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जी-7 में भारत की भूमिका

विश्व के सात औद्योगीकृत व विकसित प्रजातान्त्रिक देशों के संगठन जी-7 में भारत को आमन्त्रित सदस्य के रूप में बुलाया जाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आजादी के बाद लोकतान्त्रिक व्यवस्था के दौरान हमने जो प्रगति व विकास किया है।
जी-7 में भारत की भूमिका
विश्व के सात औद्योगीकृत व विकसित प्रजातान्त्रिक देशों के संगठन जी-7 में भारत को आमन्त्रित सदस्य के रूप में बुलाया जाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आजादी के बाद लोकतान्त्रिक व्यवस्था के दौरान हमने जो प्रगति व विकास किया है वह मानव सम्मान और उसकी आत्मप्रतिष्ठा व निजी स्वतन्त्रता को कायम रखते हुए किया है।
ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, कनाडा, फ्रांस, इटली व जर्मनी देशों के इस समूह का विश्व में विशिष्ट स्थान इसलिए भी है कि ये सभी खुले व उदार लोकतान्त्रिक देश हैं। भारत के साथ द. कोरिया व आस्ट्रेलिया भी विशेष आमन्त्रित देश हैं जिससे इस संगठन के आने वाले भविष्य में जी-10 होने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
भारत पहले से ही जी-20 देशों का सम्मानित सदस्य है मगर जी-7 में इसे बुलाये जाने का अर्थ इसकी बढ़ती आर्थिक व तकनीकी ताकत का प्रतीक भी माना जायेगा। यह सम्मेलन इस वर्ष जून महीने में ब्रिटेन में हो रहा और इस देश के प्रधानमन्त्री श्री बोरिस जानसन इस वर्ष 26 जनवरी के समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमन्त्रित थे मगर अपने देश में कोरोना संक्रमण के प्रकोप के चलते वह भारत यात्रा पर नहीं आ सकेंगे, फिर भी उन्होंने प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी को स्वयं फोन करके कहा है कि वह जी-7 सम्मेलन से पूर्व भारत की यात्रा अवश्य करेंगे।
इससे भी पता चलता है कि भारत की विश्व राजनीति में महत्ता कितनी बढ़ चुकी है परन्तु यह कोई ताजा या नई घटना नहीं है इससे पूर्व 2005 से 2009 तक भी तत्कालीन प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह जी-7 सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं। उस समय इसे जी-8 कहा जाता था मगर 2014 में रूस के इससे अलग हो जाने के बाद यह जी-7 कहलाने लगा।
विश्व में कोरोना संक्रमण के फैलने के बाद यह पहला जी-7 सम्मेलन होगा क्योंकि 2020 का अमेरिका में होने वाला सम्मेलन रद्द कर दिया गया था। इस सम्मेलन की विशेषता यह भी होगी कि इसमें सभी देशों के सत्ता प्रमुख व्यक्तिगत रूप से आमने-सामने होंगे।
लोकतान्त्रिक देशों का यह विशिष्ट संगठन पूरी दुनिया की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार समूची मानव जाति को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान व प्रौद्योगिकी के लाभों से लैस करने के उद्देश्य से काम करता है और इस क्रम में आदान-प्रदान की नीति के तहत अविकसित व विकासशील देशों को भी विकास की पटरी पर डालता है लेकिन अब इस सम्मेलन का लक्ष्य विश्व के आर्थिक स्रोतों का बंटवारा भी इसी फार्मूले के तहत करने का होना चाहिए।
इसके साथ ही पूरी दुनिया के सामने आतंकवाद का संकट भी अभी कम नहीं हुआ है जिसे समाप्त करने के लिए इसे आपसी सहयोग से ठोस नीति बनाने की भी जरूरत है। आगामी फरवरी महीने में ब्रिटेन राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष पद ग्रहण करेगा अतः भारत व ब्रिटेन के सम्बन्धों की गहनता को हमें एहतियात से संवारे रखना होगा।
प्रधानमन्त्री मोदी ने 2019 में भी फ्रांस के शहर बियारित्ज में जी-7 सम्मेलन में भाग लिया था जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसके मंच से अलग हट कर यह कह कर विवाद खड़ा कर दिया था कि वह पाकिस्तान व भारत के बीच में कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करने के लिए तैयार है।
खुदा के फजल से श्री ट्रम्प अब अमेरिका के राष्ट्रपति पद से विदा ले रहे हैं और उनके स्थान पर उदार समझे जाने वाले जो बाइडेन भाग लेंगे। अतः भारत को इन देशों के बीच खड़े होकर अपनी स्थिति कश्मीर के मुद्दे पर पूरी मजबूती के साथ बनाये रखनी होगी और विश्व के प्रजातांत्रिक देशों के बीच कश्मीर में किये गये लोकतान्त्रिक बदलाव को जन समर्थन से बांधे रखना होगा क्योंकि जी-7 में कुछ ऐसेे देश भी हैं जो इस मुद्दे पर भारत की आलोचना करते रहे हैं, विशेष रूप से ब्रिटेन व अमेरिका में वहां की संसदों के कुछ सदस्य तीखापन दिखाते रहे हैं परन्तु सबसे बड़ा मुद्दा इस सम्मेलन में कोरोना के बाद विश्व की अर्थव्यवस्था में सुधार का होगा।
कोरोना ने केवल भारत जैसे देशों की आर्थिक नींव को ही नहीं हिलाया है बल्कि अमेरिका व फ्रांस और जर्मनी जैसों देशों को भी झिंझोड़ कर रख दिया है। जाहिर है इससे पार पाने में किसी समन्वित नीति के तहत ही उपाय खोजा जा सकता है और आर्थिक भूमंडलीकरण के बावजूद बढ़ते संरक्षणवाद को थामा जा सकता है।
जहां तक भारत का सन्दर्भ है तो उसे एेसे सभी सम्मेलनों का लाभ अपनी आन्तरिक ताकत को मजबूत बनाने में करना चाहिए। अमेरिका से परमाणु करार हुए 13 वर्ष बीत जायेंगे मगर अभी तक हम न्यूक्लियर सप्लायर्स समूह (परमाणु ईंधन आपूर्ति समूह) देशों के सदस्य नहीं बन पाये हैं। इस बारे में चीन लगातार व्यवधान पैदा करता आ रहा है। अतः कूटनीतिक मोर्चे पर इस सम्मेलन में भारत के पक्ष में समर्थन जुटाना हमारा ध्येय होना चाहिए।
परमाणु करार में एक शर्त यह भी थी कि अमेरिका इस समूह का सदस्य बनने के लिए भारत की पूरी मदद करेगा और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करेगा। जी-7 समूह में चीन को छोड़ कर पी-5 (परमाणु शक्ति सम्पन्न) के शेष चार देश शामिल हैं। अतः लम्बे सब्र के बाद भारत को इस मोर्चे पर भी अब युद्ध स्तर पर कूटनीतिक प्रयास शुरू करने चाहिए।
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