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सात घर तो डायन भी छोड़ देती है

छोटे होते थे तो यह सुनते और पढ़ते थे कि एक डायन जो सबको खा जाती है परन्तु उसके इतने नियम तो होते हैं कि वह सात घर जो उसके घर के साथ लगते हैं, को छोड़ देती है
सात घर तो डायन भी छोड़ देती है
छोटे होते थे तो यह सुनते और पढ़ते थे कि एक डायन जो सबको खा जाती है परन्तु उसके इतने नियम तो होते हैं कि वह सात घर जो उसके घर के साथ लगते हैं, को छोड़ देती है और यही नहीं डाकुओं के भी कुछ नियम होते हैं। कहने का अर्थ है कि जिन्दगी में कुछ नियम, कुछ अन्तर्रात्मा  होती है जो समय आने पर उन्हें झंकझोर कर अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करती है।
जब सारा विश्व एक महामारी से गुजर रहा है, चारों तरफ भय का असुरक्षित वातावरण है, जहां सेवा भारती, सिख समाज, पंजाब समाज, वैश्व, जैन समाज, चौपाल, वरिष्ठ नागरिक संस्थाएं भी काम कर रही हैं। कहने का भाव हर व्यक्ति चाहे वो किसी भी धर्म से, जाति से है, एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आ रहे हैं, जिसकी जितनी क्षमता है वो सहायता के लिए आगे आ रहे हैं। जरूरी नहीं मदद पैसों से हो, एक-दूसरे को सूचना देकर ​की यहां आक्सीजन मिल रही है, यहां दवाई, यहां बेड खाली हैं आदि, या उन लोगों को खाना पहुंचा कर जो बीमारी से जूझ रहे हैं।
परन्तु यह क्या कुछ राक्षस,हैवान इस समय भी लोगों को ठगने में लगे हैं। माना महामारी से सभी के व्यवसाय पर असर है परन्तु कुछ नामी-​गिरामी लोग जिनको पैसों की कमी नहीं वो भी इस समय सुर्खियों में आ रहे हैं। कालाधंधा कर इस समय महामारी का फायदा उठाकर कभी आक्सीजन, कभी दवाइयां ब्लैक कर रहे हैं। सात घर तो डायन भी छोड़ देती है। वो इस समय अपने ही देश के भाई-बहनों को ठग रहे हैं। कहां है इन लोगों की अन्तर्रात्मा, क्या यह नहीं सोचते कि सब ने एक दिन चले जाना है, साथ कुछ नहीं लेकर जाना और सब का हिसाब ईश्वर ने करना है। हम सब अपना-अपना रोल करने के ​लिए आए हैं जैसे ही रोल समाप्त होगा, वैसे ही चले जाना है। बीमारी, एक्सिडेंट एक बहाना बनेंगे और या यूं कह लो हम सभी सहयात्री हैं, किसी का स्टेशन पहले आ जाता है, किसी का बाद में।
जो इस समय किसी के भी कष्ट का कारण बन रहे हैं वो बहुत बड़े पाप के भागी हैं। यह समय एक-दूसरे का हौंसला बढ़ाने का, साथ देने का, मदद करने का है। यह समय निकल जाएगा, हमेशा रात के बाद सुबह होती है, दुःख के बाद सुख आता है जो इस समय नुक्सान होगा या कोई एक-दूसरे को चोट पहुंचाएगा वो कभी नहीं भूलेगा। इंसान का सही चरित्र इसी समय सबके सामने आता है। मैं दो संस्थाओं से जुड़ कर काम कर रही हूं चौपाल और वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब। चौपाल की युवा टीम और बुजुर्गों की टीम जिस तरह से काम कर रही हैं वो बहुत प्रशंसनीय है। चौपाल की सशक्त टीम फिल्ड में उतर कर काम कर रही है। युवा हैं और वरिष्ठ नागरिक फोन और आनलाइन पर एक-दूसरे का हौसला बढ़ा रहे हैं। अपने-अपने तरीके से सब अपनी क्षमता अनुसार लगे हुए हैं। 
