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विश्व कप : छोटे देश, बड़े सपने

04:45 AM Jul 10, 2026 IST | Aakash Chopra
विश्व कप   छोटे देश  बड़े सपने

फुटबाल विश्वकप कप का रोमांच चरम पर है। सारी दुनिया के खेल फुटबाल की बादशाहत को मानते हैं और जब विश्वकप हो रहा हो तो अन्य खेल प्रतियोगिताएं जैसे गायब हो जाती हैं। फुटबाल विश्वकप के दौरान इस खेल की महानता और लोकप्रियता का पता लगता है। इस बार विश्वकप में 48 टीमों ने भागीदारी की जिसमें एक 1.5 लाख की आबादी वाला देश कुराकाओ और 5 लाख की आबादी वाला देश कोबे वेर्डे (केप वेर्डे) भी शामिल हैं। कम आबादी वाले छोटे देशों ने अपने शानदार प्रदर्शन और जज्बे से दुनिया को चौंका दिया है। केप वेर्डे के उम्रदराज गोलकीपर के जज्बे को सारी दुनिया सलाम कर रही है और उन्होंने दिखाया है कि सही मंच पर अपनी प्रतिभा को दिखा कर कोई भी दुनिया भर में अपने प्रशंसक बना सकता है। अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित इस छोटे से द्वीपीय देश कोबे वेर्डे की आबादी महज 5 लाख के करीब है, जो कि उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर से भी कम है। अपने पहले ही विश्व कप में केप वेर्डे ने मौजूदा चैंपियन अर्जेंटीना (जिसमें लियोनेल मेस्सी जैसे दिग्गज शामिल हैं) को एक्स्ट्रा टाइम तक कड़ी टक्कर दी। इसके अलावा, उन्होंने अपने ग्रुप स्टेज में पूर्व चैंपियन स्पेन को गोल-रहित ड्रा पर रोक कर इतिहास रच दिया। इस शानदार प्रदर्शन के दम पर केप वेर्डे वर्ल्ड कप के राउंड ऑफ 32 तक पहुंचने में कामयाब रहा, जो कि उनके फुटबाल इतिहास का सबसे बड़ा पल है।
कम आबादी वाले देशों का फुटबॉल में दबदबा नया नहीं है। उरुग्वे (लगभग 35 लाख आबादी) दो बार का वर्ल्ड कप विजेता है। वहीं, क्रोएशिया (लगभग 40 लाख आबादी) भी हालिया दशकों में विश्व कप के फाइनल और सेमीफाइनल तक का सफर तय कर चुकी है। दुनिया में ऐसे कई छोटे देश हैं जिनकी आबादी बेहद कम है, लेकिन वे खेलों में महाशक्तियों को धूल चटाते हैं। इन देशों ने यह साबित किया है कि खेल जीतने के लिए बड़ी आबादी की नहीं, बल्कि मजबूत खेल संस्कृति, सही ट्रेनिंग और जज्बे की जरूरत होती है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों का इस विश्वकप से बाहर रहना दुनिया को चौंकाने वाला है लेकिन इसके कुछ बुनियादी कारणों की तह तक जाना होगा। दुनिया के 10 सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से केवल दो, अमेरिका और ब्राज़ील ही मौजूदा विश्व कप में जगह बना सके हैं। दो अन्य बड़ी आबादी वाले देश रूस और नाइजीरिया पिछले कई विश्व कप में खेल चुके हैं। चीन और इंडोनेशिया अब तक दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल आयोजन यानी वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल में केवल एक-एक बार ही हिस्सा ले पाए हैं। हालांकि भारत ने तकनीकी रूप से 1950 में ब्राज़ील में हुए विश्व कप के लिए क्वालिफ़ाई कर लिया था, लेकिन टूर्नामेंट शुरू होने से एक महीने से भी कम समय पहले उसने अपना नाम वापस ले लिया।
माना जाता है किसी देश की आबादी जितनी अधिक होगी, उतने ही ज़्यादा खिलाड़ियों के वहां से सामने आने की संभावना हो सकती है। अब तक विश्व कप जीतने वाले आठ देशों में से सात, अर्जेंटीना, ब्राज़ील, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली और स्पेन, अपेक्षाकृत बड़ी आबादी वाले देश हैं। लेकिन एशिया के सबसे बड़ी आबादी वाले देशों चीन, भारत, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश में फुटबाल को लेकर उतना उत्साह और खेल ढ़ांचा नहीं विकसित हो पाया है जिसके दम पर वह दुनिया की बड़ी फुटबाल टीमों के बराबर आ सके। भारतीय फुटबाल का तो बेहद खराब प्रदर्शन रहा है और उसकी रैंकिंग वर्तमान में भी 140 के आसपास है। इन देशों की सफलता के पीछे के कारणों का आकलन करने पर पता चलता है कि ये देश अपनी पूरी ताकत और संसाधन किसी एक या दो खेलों को चमकाने में लगा देते हैं। और इनके लिये शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था करते हैं। आइसलैंड जैसे छोटे देश ने अपने हर कोने में इनडोर स्टेडियम और हर स्कूल में क्वालीफाइड कोच की व्यवस्था की है। इन देशों ने मजबूत खेल संस्कृति का​ विकास किया और यहां बच्चों के हाथ में बचपन से ही मोबाइल के बजाय गेंद या खेल के उपकरण थमा दिए जाते हैं। भारत में भी ऐसी ही खेल संस्कृति का विकास करने की आवश्यकता है और कम उम्र से ही प्रतिभाओं को निखार कर एक्सपोजर देना होगा। ऐसा नहीं है कि भारत में फुटबाल खिलाड़ियों की कमी रही है लेकिन आईएम विजयन, भाइचुंग भूटिया, सुखविंदर सिंह, सुनील छेत्री, संदेश झिंगन जैसे कुछ ही खिलाड़ी अपना नाम बना पाये हैं।
सुनील छेत्री तो अंतर्राष्ट्रीय फुटबाल में सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ियों की सूची में मेस्सी और रोनाल्डो के साथ शामिल हैं लेकिन भारतीय फुटबाल को कई सुनील छेत्री की जरूरत है जो भारत को ​विश्पकप में जगह दिला सके और देश को फुटबाल महाशाक्ति बनाने में मदद करें। भारत में रिलायंस समूह ने आईएसएल के जरिये फुटबाल में क्रांति करने की कोशिश की थी लेकिन दस साल तक लगातार प्रयास के बावजूद विश्वस्तरीय फुटबालरों को निखारने की कोशिश नाकाम रही। भारत को हर शहर में फुटबाल अकादमियों की स्थापना करने के अलावा प्रतिभा खोजने वाले विशेषज्ञों का दल भी बनाना होगा। भारत में क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में खेल संस्कृति विकसित नहीं हो सकी है। भारत के अन्य खेेलों को भी क्रिकेट से सबक सीखना होगा जिसने जूनियर स्तर से ही अच्छे खिलाड़ियों की पहचान करके उन्हें मौके उपलब्ध कराने और आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराई है। भारतीय फुटबाल में विकास करने की अपार संभावनाएं हैं और उपलब्ध प्रतिभाओं को अवसर देने और आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराने पर ध्यान लगाना होगा।

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Aakash Chopra

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