It’s My Life (52)

9 सितम्बर, 1981 की शाम 6 बजे पूज्य दादा श्री लाला जगतनारायण जी की लुधियाना-जालंधर हाइवे पर मोटरसाइकिल सवार तीन आतंकवादियों ने कार में बैठे लाला जी की रिवाल्वरों की गोलियों से दर्जनों गोलियां बरसा कर हत्या कर दी गई। ठीक एक दिन पहले यानी 8 सितम्बर, 1981 के दिन सपरिवार एक फिल्म देखने गए थे। उस शाम दादा जी ने मुझे बताया था कि अगले दिन यानी 9 सितम्बर को वो पटियाला में एक हैल्थ कैम्प की शुरूआत करने जा रहे हैं। मैं उन दिनों क्रिकेट छोड़ चुका था। लेकिन पंजाब रणजी का कप्तान था और उसी दिन पटियाला में पंजाब रणजी ट्राफी की टीम की घोषणा होनी थी। बतौर कप्तान मेरी हाजरी जरूरी थी। 

मैंने दादा जी से कहा ठीक है मैं भी आप के साथ सुबह पटियाला चलूंगा और शाम को आपके साथ वापस भी आ जाऊंगा, लेकिन शाम को किरण ने मुझे बताया कि हम को तो 9 सितम्बर के दिन डाक्टर से चैकअप करवाना है। खुशी की बात थी कि डाक्टर ने हमें बताया था कि किरण गर्भवती है और चैकअप जरूरी था। मैं 9 सितम्बर की सुबह दादा जी के पास गया और उन्हें बताया कि आप पड़दादा बनने वाले हो और पिताजी साथ बैठे थे, उन्हें कहा कि आप दादा बनने वाले हो। दोनाें ही बहुत खुश हुए और किरण को बुला कर दोनों ने ढेरों आशीर्वाद दिए और लाला जी ने अपने पर्स से 100 रुपए का नोट निकाल कर शगुन के तौर पर ​किरण को ​दिया। 

शाम को जब हम फिल्म देखने गए थे तो लाला जी ने फिल्म के बीच ही कहा कि ‘‘किरण बेटा मुझे घर छोड़ दो।’’ किरण ने नई-नई ड्राइविंग सीखी थी और कार चला कर किरण उन्हें घर छोड़ कर आई। मैंने पूज्य दादा जी से कह दिया था ​कि मैं उनके साथ पटियाला नहीं बल्कि किरण को दिखाने डाक्टर के पास जा रहा हूं। इसी दौरान हमारे चाचा जी दो दिन पहले ही यह बता कर कि ​वो न्यूजप्रिंट के मामले में दिल्ली और मुम्बई जा रहे हैं।  9 सितम्बर की शाम दफ्तर में केवल पिताजी और मैं बैठे थे। अचानक पिताजी मेरे कैबिन में शाम 6 बजे आए और मुझे बताया कि लाला जी की हत्या लुधियाना के पास गोली मार कर हुई है। मैं अचानक सदमे में चला गया। मुझे पिताजी के शब्दों पर ​विश्वास नहीं हो रहा था। फिर ​बिना कुछ बोले हम दोनों बाप-बेटा प्रैस दफ्तर से निकले। 

मैंने कार का स्टेयरिंग सम्भाला और पिताजी मेरे साथ बैठ गए और हम जालंधर से लुधियाना की ओर चल पड़े। मेरी आंखों में बार-बार आंसू बह रहे थे और मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। पिताजी की आंखें नम थीं। आखिर हम लुधियाना से कोई 7 किलोमीटर पहले हाइवे पर बने एक शैलर के पास पहुंचे तो दूर से लाला जी की कार दिखी और पास पहुंचे तो हमने कार की पिछली सीट पर गिरे लालाजी के शरीर को देखा। खून से लथपथ लाला जी का शरीर गोलियों के निशानों से भरा पड़ा था। मैं तो रो ही रहा था कि अचानक पिता जी ने भी राेना शुरू कर ​दिया और बोलने लगे ‘‘लाला जी आप हमें अनाथ करके चले गए।’’ लाला जी की कार के आसपास एक गहरा सन्नाटा था। 

हाइवे पर कारें और ट्रक वैसे ही चल रहे थे जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। लाला जी के ड्राइवर सोमनाथ को भी आतंकवादियों ने गोलियों से भून दिया था, लेकिन लुधियाना जा रहा एक कार ड्राइवर सोमनाथ को वहां से ले गया था। लाला जी की जिन्दगी पर छाए खतरे को देखते हुए प्रदेश सरकार ने उन्हें अपने साथ एक गनमैन रखने को कहा था, लेकिन लाला जी ने सरकारी गनमैन रखने से इंकार कर दिया था। मैंने लाला जी की कार सम्भाली और पिता जी ने दूसरी और हम लुधियाना की ओर रवाना हो गए। रास्ते में हम उन दिनों लुधियाना के एस.एस.पी. श्री भट्टी जी मिले और उन्होंने हमारी कारें रोक कर हमें कहा कि हम सीधे लुधियाना के सिविल अस्पताल आए जहां लालाजी के पार्थिव शरीर का पोस्टमार्टम होना था। 