मुझे हैदराबाद के वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब के सदस्य शांति लाल सिपानी जी ने बहुत ही मार्मिक कहानी भेजी, जो इस समय के लिए बहुत उपयुक्त है और गुरुग्राम के सदस्य श्री अशोक रहेजा जी ने स्वयं (कविता) पंक्तियां लिख कर सबका हौसला बढ़ाया। मैं नीचे लिख रही हूं, उनके जैसा ही सबको हौसला बढ़ाना चाहिए।
‘‘वो दिन न रहे न सही, ये दौर भी गुजर जाएगा।
मत घबराना अंधेरों से, फिर नया सवेरा आएगा।
वक्त बहुत बलवान है, आया था राम-कृष्ण पर भी। 
कुछ वक्त की बात है, फिर वक्त सुनहरा आएगा।
रफ्तार जिन्दगी की धीमी है, पर थमी नहीं।
चलता चल तू, एक दिन मंजिल को पा जाएगा।
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, बंद हैं, तो क्या हुआ।
खाेल दिल की खिड़कियां, सब यहीं मिल जाएगा।
कुछ गरीबों के दीये में तेल तो डालो जरा।
राम किसी में, किसी में कृष्ण तुम्हें दिख जाएगा।
पास की बस्ती में देख, भूखा न सोये कोई।
बीत जाने को है पतझड़, फिर बसंत अब आएगा।
कश्ती की पाल को पकड़ हौंसले से,
लहर थमने को है अब, ये तुफां टल जाएगा।’’
*प्रेरणा*
डॉक्टर साहब ने स्पष्ट कह दिया,"जल्दी से जल्दी प्लाज्मा डोनर का इंतजाम कर लो नहीं तो कुछ भी हो सकता है।’’ रोहन को कुछ भी नही सूझ रहा था, मां फफक- फफक कर रो रही थी और सामने बेड पर थे बाबूजी जो बेहद ही सीरियस थे।  सब जगह तो देख लिया था सबसे गुहार कर ली थी लेकिन बी-पॉजिटिव प्लाज्मा का कोई इंतजाम ही नही हो रहा था। वैसे तो बी-पॉजिटिव प्लाज्मा तो उनके घर में ही था रोहन के चाचा अभी 2 माह पहले ही कोविड को हराकर लौटे थे। लेकिन चाचा जी से कहे तो कैसे अभी 15 दिन पहले ही जब चाचा जी ने बगल वाले प्लॉट में काम लगाया था तो बाबूजी ने मात्र 6 इंच जमीन के विवाद में भाई को ही जेल भिजवा दिया था ऐसे में चाचा जी शायद ही प्लाज्मा डोनेट करें!
खैर एक बार फिर माता जी को बाबूजी के पास छोड़कर शहर में चला प्लाज्मा तलाशने। दोपहर बीत गई, रात होने को आई कोई डोनर नही मिला थक हार कर लौट आया और माता जी से चिपक कर फूट-फूट कर रोने लगा, माताजी कोई डोनर नहीं मिल सका है, तब तक देखा कि चाचा जी बाबूजी के बेड के पास बैठे हैं। कुछ बोल नहीं पाया, चाचा जी खुद ही रोहन के पास आए सिर पर हाथ-फेर कर बोले तू क्या, जानता था कि नहीं बताएगा तो मुझे पता नहीं चलेगा, जो तेरा बाप है वो मेरा भी भाई है, प्लाज्मा दे दिया है, पैसों की या फिर किसी मदद की जरूरत हो तो बेहिचक बताना, भाई रहा तो लड़ झगड़ तो फिर भी लेंगे। चाचा जी आंसू पोछते जा रहे थे और सैलाव रोहन की आंखों में था कुछ बोल नहीं पाया सिर्फ चाचा जी के पैरों से लिपट गया।
साथियो संकट का समय है घर, परिवार, मोहल्ले में थोड़ा मन-मुटाव तो चलता है लेकिन इस आपदा के समय सारे गिले-शिकवे भूल कर मदद के लिए तत्पर रहें जिससे जो बने सो करे।*
साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना।
एक अकेला ​​​​ थक जाएगा, मिलकर कदम बढ़ाना।।
सदैव प्रसन्न रहिये और याद रखिये-
*जो प्राप्त है वो पर्याप्त है।*
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