रिश्तों की रस्सी में गांठें बहुत-सी हैं
पिछले सप्ताह यह बात सुर्खियों में रही कि भारत के 61 एवं पाकिस्तान के 56 महत्वपूर्ण लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ को संयुक्त चिट्ठी लिखी है। चिट्ठी में कहा गया है कि दोनों देश सामान्य संबंध बहाल करने के लिए बातचीत की मेज पर आएं। इससे शांति का रास्ता खुलेगा। निजी तौर पर मैं भी दोनों देशों के बीच अच्छे रिश्ते की चाहत रखता हूं मगर सवाल है कि रिश्तों की रस्सी में गांठें किसने डाली हैं? इस विषय की पड़ताल से पहले चलिए कुछ खास गांठों पर नजर डाल लेते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध 7 अगस्त 2019 से पूरी तरह बंद हैं, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पाकिस्तान ने रिश्ता तोड़ने और व्यापार निलंबन की घोषणा की और उसके बाद भारतीय उच्चायुक्त को इस्लामाबाद से निष्कासित कर दिया था। यानी रिश्ते को खत्म करने की पहल किसने की? पाकिस्तान ने की! इसके लिए हुई बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ ही विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, सेना और खुफिया एजेंसियों के प्रमुख मौजूद थे। उसी बैठक में तय हुआ कि भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को काला दिवस मनाया जाएगा और पाकिस्तान ने काला दिवस मनाया भी। ऐसे देश के साथ रिश्ते की बात से पहले क्या खून नहीं खौलेगा?
सितंबर 2016 के बाद भारतीय फिल्म संगठनों ने पाकिस्तान के कलाकारों के लिए अपने दरवाजे बंद किए। सवाल है कि ऐसा क्यों किया गया? क्योंकि पाकिस्तानी आतंकियों के हमले में उरी में भारतीय सेना के 19 जवान शहीद हो गए थे। भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय क्रिकेट सीरीज 2012-13 से पूरी तरह बंद है, क्यों बंद है? क्योंकि क्रिकेट का खेल और पाकिस्तान का खूनी खेल एक साथ नहीं चल सकता। एशिया कप जैसे बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंट में इसलिए खेलते हैं, क्योंकि हम इन संगठनों का सम्मान करते हैं। मगर वहां भी हालात आपने देखे ही हैं। एशिया कप 2025 में भारत विजेता बना। भारत ने एशियन क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष मोहसिन नकवी के हाथों ट्रॉफी लेने से इन्कार किया और कहा कि ट्रॉफी किसी और के हाथ से दिलवा दें। मगर मोहसिन नकवी ट्रॉफी लेकर भाग गए। भारत ने क्यों इन्कार किया? क्योंकि मोहसिन आतंकवाद फैलाने वाले पाकिस्तान के गृह मंत्री हैं। भारत ने क्या गलत किया?
मैं बहुत ही उम्मीदों वाला व्यक्ति हूं, मेरा खुद का सपना रहा है कि हम दो पड़ोसी एक साथ शांति के साथ रहें। एक-दूसरे की उन्नति में साथ दें, मैंने पाकिस्तान की कई यात्राएं की हैं। जब भी गया तो बहुत से लोगों से बातें कीं। लोगों ने बहुत प्यार दिया और मैंने महसूस किया कि वहां का आम आदमी बहुत अच्छे रिश्तों की उम्मीद करता है। तो क्या रिश्तों में कड़वाहट के लिए केवल राजनेता जिम्मेदार हैं? मुझे इसमें पेंच नजर आता है। आपको याद होगा कि दोनों देशों की शांति के लिए तो अटल जी पूरी बस भर कर ले गए थे। उसमें दिलीप कुमार साहब भी थे, मगर क्या हुआ? कारगिल हो गया।
मेरे सामने की घटना है जब बेहद खफा दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ को फोन करके कहा था कि हमारी पीठ में खंजर घोंप दिया। आपसे यह उम्मीद नहीं थी। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्यार का संदेश लेकर बिन बुलाए ही नवाज शरीफ के घर जा पहुंचे थे। मगर क्या हुआ? इमरान खान भी भारत से दोस्ती चाहते थे, तो दोस्ती हुई क्यों नहीं? दोस्ती इसलिए नहीं हो सकती कि पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसी आईएसआई ऐसा होने नहीं देना चाहती। 117 नहीं, 1017 या फिर 100017 लोग भी चिट्ठी लिख लें तो भी जनरल आसिम मुनीर की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जहां की हुकूमत अपने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को कैद में सड़ा रही हो, जहां अवाम की नहीं सुनी जाती हो, वो चिट्ठियों की क्या सुनेगा?
अब लंदन स्थित एक थिंक टैंक द्वारा कोलंबो में आयोजित क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन के दौरान भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडलों के बीच बातचीत की बहुत चर्चा हो रही है, मगर यह समझना जरूरी है कि यह आधिकारिक बैठक नहीं थी। इसमें भारत और पाकिस्तान के अलावा मालदीव, श्रीलंका, ब्रिटेन समेत कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे, इसे बहुत उम्मीद के साथ देखना बहुत जल्दबाजी होगी। ऐसे सम्मेलन पहले भी होते रहे हैं।
अब्बा के जनाजे में फर्जंद क्यों नहीं...?
यदि उर्दू से आपका वास्ता नहीं है तो संभव है कि फर्जंद शब्द आपके लिए नया हो, अर्थ होता है बेटा। अब खबर यह आई है कि ईरान के मरहूम नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के जनाजे में उनके फर्जंद सैय्यद मुजतबा हुसैनी खामेनेई ने भाग नहीं लिया क्यों? क्योंकि ईरान के खुफिया तंत्र को आशंका है कि इजराइल और अमेरिका उन्हें कहीं खत्म न कर दें! हमले में उनके अब्बा की मौत हो गई थी और वे गंभीर रूप से खुद घायल हो गए। तब से सामने नहीं आए हैं क्योंकि दुश्मन उन्हें ढूंढ रहे हैं।
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