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चीन को सबक सिखाना जरूरी

भारत-चीन के सैनिक कमांडरों के बीच लद्दाख में चीनी अतिक्रमण को समाप्त करने के बारे में हुई पांचवें दौर की वार्ता निष्फल साबित हुई है। इससे साबित होता है कि चीन की नीयत नियन्त्रण रेखा पर न तो फौजी जमावड़ा कम करने की है और न ही भारत की कब्जाई गई भूमि छोड़ने की है।
चीन को सबक सिखाना जरूरी
भारत-चीन के सैनिक कमांडरों के बीच लद्दाख में चीनी अतिक्रमण को समाप्त करने के बारे में हुई पांचवें दौर की वार्ता निष्फल साबित हुई है। इससे साबित होता है कि चीन की नीयत नियन्त्रण रेखा पर न तो फौजी जमावड़ा कम करने की है और न ही भारत की कब्जाई गई भूमि छोड़ने की है।

यह सच है कि चीन भारत भूमि के भीतर घुसे बैठा है और वार्ता के दौर चला कर भारत को उलझाये रखना चाहता है। इससे यह भी साबित हो रहा है कि चीन को भारत के विरोध की परवाह नहीं है और वह अपनी रणनीति ऐसी बना रहा है जिससे पूरी नियन्त्रण रेखा की स्थिति को बदल डाले। भारत के लोगों की विशेषता है कि जब राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई खतरा होता है तो ये अपने सभी आन्तरिक मतभेद भुला कर एक मजबूत ‘चट्टान’ की तरह खड़े हो जाते हैं।

अतः आज सवाल न कांग्रेस का है और न भाजपा या कम्युनिस्टों का बल्कि एकमेव रूप से भारत का है। चीन कम्युनिस्ट तानाशाही की व्यवस्था वाला देश है और हम दुनिया के सबसे बड़े ऐसे लोकतन्त्र हैं जिसमें सिर्फ संविधान का शासन चलता है। हमारी फौजें भी इंसानियत की रक्षा करती हुई अपने सैनिक धर्म का निर्वाह करती हैं जबकि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी और सरकार में कोई अन्तर नहीं है।

वहां की फौजें भी राष्ट्र के स्थान पर पार्टी के प्रति अपनी वफादारी से बन्धी होती हैं जिसकी वजह से 1959 में चीन ने इंसानियत का कत्ल करके तिब्बत पर अपना पूर्ण कब्जा किया था। इसी तिब्बत के हिस्से ‘अक्साई चिन’ क्षेत्र को 1962 के युद्ध में चीन ने हमसे छीना और आज तक उस पर कब्जा जमाये बेठा है, अक्साई चिन के लोग तिब्बती ही हैं जो चीन की गुलामी में रहने को मजबूर हैं। इसी से लगता चीन का शिक्यांग राज्य है जहां मुसलमान नागरिक सबसे ज्यादा हैं और चीनी सेना उन पर जुल्म ढहाने के नये-नये तरीके खोजती रहती है।

इसी शिक्यांग में ‘काशगर’ शहर है जहां से पाकिस्तान के इस्लामाबाद तक काराकोरम दर्रे से होते हुए सड़क जाती है। इसी काशगर के नागरिक हवाई अड्डे को चीन ने अब सैनिक अड्डे में बदल कर वहां बमबारी करने वाले विमान खड़े कर दिये हैं और वह लगातार लद्दाख के पूरे इलाके में अपनी फौज की संख्या बढ़ाता जा रहा है तथा आयुध सामग्री में भी इजाफा करता जा रहा है, यह इलाका भारत के दौलतबेग ओल्डी सैनिक हवाई अड्डे के निकट है और इसके समीप के ‘देपसंग’ पठारी क्षेत्र में चीनी सेना भारतीय इलाके के 18 कि.मी. अन्दर तक  घुस आयी है।

भारतीय सैनिकों को उस स्थान तक गश्त लगाने की इजाजत चीन नहीं दे रहा है जहां तक वे सामान्यतः गश्त लगाया करते थे। इसे ‘वाई प्वाइंट’ कहा जाता है। इस प्वाइंट से अक्साई चिन व काराकोरम और शिक्यांग राज्य के तीन रास्ते निकलते हैं, जाहिर है कि चीन भारत के दौलत बेग ओल्डी सैनिक वहाई अड्डे पर निगाहें गड़ाये हुए है। इसके समानान्तर चीन इससे पहले पेंगोंग झील की भारतीय सैनिक चौकियों को घेरे पड़ा है, पेगोंग झील 135 कि.मी. लम्बी दुनिया की सबसे ऊंची झीलों में से एक है जिसका आधा हिस्सा चीन में व आधा भारत में है।

