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‘डिडॅ नॉट फिनिश’ से मेडल तक

भारतीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलिम्पिक में 49 किलोग्राम वर्ग में 202 किलो वजन उठाकर सिल्वर मेडल जीत लिया।
‘डिडॅ नॉट फिनिश’ से मेडल तक
भारतीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलिम्पिक में 49 किलोग्राम वर्ग में 202 किलो वजन उठाकर सिल्वर मेडल जीत लिया। मीराबाई पहली ऐसी भारतीय वेटलिफ्टर हैं, जिन्होंने ओलिम्पिक में रजत पदक जीता है। उनसे पहले कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीता था।  ओलिम्पिक के इतिहास में मीराबाई सिल्वर मेडल जीतने वाली पीवी सिंधू के बाद दूसरी भारतीय महिला हैं। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि बचपन में घर का चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियां चुनकर लाने वाली लड़की भारत का नाम रोशन करेगी। मीराबाई आसानी से भारी से भारी गट्ठर कंधे पर उठाकर ले आती थी, जबकि उसके अन्य भाई-बहनों को भार उठाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। ऐसे लगता था​ कि जैसे उसके पास भगवान ने विशेष शक्ति दी है। वह ​तीरंदाज बनना चाहती थी ताकि उसके कपड़े गंदे न हों। इम्फाल के नोंगपोक कामचिंग गांव में रहने वाली चानू तीरंदाजी के लिए ट्रायल देने भी गई थी, लेकिन उसे किसी ने ट्रेनिंग नहीं दी। जब वह आठवीं क्लास में थी, तब किताब में एक चैप्टर ने उसका भाग्य ही बदल दिया। उसने किताब में भारत की महान वेटलिफ्टर कुंजारानी देवी की सफलता की कहानी पढ़ी। बस यहीं से उसका लक्ष्य बदल गया। यही चैप्टर उसकी प्रेरणा बन गया। 
जीवन में कौन सा अध्याय कब आपके लिए प्रेरणा बन जाए और आप कुछ बनने की ठान लें तो सफलता आपके कदम चूमने लगती है। कुंजारानी उन दिनों स्टार थीं और एथेंस ओलिम्पिक में खेलने गई थीं। उन दिनों किसी महिला का ओलिम्पिक जाना बहुत बड़ी बात थी। इम्फाल से उनका गांव 200 किलोमीटर था। जब उसने प्रेक्टिस शुरू की तो पहले उसके पास लोहे की बार भी नहीं थी तो वह बांस से ही प्रैक्टिस किया करती थी। परिवार भी आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं था। उसके लिए पर्याप्त डाइट का खर्चा करना भी मुश्किल था। लेकिन परिवार ने बड़ी मेहनत कर चानू को 60 किलोमीटर दूर ट्रेनिंग के लिए जाना पड़ता था। पहले वह अंडर-15 चैम्पियन बनी और 17 वर्ष की उम्र में जूनियर चैम्पिन बनी। 2016 में मीराबाई ने उसी की आइडल रहीं कुंजारानी का 12 वर्ष पुराना रिकॉर्ड 192 किलोग्राम वजन उठाकर तोड़ डाला सफर तब भी आसान नहीं था। माता-पिता के पास इतने संसाधन नहीं थे कि वे उसका खर्च उठा सकें। 
बात यहां तक पहुंच गई थी कि अगर रियो ओलिम्पिक के ​लिए क्वालीफाई नहीं कर पाई तो वो खेल छोड़ देंगी। रियो ओलिम्पिक उसके जीवन का एक ऐसा पड़ाव था, जिसने उसे बहुत बड़ी सीख दी। कहते हैं कि हर असफलता हर सफलता की सीढ़ी होती है। उसकी सफलता में रियो की असफलता एक पायदान बन गई। ओलिम्पिक जैसे मुकाबले में अगर किसी खिलाड़ी के नाम के आगे ‘डिडॅ नॉट फिनिश’ लिखा जाए तो यह मनोबल तोड़ने वाली बात होती है। जो वजन मीरा रोजाना प्रैक्टिस में आसानी से उठा लिया करती थी, लेकिन वह रियो में उसके हाथ बर्फ की तरह जम गए थे। फिर शुरू हुआ आलोचनाओं का दौर। मीरा डिप्रेशन का शिकार हो गई और उसे कई हफ्ते मनोवैज्ञानिक के सेशन लेने पड़े। उसने वेट लिफ्टिंग छोड़ने का इरादा बनाया लेकिन हार नहीं मानी। उसने ठान लिया कि वह शानदार वापिसी करेगी। मीराबाई ने 2018 में आस्ट्रेलिया में राष्ट्रमंडल खेेेलों में 48 किलो वर्ग के भारोत्तोलन में गोल्ड मेडल जीता था। उसने 2017 में वर्ल्ड वेट लिफ्टिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड जीता। चार फुट 11 इंच की मीरा को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि वह बड़ों-बड़ों को हरा सकती है। अंततः उसने ओलिम्पिक में रजत पदक जीत ही लिया। यह पदक उसकी दृढ़ता और धैर्य की निशानी है। यह पदक उसने मानसिक मजबूती के दम पर जीता है। उसने रियो की निराशा पर काबू पाया। इसके लिए उसने बहुत ध्यान केन्द्रित किया। तमाम बाधाओं का सामना करने के बावजूद कभी पीछे नहीं हटी। हो सकता है कि रियो ओलिम्पिक में वह घबरा गई थी क्योंकि उस पर कई तरह के आर्थिक और पारिवारिक दबाव थे। इस बार वह दृढ़ निश्चय के साथ टोक्यो रवाना हुई थी। उसकी यह सफलता हर किसी को प्रेरित करती है। मीरा भारत की लाखों लड़कियों की ‘आइडल’ बन चुकी है। इस सफलता के पीछे कई वर्षों का संघर्ष और मेहनत छिपी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फोन कर उसे बधाई दी तो मीरा भावुक हो गई। उसकी सफलता भारत को एक संदेश है कि बेटियों को बड़े सपने देखने दो, उनके लक्ष्य में बाधक न बनो, उन्हें उड़ने दो। उसकी जीत अन्य खिलाड़िओ के लिए भी संदेश है कि उनका जीवन अलग होता। हर खेल के बाद एक नई चुनौती आती है। खिलाड़िओ के काम के घंटे तय नहीं होते। हर मैच के बाद और ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाना होता है।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com
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