शाम के 8 बज रहे थे और हम दो पुलिस की गाड़ियों के साथ लुधियाना शहर में दाखिल हो चुके थे। शहर में हम धीरे-धीरे लुधियाना सिविल अस्पताल की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक मैंने सड़क के दोनों ओर नजर दौड़ाई तो हैरान रह गया। एक घर दीपमाला यानी लाइट (लड़ियों की रोशनी) से जगमगा रहा था और अगले घर में घुप्प अंधेरा था। ​फिर अगले घर में दीपमाला हो रखी थी और अगले दो घरों में अंधेरा था। मुझे समझ नहीं आई और मैंने अस्पताल पहुंचने पर भट्टी साहिब से पूछा यह शहर में क्या हो रहा है? उन्होंने मुझे बताया कि जिन घरों में दीपमाला हो रही है वे घर सिखों के हैं, जहां आतंकवादियों के समर्थकों ने जबर्दस्ती सिख परिवारों को दीपमाला करने पर मजबूर किया है और जिन घरों में अंधेरा है, उन घरों में हिन्दू परिवार रहते हैं, जो कि इस दीपमाला का विरोध दिखाने के लिए अपने घरों में रोशनी तक नहीं कर रहे। मैंने कहा भट्टी साहिब तो आतंकवादी अपने मनसूबों में कामयाब हो गए। 

यही तो चाहते थे कि पंजाब में हिन्दू और सिख आपस में लड़ें। क्या लाला जी की हत्या के उपरांत पंजाब में अब हिन्दू और सिख अलग हो जाएंगे? भट्टी साहिब ने बताया कि लाला जी के तीन हत्यारे लुधियाना से ही उनकी कार के पीछे थे और उन्होंने ठीक लाला जी की कार के पास आकर उन पर गोलियां चलाईं और लाला जी की हत्या कर दी। मैंने पूछा कौन थे यह लोग? भट्टी साहिब ने बस इतना ही बताया कि दो आतंकवादियों की पहचान हुई है। मोटर साइकिल चलाने वाला एक मशहूर आतंकवादी नश्चछतर सिंह है और लाला जी पर गोलियां चलाने वाला भिंडरावाला का भतीजा है। मेरे को बात समझ आ गई कि भिंडरावाला ने ही लाला जी की हत्या करवाई है। 

इस दौरान अस्पताल में भारी भीड़ इकट्ठी होने लगी। सारे लुधियाना शहर और पूरे पंजाब में यह बात फैल गई कि लालाजी की हत्या कर दी गई। पोस्टमार्टम के उपरांत हम रात 12 बजे लालाजी के पार्थिव शरीर को जब जालंधर लाए तो मानो पूरा शहर ही उमड़ पड़ा। खैर लाला जी के पार्थिव शरीर को हमने दो ​दिन घर के बाहर रखा और पूरे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हिमाचल से लोग लाला जी के अंतिम दर्शन के लिए जालंधर आए। जब हम लाला जी के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए उनके पार्थिव शरीर को एक ट्रक में ले जा रहे थे और पूरे उत्तर भारत से हजारों लोग लालाजी की इस अंतिम यात्रा में हमारे साथ थे। इस बीच राजधानी से पंजाब में उस समय के डरपोक मुख्यमंत्री की इंदिरा जी ने खतरे की घंटियां बजा दीं और प्रदेश पुलिस ने भिंडरावाला को गिरफ्तार करके लाला जी की हत्या के संदर्भ में उसे लुधियाना के गैस्ट हाऊस में हिरासत में डाल दिया। 

इस बीच मोटरसाइकिल चलाने वाला नश्चछतर सिंह भी ​गिरफ्तार कर लिया गया। ​भिंडरावाला का भतीजा और तीसरा हत्यारा गायब थे। मैं सोच रहा था कि अंग्रेजों के विरुद्ध गांधी, नेहरू और सुभाष के स्वतंत्रता संग्राम के एक सिपाही, एक पंजाब के भूतपूर्व मंत्री, एक पत्रकार तथा पंजाब में हिन्दू-सिख एकता के संदेश वाहक और एक धारदार लेखनी के धनी, प्रैस की स्वतंत्रता के पहरेदार को आखिर देश की एकता और अखंडता के लिए शहीद होना पड़ा। 
हजारों साल नरगिस अपनी बे-रुनी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदावर पैदा।
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