सुस्वागतम् तस्लीमा नसरीन
बांग्लादेश की विवादित प्रख्यात लेखिका सुश्री तस्लीमा नसरीन का भारत के कोलकाता शहर में पहुंचने पर जिस गर्मजोशी से स्वागत किया गया है वह भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति की सर्वग्राह्यता का ही प्रमाण है क्योंकि इस देश में सभी मतों व धर्मों का आदिकाल से ही बराबर का सम्मान होने के साथ ही व्यक्ति की रचनाशीलता के विभिन्न स्वरूपों का भी आदर किया जाता रहा है।
एक तरफ धर्म व समाज की नैतिकता के पैमानों में विविधता रही और चार्वाक जैसे भौतिकतावादी दार्शनिक को भी ऋषि की संज्ञा दी गई जिन्होंने कहा कि ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत् (कर्ज लो और घी पियो क्योंकि कल किसने देखा है) और दूसरी तरफ साकार से लेकर निराकार ब्रह्म की स्थापना के तत्वज्ञान को भी स्वीकृति मिली। वहीं रचनाशीलता के मामले में जहां वेदों और उपनिषदों के साथ रामायण व महाभारत जैसे ग्रन्थ लिखे गये वहीं वात्स्यायन ऋषि ने कामसूत्र व कालिदास ने कुमार संभव जैसे महाग्रन्थों की रचना की।
यदि हम वर्तमान भारत को भी देखें तो आचार्य रजनीश ने संभोग से समाधि तक जैसे सिद्धान्तों का भी प्रतिपादन किया।
भारतीय समाज में रचनाशीलता के हर पक्ष को सम्मान मिला और यहां का समाज कभी भी पोंगापंथी होने के बावजूद रचनाशीलता के सभी पुटों को सहजता से स्वीकार भी करता रहा। इस मामले में यह कभी कट्टरपंथी नहीं रहा और इसने लीक से हट कर लिखने वाले रचनाधर्मियों के प्रति भी सम्मान भाव दिखाया। वर्तमान भारत के साहित्य में जहां एक तरफ मुंशी प्रेमचन्द व यशपाल और भीष्म साहनी जैसे कहानीकार हुए तो वहीं दूसरी ओर भगवती चरण वर्मा व अज्ञेय और निर्मल वर्मा भी हुए।
भारत के लोगों ने सभी प्रकार के रचनाकारों का दिल खोल कर स्वागत किया। यही स्थिति निबन्धकारों को लेकर भी है और कवियों को भी। भारत के लोगों ने कभी भी साहित्य में कट्टरता को स्वीकार्यता प्रदान नहीं की। इसकी मुख्य वजह यही है कि भारतीय संस्कृति मानवता को सर्वोच्च शिखर पर लाख पुरातनपंथी वैचारिक ग्रन्थियों के बावजूद रखती रही है। इसलिए स्वतन्त्र भारत का जो संविधान बना उसमें नागरिक या व्यक्ति की गरिमा को सर्वप्रथम स्थान दिया गया जिससे व्यक्ति की रचनाशीलता के विचार स्वातन्त्र्य को किसी भी स्तर पर कट्टरपन के नाम पर दबाया न जा सके बशर्ते वह पूर्ण रुपेण अहिंसक हो।
इस सन्दर्भ में हमें तस्लीमा नसरीन की रचनाओं की समीक्षा करनी होगी और सोचना होगा कि इसमें मानवता का पुट समाज को किस हद तक प्रभावित करता है। तस्लीमा नसरीन ऐसी लेखिका हैं जिन्हें 1994 में उनके देश बांग्लादेश ने मुल्क बदर कर दिया था। इसकी वजह यह थी कि उन्होंने अपने उपन्यास ‘लज्जा’ में 1993 में बांग्लादेश में हुई साम्प्रदायिक हिंसा का विवरण दिया था। यह हिंसा कुछ हिन्दू परिवारों के विरुद्ध 1992 में भारत में हुई कथित बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुई थी।
उनकी लज्जा पुस्तक का बांग्लादेश में प्रबल विरोध हुआ था और हिंसा भड़क उठी थी। यह कृत्य वहां के कट्टरपंथी इस्लामी सोच के लोगों ने किया था। इसके बाद वह भारत आयीं मगर अन्य यूरोपीय व पश्चिमी देशों में भी रहीं। इसकी वजह यह थी कि लगभग दस वर्ष तक भारी विवादों में रहने के बाद उन्हें 2004 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भारत में रहने की इजाजत दे दी थी और उनकी पुस्तक द्विखन्दितों से प्रतिबन्ध भी समाप्त कर दिया था। यह पुस्तक उनकी जीवनी का दूसरा भाग है। इस प्रकार 2004 में वह कोलकाता में बस गई थीं मगर वह 2007 तक ही इस देश में रह पाईं और उन्हें अन्य यूरोपीय देशों में जाना पड़ा।
अब 19 वर्ष बाद वह पुनः भारत आयी हैं। मगर इस बीच उन्हें स्वीडन की सरकार ने अपनी नागरिकता दे दी है और उनकी सुरक्षा की गारंटी भी दी है। इधर भारत में भी इस दौरान भारी परिवर्तन हो चुका है। केन्द्र में 2014 से जहां भाजपा के नेतृत्व में मोदी सरकार है वहीं प. बंगाल में भी श्री सुवेन्दु अधिकारी के नेतृत्व में इसी पार्टी की सरकार है। अतः बदली राजनीतिक परिस्थितियों में तस्लीमा नसरीन को अब भारत के कट्टरपंथी मुसलमानों का डर नहीं है। इसके लिए प. बंगाल के मुख्यमन्त्री ने उन्हें पुख्ता सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही स्वतन्त्रता से कहीं भी जाने की इजाजत दे दी है।
यही वजह है कि विगत शनिवार को कोलकाता के रवीन्द्र सदन में एक साहित्यिक व सांस्कृतिक समारोह हुआ जिसमें सुश्री नसरीन के साथ ही सुवेन्दु अधिकारी भी उपस्थित रहे। तस्लीमा नसरीन को 2007 में कोलकाता छोड़ कर दूसरे देश जाने का आदेश राज्य की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने तब दिया था जब उनकी पुस्तक द्विखन्दितों पर कट्टरपंथी मुसलमानों ने मुखालिफत की नई मुहीम छेड़ दी। यह विरोध इतना तेज था कि इसे शान्त करने के लिए प. बंगाल में सेना को बुलाना पड़ा था। इस मुहीम के दौरान कट्टरपंथियों ने सड़कें जाम कर दी थीं और जगह-जगह आगजनी की थी।
इसका आयोजन अल्पसंख्यक मंच ने किया था। उस समय स्व. बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में प. बंगाल में वामपंथी मोर्चे की सरकार थी। परन्तु अब देश में मोदी सरकार के रहते मुस्लिम कट्टरपंथियों के हौंसले पस्त हो चुके हैं। तस्लीमा नसरीन आज 3 अगस्त को कोलकाता में पत्रकारों से भी मिलेंगी और उसके बाद चली जायेंगी। उनके भारत आगमन से यही सिद्ध हुआ है कि इस देश की संस्कृति रचनाशीलता की सभी धाराओं का बराबर आदर करती है।

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