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जवानों के लिए ​इंसानियत ही सर्वोपरि है

जवानों के लिए ​इंसानियत ही सर्वोपरि है
भारतीय सेना और अर्द्ध सैन्य बलों की शौर्य गाथाओं से इतिहास भरा पड़ा है। शांति हो या युद्ध काल या फिर कोई प्राकृतिक आपदा, हमारे जवानों ने हमेशा देश की अभूतपूर्व सेवा की है। आज भारत अगर चैन की नींद सोता है तो इसका पूरा श्रेय जवानों को दिया जाना चाहिए। भारत के लोगों का सैन्य बलों पर पूरा भरोसा है। जवानों ने हमेशा अपनी जान पर खेल कर दूसरों की जान बचाई है। केदारनाथ प्राकृतिक आपदा के दौरान भी पूरा राष्ट्र इस बात का गवाह है कि सेना, अर्द्ध सैन्य बलों के जवानों ने हजारों लोगों को एयर लिफ्ट कर उनकी जान बचाई। इस तरह उन्होंने मानवता की रक्षा की। सैन्य बलों की ड्यूटी आतंक​वादियों को मुंह तोड़ जवाब देना तो है ही, साथ ही उन्हें इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि मुठभेड़ के दौरान किसी निर्दोष की जान न चली जाए। 
जम्मू-कश्मीर के सोपोर में कश्मीरी आतंकवादियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर हमला किया तो दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू हुई। इस दौरान उसी रास्ते से अपने तीन वर्षीय पोते के साथ गुजर रहा नागरिक भी आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गया। घाटी में आतंकवाद की दर्दनाक तस्वीर सामने आई। दादा की खून से लथपथ लाश सड़क पर पड़ी थी और तीन साल का नन्हा फरिश्ता शव पर ही बैठा था। उसके हाथों में लिए बिस्कुट भी खून में भीग चुके थे। आतंकवादियों को मुंह​ तोड़ जवाब देने की पोजीशन ले रहे सीआरपीएफ के जवान की नजर इस बच्चे पर पड़ी तो उन्होंने बच्चे के चारों तरफ गाड़ियां लगा दीं। आतंकवादी मस्जिद की छत पर से फायरिंग कर रहे थे, बच्चे को बचाना आसान नहीं था लेकिन सीआरपीएफ के जांबाज इम्तयाज ने अपनी जान पर खेल कर नन्हें फरिश्ते को बचाया और उसे उठाकर बुलेटप्रूफ गाड़ी में बैठा दिया। इस तरह सीआरपीएफ के जवान ने इंसानियत का धर्म निभाया और बच्चे को नया जीवन दिया। बच्चा जब अपने परिवार से मिला तो मुस्कराया। उसे नहीं मालूम कि  उसके दादा की मौत हो चुकी है।
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से जूझ रहे सैन्य और अर्द्ध सैन्य बलों के जवान आतंकवाद प्रभावित जिलों में न केवल शहादतें दे रहे हैं बल्कि मानवता की सेवा भी कर रहे हैं। जब जम्मू-कश्मीर में भयंकर बाढ़ आई थी तो सुरक्षा बलों के जवानों ने कश्मीरी अवाम को न केवल राहत सामग्री, दवाइयां पहुंचाई बल्कि नावों से लोगों को सुरक्षित निकाला लेकिन कश्मीर के तथाकथित मानवतावादियों ने सुरक्षा बलों के जवानों के राहत अभियान का भी विरोध किया था। कश्मीर में ऐसे मानवतावादियों में हुर्रियत के लोग भी शामिल रहे, जो अब अपना अस्तित्व ढूंढ रहे हैं। शेष भारत में ऐसे अनेक तथाकथित बुद्धिजीवी हैं जिन्होंने हमेशा आतंकवादियों, पत्थरबाजों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आवाज बुलंद की, लेकिन पत्थरबाजों से घिरे जवानों के मानवाधिकार याद नहीं। क्या जवानों के कोई मानवाधिकार नहीं हैं। 
जब अपने साथी जवानों को बचाने के लिए एक जवान ने कश्मीरी नागरिक को जीप से बांध कर घुमाया था तो इन तथाकथित मानवाधिकारवादियों ने तूफान खड़ा कर दिया था। अब तो कश्मीर में दो जिले ही आतंकवाद प्रभावित रह गए हैं। आजादी से लेकर अब तक कश्मीर में विष बीज ही बांटे गए। कश्मीरी युवाओं ने विवेकहीन होकर आतंकवाद की राह पकड़ी और एक-एक करके सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए। अब तो आतंकी कमांडरों की उम्र मात्र 6 माह या एक वर्ष ही रह गई है। बुरहान वानी की मौत के बाद जो भी आतंक का पोस्टर ब्वाय बना, उसे ढेर कर दिया गया। 
कश्मीरी अवाम को यह दिखाई नहीं देता कि सेना की मुहिम के चलते राह से भटके कितने युवा बंदूक छोड़ कर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हुए हैं। सेना ने कई बार आतंकी बनने के लिए घर से निकले युवाओं की घर वापसी के लिए उनके परिजनों से अपील करवाई जिसके परिणाम सकारात्मक निकले। घाटी की समस्या यह भी है कि घोर साम्प्रदायिकता में डूबे, घृणा फैलाने वाले शब्दों में से कश्मीरी अवाम संस्कार ढूंढने की कला कहां से लाए। सुरक्षा बल के जवान कश्मीरी अवाम के लिए मेडिकल कैम्प लगाते हैं, आईएएस या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कश्मीरी युवक-युवतियों के लिए कोचिंग कक्षाएं लगाते हैं। उनके सुख-दुख के भागीदार बनते हैं, परन्तु कश्मीरी अवाम को अब भी समझ नहीं आता।
कश्मीरी अवाम को समझना होग कि-
-क्या मौलाना आजाद जैसी हस्तियों का योगदान किसी से कम है?
-क्या डा. कलाम जैसे महामानव से राष्ट्रपति पद की गरिमा नहीं बढ़ी?
-जब शहनाई की बात हो तो  विस्मिल्ला खां के अलावा कोई नाम सूझता है?
-क्या मोहम्मद रफी साहब को कोई भुला सकता है?
फिर कोई बुरहान वानी, कोई अजहर मसूद या हाफिज सईद कश्मीरी युवाओं का प्रतिनिधि क्यों बने।
कश्मीरियों को कश्मीरियत को बनाए रखने के लिए अपने भीतर की मानवता को जगाना होगा। जिस तरह सीआरपीएफ जवान ने नन्हें फरिश्ते की जान बचाकर उसे मुस्कान दी है, उसी तरह कश्मीरी अवाम को भी स्वयं आगे आना होगा।
‘‘अपना गम लेकर कहीं और न जाएं,
घर की बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए,
जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं,
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए, 
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, 
यूं कर लें किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।’’
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