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गुजरात का चुनावी संग्राम

गुजरात विधानसभा चुनावों के दूसरे और अंतिम चरण में 14 जिलों की 93 विधानसभा सीटों पर 60 प्रतिशत मतदान के साथ ही गुजरात का संग्राम सम्पन्न हो गया। दूसरे दौर में भी पिछले बार के मुकाबले कम मतदान हुआ है।
गुजरात का चुनावी संग्राम
गुजरात विधानसभा चुनावों के दूसरे और अंतिम चरण में 14 जिलों की 93 विधानसभा सीटों पर 60 प्रतिशत मतदान के साथ  ही गुजरात का संग्राम सम्पन्न हो गया। दूसरे दौर में भी पिछले बार के मुकाबले कम मतदान हुआ है। पहले चरण के मतदान में 63.31% वोट पड़े थे, जो पिछली बार के मुकाबले 5% कम है। कम हुए मतदान का नुक्सान किसे होगा यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे। दूसरे दौरे के मतदान में शहरों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा मतदान हुआ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पूर्व सीएम आनंदी बेन पटेल  जैसे दिग्गज नेताओं के चलते गुजरात के रण में उत्तरी गुजरात के हिस्सों के परिणाम भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। क्योंकि भले ही पाटीदार या ओबीसी आंदोलन जैसी कोई मजबूत जातीय हलचल इस बार नहीं हुई लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले जातीय आंदोलन ने उत्तरी हिस्से में दुग्ध सहकारी समितियों वाली 32 सीटों पर परिणामों को काफी प्रभावित किया था। आज जिन सीटों पर मतदान हुआ उनमें से 45 सीटें ऐसी हैं जहां दूध के कारोबार का असर है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने दूसरे चरण की 93 सीटों में से 51 पर जीत हासिल की थी। जबकि कांग्रेस ने 39 और निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में तीन सीटें गई थी। तब आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गई थी। मध्य गुजरात में भाजपा ने 37 और कांग्रेस ने 22 सीटें जीती थी लेकिन उत्तर गुजरात में कांग्रेस हावी हो रही थी। उसने 17 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि भाजपा को केवल 14 सीटें मिली थी। इस बार आम आदमी पार्टी की मौजूदगी में समीकरण कुछ बदले-बदले नजर आते हैं। दूसरे चरण के मतदान मे अहमदाबाद, बड़ोदरा और गांधी नगर जैसे शहरी इलाके भी शामिल हैं। भाजपा ने शहरी क्षेत्रों के गढ़ को बनाए रखने के लिए काफी मेहनत की  है। साथ ही पिछली बार कांग्रेस द्वारा झटकी गई दुग्ध सहकारी सीटों पर भी उसने अपना ध्यान ​के​न्द्र्त किया है। भाजपा ने स्थानीय जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए कई बदलाव किए हैं आैर पिछली बार उत्तर गुजरात के कई जिलों में बढ़त हासिल करने वाली कांग्रेस ने अपना चुनाव प्रचार काफी खामोशी से किया है। भाजपा की अहमदाबाद शहर की 16 सीटों पर पैनी नजर रही है। अहमदाबाद को भाजपा ने कितनी गंभीरता से लिया उसका अनुमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ताबड़तोड़ रोड शो से लगाया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दूसरे चरण के मतदान से पहले अहमदाबाद में एक के बाद एक दो  रोड शो किए। 30 किलोमीटर लंबा रोड शो अहमदाबाद के 13 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरा था। 2 दिसम्बर को उन्होंने अहमदाबाद हवाई अड्डे से सरसपुर क्षेत्र तक 10 किलोमीटर के रोड शो का नेतृत्व किया था। पाटन और  बनासकांठा जिलों में उनकी रैलियां भी काफी महत्वपूर्ण रही हैं जहां पिछली बार कांग्रेेस को बढ़त मिली थी। वडनगर और मनसा प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमितशाह के गृहनगर हैं जहां भाजपा जीत का अंतर बढ़ाने की उम्मीद कर रही है।
पांच वर्ष पहले भाजपा की नाक में दम कर के गुजरात के सियासी फलक पर चमकदार सितारे की तरह उभरे हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी अपना सियासी वजूद कायम रखने को संघर्षरत हैं। दिलचस्प बात यह है कि हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होकर चुनाव लड़ रहे हैं जबकि जिग्नेश कांग्रेस में रहकर चुनाव लड़ रहे हैं। ​हा​र्दिक पटेल अहमदाबाद की विरमगांव सीट से अल्पेश ठाकोर गांधीनगर द​क्षिण से भाजपा प्रत्याशी हैं जबकि जिग्नेश वडगांव से चुनाव लड़ रहे हैं। पा​र्टियों से जुड़ने के बाद इन युवा नेताओं के स्वतंत्र विचार अर्थहीन हो गए। पा​र्टियों  की मर्यादा में रह कर स्वीकार्य बनाने की चुनौती है। क्या हार्दिक पटेल के भाजपा में शामिल होने से पाटीदार वोट भाजपा को मिलेंगे। क्या ठाकोर के चलते गुजरात क्षत्रीय ठाकोर सेना के वोट भाजपा की झोली में गिरेंगे। यह सवाल अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है जिनके उत्तर हमें जनादेश से ही मिलेंगे। समाज ​विशेष की लड़ाई लड़कर चर्चा तो बटोरी जा सकती है। लेकिन चुनाव लड़ना और जीतना आसान नहीं होता। देखना यह है कि तीनों युवा कितने सफल होते हैं। मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल, विपक्ष के नेता सुखराम राठवा, स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल समेत कई अन्य सीटें भी काफी चर्चित हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश की मैनपुरी लोकसभा सीट, खतौली, रामपुर विधानसभा सीटों सहित सात उपचुनावों के लिए भी वोट डाले गए हैं। मैनपुरी लोकसभा सीट से स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की बहू डिम्पल यादव चुनाव लड़ रही हैं। यह सीट भी काफी दिलचस्प  है। गुजरात और हिमाचल के मतदाता किस तरह का जनादेश देते हैं। इस पर देश की नजरें लगी हुई हैं। दोनों राज्यों के चुनाव 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों का आधार तैयार करने के लिए काफी होगा।

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