मेडिकल इंटर्न के स्टाइपेंड में समानता का मामला फिर अटका, चार वर्षों से अधिक समय से लंबित है यह मामला
Medical Intern : देशभर के मेडिकल इंटर्न के लिए स्टाइपेंड में समानता (पे पैरिटी) का मुद्दा अब भी अधर में लटका हुआ है। एक आरटीआई से खुलासा हुआ है कि नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) स्वास्थ्य मंत्रालय के दो बार निर्देश देने के बावजूद इस मामले में आवश्यक नियमों में संशोधन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा पाया है।
आरटीआई के अनुसार, स्वास्थ्य मंत्रालय ने एनएमसी को दो बार पत्र लिखकर सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के इंटर्न के बीच स्टाइपेंड की असमानता की समीक्षा करने और आवश्यक बदलाव पर विचार करने को कहा था।
एनएमसी ने अपने जवाब में माना कि विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में स्टाइपेंड को लेकर समानता नहीं है और नियमों में बदलाव की आवश्यकता है। हालांकि, 30 जून के जवाब में आयोग ने कहा कि नियमों में संशोधन किए जाने पर संबंधित हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी। आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. के.वी. बाबू ने आरोप लगाया कि यह मामला चार वर्षों से अधिक समय से लंबित है।
उनका कहना है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले वर्ष दिसंबर में ही एनएमसी को स्पष्ट रूप से स्टाइपेंड में समानता सुनिश्चित करने के लिए नियमों में बदलाव पर विचार करने का निर्देश दिया था। फरवरी 2026 में अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड (यूजीएमईबी) ने भी संशोधन की आवश्यकता स्वीकार की थी, लेकिन अब तक औपचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।
विभिन्न राज्यों और संस्थानों में स्टाइपेंड की राशि में बड़ा अंतर
बता दें कि वर्तमान में कंपल्सरी रोटेटिंग मेडिकल इंटर्नशिप (सीआरएमआई) रेगुलेशंस-2021 के तहत इंटर्न का स्टाइपेंड संबंधित संस्थान, विश्वविद्यालय या राज्य सरकार द्वारा तय किया जाता है। इसके कारण विभिन्न राज्यों और संस्थानों में स्टाइपेंड की राशि में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। इसके विपरीत, पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशंस-2023 सरकारी और निजी संस्थानों के प्रशिक्षुओं के बीच ऐसा कोई भेद नहीं करता। ऐसे में मेडिकल इंटर्न लंबे समय से पूरे देश में समान स्टाइपेंड व्यवस्था लागू करने की मांग कर रहे हैं।
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