भारत के विभाजन का अनुमान नहीं लगाया गया था।
नए पाकिस्तानी अधिकारियों ने अपने क्षेत्र में खुदाई करके प्राप्त मोहनजोदाड़ो के टुकड़ों को वापस करने का अनुरोध किया, लेकिन भारतीय अधिकारियों ने इनकार कर दिया। अंतत: एक समझौता हुआ, जिसके तहत खोजी गई वस्तुओं, कुल मिलाकर लगभग 12000 वस्तुओं (ज्यादातर मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े ) को देशों के बीच बराबर-बराबर बांट दिया गया, कुछ मामलों में इसे बहुत शाब्दिक रूप से लिया गया, जिसमें कुछ हार और करधनी के मोतियों को दो ढेरों में अलग कर दिया गया। ‘दो सबसे प्रसिद्ध मूर्तियों’ के मामले में, पाकिस्तान ने तथाकथित पुजारी-राजा की मूर्ति मांगी और उसे प्राप्त कर ली , जबकि भारत ने बहुत छोटी नृत्य करने वाली लड़की को अपने पास रखा। विभाजन के समय दोनों सरकारों द्वारा मोहनजोदाड़ो के विभाजन पर सहमति होने के बावजूद, कुछ पाकिस्तानी राजनेताओं ने बाद में मांग की कि डांसिंग गर्ल को पाकिस्तान को वापस कर दिया जाए।
2016 में एक पाकिस्तानी बैरिस्टर, जावेद इकबाल जाफरी ने मूर्ति की वापसी के लिए लाहौर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें दावा किया गया कि इसे ‘दिल्ली में राष्ट्रीय कला परिषद के अनुरोध पर 60 साल पहले पाकिस्तान से ले जाया गया था लेकिन कभी वापस नहीं किया गया।’ उनके अनुसार, डांसिंग गर्ल पाकिस्तान के लिए वैसी ही थी जैसी दा विंची की 'मोना लिज़ा’ यूरोप के लिए थी। यह मोहनजोदाड़ो में पाई गई दो कांस्य आकृतियों में से एक है जो अन्य अधिक औपचारिक मुद्राओं की तुलना में अधिक लचीली विशेषताएं दिखाती है। लड़की निर्वस्त्र है। उसने कई चूडि़यां और एक हार पहना हुआ है और उसे एक हाथ कमर पर रखकर प्राकृतिक खड़ी स्थिति में दिखाया गया है। उसने अपने बाएं हाथ में 24 से 25 चूड़ियां और दाएं हाथ में 4 चूड़ियां पहनी हुई हैं और उसके बाएं हाथ में कोई वस्तु पकड़ी हुई है, जो उसकी जांघ पर टिकी हुई है, दोनों हाथ असामान्य रूप से लंबे हैं।
1973 में ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता मॉर्टिमर व्हीलर ने इसे अपनी पसंदीदा प्रतिमा बताया था : 'मुझे लगता है कि वह लगभग पंद्रह साल की होगी, उससे ज़्यादा नहीं, लेकिन वह अपनी बांहों में चूड़ियां पहने खड़ी है और उसके अलावा कुछ भी नहीं है। मोहन्जोदाड़ो के पुरातत्वविद् जॉन मार्शल, जिन्होंने यह मूर्ति पाई थी, ने इस मूर्ति का वर्णन इस प्रकार किया है, 'एक युवा लड़की, जिसका हाथ उसके कूल्हे पर आधा-अधूरा मुद्रा में है और पैर थोड़े आगे की ओर हैं, क्योंकि वह अपने पैरों से संगीत के साथ ताल मिला रही है। जब उन्होंने इस मूर्ति को देखा तो वे आश्चर्य से प्रतिक्रिया करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कहा ‘जब मैंने उन्हें पहली बार देखा तो मुझे यह विश्वास करना मुश्किल लगा कि वे प्रागैतिहासिक थे।’ पुरातत्वविद् ग्रेगरी पॉसेल ने डांसिंग गर्ल को सिंधु स्थल से कला का सबसे मनोरम टुकड़ा बताया था।
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