इसके उत्तरी किनारों पर भारत की सैनिक चौकियां हैं। इन्हीं में से चौकी न. चार से आठ तक पर चीनी सेनाएं घेरा डाले पड़ी हैं। पिछली सैनिक कमांडरों की वार्ता के बाद चीन ने चौकी न. चार से अपनी फौजों की संख्या कम की मगर वे चौकी न. पांच की तरफ बढ़ गईं और वहां अपना अड्डा बनाये रखा। यह कुल आठ कि.मी. का इलाका है जहां भारतीय सैनिक 2 मई से पहले बेरोकटोक गश्त लगाया करते थे क्योंकि नियन्त्रण रेखा इसके दूसरी तरफ है, परन्तु चीन अब कह रहा है कि नियन्त्रण रेखा वही है जहां चौकियां बनी है। अतः भारतीय सेना को नियमानुसार पीछे हटना चाहिए।

चीन के इस पूरे नक्शे-कदम को देखते हुए कोई भी रक्षा विशेषज्ञ बता देगा कि उसने नियन्त्रण रेखा को बदलने की ठान ली है और अपनी इसी रणनीति पर लगातार वह आगे बढ़ना चाहता है, कोई भी देशभक्त भारतवासी इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर सकता कि चीन जबरन उसकी भूमि में पैठ बना कर नियन्त्रण रेखा को ही बदल डाले।

हर भारतीय की भुजाएं यह देख कर फड़कने लगती हैं कि चीन ने विगत 15 जून को लद्दाख की गलवान घाटी में उसके 20 सैनिकों को सिर्फ इसलिए शहीद कर डाला कि वे मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ रहे थे, चीन अपनी सैनिक ताकत के गरूर में भूल रहा है कि उसका पाला उस भारत से पड़ा है जिसके बच्चे- बच्चे को ‘मिडल’ स्तर पर ही यह पढ़ाया जाता है कि ‘जननी जन्म भूमि, च स्वर्गादपि गरियसी।’

अतः चीन की असली नीयत को समझ कर ही हमें अपनी कूटनीति व रणनीति दोनों का निर्धारण करना चाहिए। यह निर्धारण इस तरह हो कि विश्व जनमत हमारे साथ हो मगर अभी तक सिवाय अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के किसी अन्य देश के प्रधान ने चीनी हरकतों की खुल कर निन्दा नहीं की है।

ट्रम्प भी संभवतः इसलिए बोले हैं क्योंकि आगामी नवम्बर महीने में वह अपने देश में चुनाव चीन के मुद्दे पर ही लड़ना चाहते हैं। मगर चालाक चीन ने हमसे हमारे सहोदर जैसे देश नेपाल से ही मतभेद करा दिये हैं और जबकि श्रीलंका व बांग्लादेश सरीखे देशों में वह भारी पूंजी निवेश करके वहां की सरकारों को अपना कर्जदार बनाये बैठा है।

चीन की इन चालों को समझ कर ही हमें अपनी नियन्त्रण रेखा की सुरक्षा इस प्रकार करनी होगी कि हमारी एक इंच भूमि पर भी उसका और कब्जा न हो पाये। हैरत की बात यह भी है कि पाक अधिकृत कश्मीर की काराकोरम इलाके की जो 540 वर्ग किमी. भूमि पाकिस्तान ने उसे 1963 में खैरात में दी थी उसे लेकर भारत की तरफ से कोई तीखी हलचल क्यों नहीं होती है जबकि 2012 में पिछली मनमोहन सरकार ने इस बारे में कठोर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा था कि चीन किसी तीसरे देश की जमीन पर कोई विकास कार्य नहीं कर सकता।

पाक अधिकृत कश्मीर पर पाकिस्तान का कोई हक नहीं है क्योंकि यह पूरा इलाका भारतीय संघ का वैधानिक हिस्सा है। पाकिस्तान के साथ मिल कर चीन इसी इलाके से सी पैक परियोजना चालू किये हुए है। चीन पर हम भी तो कस कर दबाव बनायें।


-आदित्य नारायण चोपड़ा
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