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जीएसटी : राज्यों की क्षतिपूर्ति का मुद्दा

जीएसटी से सम्बन्धित मामलों में फैसले लेने वाली शीर्ष संस्था जीएसटी परिषद की बैठक चंडीगढ़ में सम्पन्न हो गई।
जीएसटी : राज्यों की क्षतिपूर्ति का मुद्दा
जीएसटी से सम्बन्धित मामलों में फैसले लेने वाली शीर्ष संस्था जीएसटी परिषद की बैठक चंडीगढ़ में सम्पन्न हो गई। बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले नहीं हो सके। बैठक से पहले ही राजस्व में कमी आने की आशंका से परेेेशान कई राज्य क्षतिपूर्ति को लेकर मुखर हो गए थे। जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों को होने वाले राजस्व नुक्सान की केन्द्र से भरपाई की क्षतिपूर्ति व्यवस्था पांच वर्ष के लिए लागू की गई थी। यह समय सीमा 30 जून को खत्म हो गई। राजनीति से ऊपर उठकर लगभग 12 राज्यों ने क्षतिपूर्ति व्यवस्था जारी रखने की मांग की लेकिन इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ। कोरोना महामारी के चलते दो साल से आर्थिक गतिविधियों के बुरी तरह प्रभावित रहने का हवाला देते हुए कई राज्यों ने इस व्यवस्था को जारी रखने का समर्थन किया। कई राज्यों में जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद काफी नुक्सान हुआ है। खास तौर पर खनन और विनिर्माण आधारित राज्यों को जीएसटी के तहत काफी नुक्सान हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य ने तो मांग की है कि यदि संरक्षित राजस्व प्रावधान जारी नहीं रखा जाता तो केन्द्रीकृत जीएसटी और राज्य जीएसटी से सम्बन्धित 50-50 फीसदी के फार्मूले को बदल कर एसजीएसटी को 80-70 प्रतिशत और सी जीएसटी को 20-30 फीसदी किया जाए। इस समय जीएसटी से  एकत्रित राजस्व को केन्द्र और राज्यों के बीच समान रूप से साझा किया जाता है। उपकर से संग्रह का उपयाेग जीएसटी कार्यान्वयन के कारण राज्यों को राजस्व हानि की भरपाई के लिए किया जाता है। इस संंबंध में फैसला लिया जाना बाकी है।
जीएसटी परिषद ने दर और दायरा बढ़ाते हुए खानपान और  राेजमर्रा के इस्तेमाल वाली कई चीजों को कर दायरे में लाकर आम आदमी पर बोझ काफी बढ़ा दिया है। डिब्बाबंद मांस-मछली, पैकेट में आने वाले दही-छाछ, पनीर, शहद, पापड़, गेहूं, सोयाबीन, मोटे अनाज, गुड़, मुरमुरे पर पांच फीसदी कर लगा दिया गया है। इन चीजों को जीएसटी दायरे में लाने की सिफारिश परिषद के ही मंत्रियों के एक समूह ने की थी। जिन चीजों को जीएसटी दायरे में लाया गया है, उसका इस्तेमाल आम आदमी ही करता है। महंगाई लगातार बढ़ रही है, ऐसे में इन वस्तुओं को कर दायरे में लाना तर्कसंगत नहीं लगता।
डालर के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा है। डालर की कीमत 79 रुपए तक पहुंच गई है। इससे महंगाई और बढ़ने की आशंका मंडराने लगी है। महंगाई विकास की राह को मुश्किल बना देती है, क्योंकि इससे उपभोक्ता मांग, व्यावसायिक और इन्फ्रास्ट्रक्चर, निवेश आदि पर प्रतिकूल असर पड़ता है। जो भी वस्तु हम आयात करेंगे उसकी कीमत हमें डालर में देनी होगी। इससे हर चीज महंगी होगी। यद्यपि निर्यात में भी रिकार्ड वृद्धि हुई है लेकिन आयात में तेज वृद्धि होने से हमारा व्यापार घाटा काफी बढ़ चुका है। जब भी रुपए की कीमत गिरती है। तो सट्टेबाज पैसा बनाने के लिए  बाजार में डालर की बनावटी कमी पैदा कर देते हैं। मुद्रा की ​विनिमय दर को स्थिर रखने के​ लिए रिजर्व बैंक को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
जीएसटी परिषद ने कैसीनो, घुड़दौड़, ऑनलाइन गेमिंग और  लाटरी पर 28 फीसदी टैक्स लगाने के फैसले को अभी टाल दिया है, क्योंकि अभी इस पर विचार-विमर्श की जरूरत है। देश  में इंटरनैट और  मोबाइल विस्तार के कारण मनी गेमिंग उद्योग का खासा विस्तार हुआ है। 2025 तक इस उद्योग का व्यवसाय 5 अरब डालर से भी अधिक हो जाएगा। हर बड़ा खिलाड़ी आनलाइन गेम्स के एड करते दिखाई दे रहा है। कैसीनों में करोड़ों रुपए का लेन-देन होता है। रेसकोर्स में तो धन का ही बोलबाला है। कौशल आधारित खेलों की आड़ में विशुद्ध जुआ चल रहा है। कुछ जीत जाते हैं कुछ हार जाते हैं। यदि इन चीजों को जीएसटी के दायरे में लाया जाए तो भारी राजस्व मिल सकता है। जीएसटी परिषद की अगली बैठक में इस संबंध में फैसला लेना होगा लेकिन साथ ही राज्यों को हो रहे नुक्सान की भरपाई के लिए क्षतिपूर्ति व्यवस्था को जारी रखना होगा। राज्यों को भी विकास योजनाएं और कल्याणकारी योजनाएं चलाने के​ लिए राजस्व की जरूरत है। यह व्यवस्था तब तक जारी रहनी चाहिए जब तक राज्य खुद राजस्व जुटाने में आत्मनिर्भर न हो जाएं। जीएसटी संग्रहण में निरंतर वृद्धि से स्पष्ट है कि मुद्रा स्फीति के कारण बाजार में मांग में कमी के बावजूद कारोबारी गतिविधियां बढ़ी हैं। आंकड़ों को देखें तो एक उत्साहजनक तस्वीर दिखाई देती है। लेकिन सब से बड़ी चुनौती आम आदमी को राहत पहुंचाना है। अभी इस दिशा में बहुत काम करना होगा।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com
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