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भूख हड़ताल पर क्या कहता है देश का कानून, क्या प्रशासन जबरन खिला सकता है खाना?

19 दिन से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक की सेहत पर हाई कोर्ट सख्त है। भारत में अनशन करना अनुच्छेद 19 के तहत कानूनी है, लेकिन अनुच्छेद 21 के तहत किसी की जान खतरे में होने पर सरकार मूकदर्शक नहीं रह सकती। ऐसे में सरकार के पास क्या विकल्प बचते हैं?
03:40 PM Jul 16, 2026 IST | Rohit Singh
19 दिन से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक की सेहत पर हाई कोर्ट सख्त है। भारत में अनशन करना अनुच्छेद 19 के तहत कानूनी है, लेकिन अनुच्छेद 21 के तहत किसी की जान खतरे में होने पर सरकार मूकदर्शक नहीं रह सकती। ऐसे में सरकार के पास क्या विकल्प बचते हैं?
भूख हड़ताल पर क्या कहता है देश का कानून  क्या प्रशासन जबरन खिला सकता है खाना
Government Action on Hunger Strike (SOURCE : SOCIAL MEDIA)

Government Action on Hunger Strike : दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर एनवायरमेंटलिस्ट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के अनशन का आज गुरुवार को 19वां दिन है। इस बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने भी केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिए कि वह सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का रूटीन चेक करे।

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मगर सवाल यह कि भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य यदि समय के साथ बिगड़ता जा रहा है तो वह अपनी मांगों व हड़ताल पर अड़े रहते हैं और सरकार उनकी मांगे नहीं मानती है तो सरकार के पास विकल्प बचता है? यानी भूख हड़ताल के माध्यम से अपना शरीर त्याग देना कानून के दायरे में आता है? क्या सरकार भूख हड़ताल के बीच में दखल दे सकती है? आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब

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भूख हड़ताल पर कानूनी पक्ष क्या कहता है?

भूख हड़ताल भारत में कोई नया विरोध का जरिया नहीं है। इससे पहले भी आजादी के आंदोलन और आजादी के बाद कई लोग ऐसे हुए जिन्होंने अपनी मांगों को लेकर समय समय पर भूख हड़ताल कीभारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी व्यक्ति को भूख हड़ताल पर बैठने से रोकता है

भारत का संविधान अपने नागरिकों को अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना अंदोलनकारियों के शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने का अधिकार देता है। इसी अधिकार के दायरे में पीसफुल प्रोटेस्ट या और सांकेतिक उपवास आते हैं, जिन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।

हालांकि, ये अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं हैं। अगर सार्वजनिक व्यवस्थ, देश की सुरक्षा या नैतिकता पर कोई खतरा मंडराता है, तो सरकार इन अधिकारों पर तार्किक पाबंदियां लगा सकती है।

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कानूनन कब दखल दे सकती है सरकार?

अनशन शुरू करना भले ही कोई अपराध न हो, लेकिन जब यह प्रदर्शन किसी व्यक्ति की जान के लिए गंभीर खतरा बन जाए, तब सरकारी मशीनरी और पुलिस को दखल देना पड़ता है।

संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को 'जीने का अधिकार' देता है। अदालतों ने कई बार साफ किया है कि अगर किसी की जान को सीधा खतरा हो, तो सरकार मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकती। यही वजह है कि गंभीर स्थिति होने पर प्रशासन प्रदर्शनकारियों को अस्पताल शिफ्ट करता है।

Government Action on Hunger Strike

ऐसा ही मामला गंगा एक्ट की मांग को लेकर 111 दिन से अनशन पर बैठे प्रोफेसर जी डी अग्रवाल के साथ हुआ था। लगातार भूख हड़ताल में रहने के चलते 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। प्रो अग्रवाल को सरकार ने जबरन उठाकर ऋषिकेश के एम्स में भर्ती करवा दिया था, बावजूद इसके उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं हो पाया और उन्होंने प्राण त्याग दिए थे।

क्या जबरन खिलाया जा सकता है खाना?

भारत में ऐसा कोई सीधा कानून नहीं है जो हर भूख हड़ताल करने वाले को जबरन खाना खिलाने की इजाजत देता हो। अमूमन प्रशासन पहले बातचीत, काउंसिलिंग और डॉक्टरों की सलाह का रास्ता चुनता है। अगर कोर्ट आदेश दे या डॉक्टरों को लगे कि मरीज की जान जाने वाली है, तब अस्पताल में इलाज शुरू किया जाता है।

Government Action on Hunger Strike
Government Action on Hunger Strike (SOURCE : SOCIAL MEDIA)

हालांकि मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल के दौरान उन्हें जबरन नाक से आहार दिया जाता था। उन्होंने लगातार 16 सालों तक अपनी हड़ताल जारी रखी।

हालांकि सोनम वांगचुक के मामले में भी अभी दिल्ली हाई कोर्ट ने जबरन खाना खिलाने जैसा कोई आदेश नहीं दिया है, या सरकार ने इस तरह का कोई कदम नहीं उठाया है बल्कि केवल रोज हेल्थ चेकअप और जरूरी मेडिकल मदद देने को कहा है।

क्या पुलिस प्रदर्शनकारियों को हटा सकती है?

हां, कुछ खास हालातों में पुलिस कार्रवाई कर सकती है। अगर प्रदर्शन बिना अनुमति के हो रहा हो, धारा 144 लागू हो, आम रास्ते में रुकावट आ रही हो या कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर हो, तो पुलिस प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले सकती है या उन्हें वहां से हटा सकती है।

हालांकि, ऐसी कार्रवाई अनशन करने की वजह से नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर की जाती है। यदि प्रदर्शन के दौरान किसी प्रकार का उपद्रव या हिंसा भड़कने की आशंका हो या ऐसी स्थिति पैदा होती है तो सरकार प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले सकती है

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Rohit Singh

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रोहित सिंह पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। राजनीति, समाज, अंतर्राष्ट्रीय, अपराध और शैक्षणिक लेख लिखने में दिलचस्पी रखते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से पोलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन और जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में पंजाब केसरी दिल्ली में हिन्दी सब-एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं।

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