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हरेन पंड्या हत्या मामला: उच्चतम न्यायालय ने नौ दोषियों की पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कीं

हरेन पंड्या हत्या मामला: उच्चतम न्यायालय ने नौ दोषियों की पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कीं
 उच्चतम न्यायालय ने गुजरात के पूर्व गृहमंत्री हरेन पंड्या की 2003 में हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा पाये नौ दोषियों द्वारा दायर याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इन दोषियों ने अपनी याचिकाओं में शीर्ष अदालत से अपने उस फैसले पर पुनर्विचार का आग्रह किया था जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया था।
 
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पुनर्विचार याचिकाओं में इस साल पांच जुलाई के उसके फैसले में किसी स्पष्ट त्रुटि का उल्लेख नहीं किया गया है। 

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति विनीत सरन की पीठ ने कहा, ‘‘हमने पुनर्विचार याचिकाओं और अपीलों के रिकॉर्ड पर गौर किया है और इससे आश्वस्त हैं कि जिस आदेश पर पुनर्विचार की मांग की गई है, उसमें साफ तौर पर कोई त्रुटि नहीं है जिससे कि उसके पुनर्विचार की जरूरत हो। तदनुसार पुनर्विचार याचिकाएं खारिज की जाती हैं।’’ 

उच्चतम न्यायालय ने गत पांच जुलाई के अपने फैसले में नौ आरोपियों को हत्या के मामले से बरी करने के गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया था। 

न्यायालय ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा था जिसमें मामले में 12 व्यक्तियों को विभिन्न अपराधों के लिए दोषी ठहराया था और उन्हें पांच साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा सुनाई थी। 

गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन राज्य सरकार में पंड्या गृहमंत्री थे। पंड्या की 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद के लॉ गार्डन के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। 

सीबीआई के अनुसार पंड्या की हत्या गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक दंगों का बदला लेने के लिए की गई थी। 

न्यायालय ने पांच जुलाई के अपने फैसले में कहा था, ‘‘हम निचली अदालत द्वारा ए 1 (मोहम्मद असगर अली), ए4 (कलीम अहमद), ए5 (अनस माचिसवाला), ए6 (मोहम्मद यूनुस सरेशवाला), ए7 (रेहान पुथावाला), ए8 (मोहम्मद रियाज़ उर्फ गोरू), ए9 (मोहम्मद परवेज शेख), ए10 (परवेज खान पठान) और ए11 (मोहम्मद फारूक) की दोषसिद्धि और सजा को बहाल रखते हैं, जैसा आदेश निचली अदालत ने दिया था।’’ 

तीन अन्य आरोपियों...मोहम्मद अब्दुल रऊफ, मोहम्मद शफीउद्दीन और शाहनवाज गांधी के बारे में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि चूंकि सीबीआई ने उन्हें हत्या के आरोपों से दोषमुक्त करने के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय के समक्ष कोई अपील दायर नहीं करने का फैसला किया था, इसलिये ‘‘आगे किसी हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।’’

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