+

पंजाब विधानसभा में पहली बार

पंजाब विधानसभा ने आज राज्य के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुए सर्वसम्मति से संसद द्वारा बनाये गये तीन कृषि कानूनों को नकारते हुए इनके वैकल्पिक स्वरूप को मंजूरी दे दी।
पंजाब विधानसभा में पहली बार
पंजाब विधानसभा ने आज राज्य के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुए सर्वसम्मति से संसद द्वारा बनाये गये तीन कृषि कानूनों को नकारते हुए इनके वैकल्पिक स्वरूप को मंजूरी दे दी। 1966 में पुनर्गठित पंजाब की विधानसभा में ऐसा पहली बार हुआ है जब कांग्रेस, अकाली दल व भाजपा (पूर्व में जनसंघ) किसी मुद्दे पर एक साथ उठ कर खड़े हुए हैं। मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह द्वारा विधानसभा के बुलाये गये विशेष सत्र में आज कुल 117 विधायकों में से 115 विधायकों ने मौजूद रह कर केन्द्र के कृषि कानूनों को निरस्त कर दिया और सर्वसम्मति से कैप्टन अमरेन्द्र सिंह द्वारा रखे गये संकल्प (रिजोल्यूशन) का समर्थन किया सदन में केवल दो भाजपा विधायक ही मौजूद नहीं रहे। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि पंजाब के किसानों में नये कृषि कानूनों को लेकर कितना रोष है। 
पंजाब की कांग्रेस सरकार ने अपने वैकल्पिक कानून में सबसे बड़ा प्रावधान यह किया है कि किसान से उसकी उपज खरीदने वाला कोई भी व्यापारी या पूंजीपति उसे घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम भाव पर नहीं खरीद सकता और यदि ऐसा कराता हुआ कोई पाया गया तो उसे जुर्माना भरने के साथ तीन साल की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है। यह स्वयं में एक क्रान्तिकारी कदम है  जो कि स्वतन्त्र भारत में किसानों के हित में उठाया गया है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब किसानों के हक में उनकी उपज के मूल्य को लेकर बेइमानी करने के लिए किसी को खतावार मानते हुए उसे सजा दी जायेगी। इससे पूर्व किसानों की फसल की खरीद-फरोख्त के विवादास्पद मामले सामान्य फौजदारी कानूनों के तहत ही आते थे। संसद द्वारा बनाये गये तीन कृषि कानूनों में हालांकि न्यूनतम खरीद मूल्य को समाप्त नहीं किया गया है मगर खरीदारों के लिए यह भी जरूरी नहीं किया गया है कि वे किसान की उपज इस घोषित मूल्य से नीचे पर नहीं खरीदेंगे।  पंजाब में कृषि मंडियों का जाल पूरे देश में सबसे ज्यादा मजबूत होने की वजह से इनकी मार्फत कृषि उपज का व्यापार बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। पंजाब के इस नये कानून से इन मंडियों की भी सुरक्षा हो सकेगी। 
 पूरे देश में सात हजार के लगभग कृषि मंडियां हैं जिनमें से दो हजार के लगभग अकेले पंजाब में ही हैं। सबसे ज्यादा महत्व का मुद्दा यह है कि पंजाब भारत का ऐसा अकेला राज्य है जिसकी अपनी सकल उत्पाद वृद्धि दर में कृषि का हिस्सा सबसे ज्यादा 43 प्रतिशत के करीब है। अतः इसकी अर्थव्यवस्था का कर्णधार इस क्षेत्र को माना जाता है। इसके साथ ही पंजाब के किसान केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपने नवोन्मेषी स्वभाव व पक्की लगन के लिए पहचाने जाते हैं। नये-नये प्रयोग करते हुए आधुनिक टैक्नोलोजी का खेती में प्रयोग करने में इनका सानी नहीं माना जाता। यही वजह है कि दुनिया का आर्थिक भूमंडलीकरण होने के बाद इनकी मांग पूर्वी यूरोप के देशों जैसे रोमानिया व चेकोस्लोवाकिया आदि में भी बढ़ी है।
 भारत के सन्दर्भ में पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों के किसानों को ‘अन्नकुट’ का दर्जा दिया जाता है जो बताता है कि पूरे देश के अन्न भंडारों को भरने की इनमें अपार क्षमता है, इस क्षेत्र के किसान इतने उद्यमी और मेहनतकश हैं कि कोरोना काल में भी इन्होंने अपनी उपज में पहले से अधिक वृद्धि की। वास्तव में इनकी उपज के मूल्यों पर सरकार को इस वर्ष ‘कोरोना बोनस’ की घोषणा करनी चाहिए थी। इसके साथ ही भारत के किसानों का दूसरा पक्ष यह भी है कि 80 प्रतिशत के लगभग किसानों के पास पांच एकड़ से कम ही खेती योग्य जमीन है जिसकी वजह से कृषि मंडी समितियों के बनाये गये तन्त्र की विशेष भूमिका हो जाती है। ये मंडियां किसानों को एेसा आर्थिक सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं जिनके भरोसे वह अपने माल की वाजिब कीमत प्राप्त करने का भरोसा रखता है। अतः आज विधानसभा में किया गया कृषि मूलक फैसला स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए किया गया फैसला है। संभवतः यही वजह थी कि हमारे संविधान निर्माताओं ने कृषि को राज्यों की सूची में रखा था। अतः पंजाब ने अपनी जमीनी भौगोलिक व आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए ये वैकल्पिक कृषि कानून बनाये हैं। जाहिर है कि इन पर अब राज्यपाल की स्वीकृति लेनी होगी और राष्ट्रपति महोदय की सन्मति भी आवश्यक होगी। अतः मामला कानूनी दांवपेंचों में उलझ सकता है परन्तु इसका संबन्ध  भारत के संघीय ढांचे से इस प्रकार है कि संसद के उच्च सदन में तीन कृषि विधेयकों का विरोध उन पार्टियों ने भी किया था, जिन्होंने इनका समर्थन लोकसभा में किया था। चुंकि राज्यसभा राज्यों की परिषद होती है, अतः वहां विरोधाभास पैदा होना भारत के संघीय ढांचे की वह तस्वीर पैदा करता था जिसमें राज्य किसी भी केन्द्रीय कानून के अपने क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों की मुख्य चिन्ता करते हैं। बेशक केन्द्रीय कानून बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के नियमों का पालन करते हुए लाये गये थे किन्तु पंजाब विधानसभा ने आज जो कानून पारित किये हैं उनमें से एक यह भी है ढाई एकड़ तक की जमीन के मालिक किसान की भूमि को कोई भी वित्त संस्थान कर्ज अदा न करने पर कुड़क नहीं कर सकता है। दूसरे यह मामला राज्यों की अर्थव्यवस्था से सम्बन्ध रखता है और उनके राज्य सूची में आने वाले अधिकारों के मुतल्लिक है। केन्द्रीय कानूनों में कृषि से सम्बन्धित सभी मसलों पर (खाद्य भंडारण की सीमा से लेकर जमाखोरी करने तक ) राज्य सरकारों को अधिकारविहीन बना दिया था जिसकी वजह से पंजाब ने यह विकल्प सुझाया है, परन्तु यह केन्द्र व राज्यों के बीच टकराव की स्थिति पैदा न करे, इसे भी ध्यान में रखा जाना चाहिए और  ऐसा बीच का रास्ता निकाला जाना चाहिए जिससे किसान के साथ ही भारत की खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।
facebook twitter instagram