Explainer: उम्रकैद की सजा में पैरोल कितनी बार मिलती है? जानें पूरी प्रक्रिया और नियम
Parole Rules In India: डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को बीते दिन हरियाणा सरकार की तरफ से 30 दिनों की पैरोल मिली है, जिसके बाद देश में पैरोल सिस्टम को लेकर फिर से बात होनी शुरू हो गई है। गुरमीत राम रहीम 2017 से कई मामलों में जेल में बंद हैं और 2020 के बाद से अब तक उन्हें कई बार अस्थायी रिहाई के तौर पर जेल से बाहर आ चुके है। इसी कारण से लोगों के मन में यह सवाल उठा है कि आखिर आजीवन कारावास या लंबी अवधि की सज़ा काट रहे किसी कैदी को, उसकी निर्धारित सज़ा की अवधि के दौरान कितनी बार पैरोल दी जा सकती है? इस संबंध में क्या नियम हैं?
पैरोल क्या होती है?
पैरोल का मूल अर्थ है किसी कैदी को एक निश्चित अवधि के लिए अस्थायी रूप से जेल से बाहर जाने की अनुमति देना। यह पूर्ण रिहाई नहीं होती; कैदी कानूनी रूप से दोषी ही बना रहता है और निर्धारित समय समाप्त होने पर उसे जेल वापस लौटना पड़ता है। यह मानवीय और सामाजिक आधारों पर प्रदान की जाती है।
क्या हर कैदी को पैरोल मिलती है?
भारतीय कानून के अनुसार, हर कैदी को पैरोल नहीं दी जाती है। इसके लिए कई शर्तें बनाई गई है, जैसे:-
* कैदी ने अपनी सजा का कुछ समय पूरा किया हो
* जेल में उसका व्यवहार सही हो
* वह सुरक्षा की दृष्टि से ठीक हो
* पुलिस और जेल की रिपोर्ट सही हो
* कोई जरूरी मानवीय या पारिवारिक वजह हो
किन कारणों से पैरोल दी जाती है?
कुछ मामलों में त्योहार या विशेष परिस्थितियों में भी पैरोल दी जा सकती है।
वहीं, पैरोल आमतौर पर मानवीय और पारिवारिक कारणों से दी जाती है, जैसे—
* परिवार में किसी की मौत
* किसी की गंभीर बीमारी
* परिवार में शादी या बच्चे का जन्म
* कैदी की अपनी गंभीर बीमारी या इलाज की जरूरत
* मानसिक तनाव कम करने और परिवार से जुड़े रहने के लिए
उम्रकैद में पैरोल कितनी बार मिल सकती है?
भारत में, पैरोल के नियम हर राज्य में अलग-अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, हरियाणा के नियमों के अनुसार, किसी कैदी को एक साल में कुल 10 हफ़्ते तक की पैरोल दी जा सकती है। इसे अलग-अलग किस्तों में लिया जा सकता है। इसके अलावा फरलो का अलग नियम होता है। राम रहीम को इस साल जनवरी में 40 दिन और मई में 30 दिन की पैरोल मिल चुकी है। इस तरह उनका साल का पैरोल कोटा पूरा हो चुका है।
पैरोल के प्रकार: भारत में मुख्य रूप से दो तरह की पैरोल होती हैं—
1. कस्टडी पैरोल
यह बहुत कम समय के लिए दी जाती है, जैसे किसी की मृत्यु या अंतिम संस्कार। इसमें कैदी पुलिस सुरक्षा में रहता है।
2. रेगुलर पैरोल
यह लंबी अवधि के लिए होती है, आमतौर पर 30 दिन तक। जरूरत पड़ने पर इसे बढ़ाया भी जा सकता है।
पैरोल और फरलो में अंतर
पैरोल और फरलो, दोनों में ही कैदियों को जेल से कुछ समय के लिए रिहा किया जाता है; हालांकि, इनके उद्देश्य, अवधि और नियम अलग-अलग होते हैं। मुख्य अंतर यह है कि पैरोल किसी खास आपातकालीन कारण—जैसे बीमारी, मृत्यु, या परिवार में शादी—के लिए दी जाती है, और यह कैदी का अधिकार नहीं होता। दूसरी ओर, फरलो अच्छे व्यवहार के इनाम के तौर पर दी जाती है, जिससे कैदी जेल की एकरसता से बाहर निकल पाता है और अपने परिवार तथा समाज से फिर से जुड़ पाता है। फरलो को पात्र कैदी का अधिकार माना जाता है।

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