'घर में घुसना और कपड़े उठाना दुष्कर्म का प्रयास नहीं...', 26 साल पूराने केस में झारखंड HC ने सुनाया फैसला
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट दुष्कर्म के एक 26 साल पुराने केस में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी महिला के घर में रात के समय घुसना और उसके कपड़े उठाना अपने आप में दुष्कर्म या दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए लोअर कोर्ट के फैसले में बदलाव किया।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म की कोशिश की बजाय महिला की गरिमा भंग करने और आपराधिक बल के इस्तेमाल से जुड़े अपराध में दोषी माना। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दुष्कर्म की कोशिश का अपराध तभी माना जा सकता है, जब आरोपी की ओर से अपराध को पूरा करने की दिशा में कोई ठोस और सीधा कदम उठाया गया हो।
26 साल पुराने मामले में बदला फैसला
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी घटना का दुष्कर्म के बेहद करीब होना ही उसे दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं बना देता। इसके लिए आरोपी की तरफ से ऐसा प्रत्यक्ष और ठोस कदम उठाया जाना जरूरी है, जिससे यह साफ हो कि वह अपराध को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ चुका था। सरल शब्दों में कहें तो केवल इरादा या ऐसी हरकत, जो दुष्कर्म की तैयारी के तौर पर देखी जा सकती है, हर हालत में दुष्कर्म के प्रयास के बराबर नहीं मानी जा सकती।
यह मामला करीब 26 साल पुराना है। हाईकोर्ट ने 31 अगस्त को इस मामले में फैसला सुनाया था, जिसे सोमवार को सार्वजनिक किया गया। आरोपी ने घाटशिला सेशन कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे चार साल के सश्रम कारावास की सजा दी गई थी। घाटशिला की कोर्ट ने 25 जुलाई 2006 को आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास का दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।
क्या है पूरा मामला?
ये पूरा मामला चाकुलिया थाना क्षेत्र का है। पुलिस के अनुसार, 27 दिसंबर 1999 को इस घटना को लेकर FIR दर्ज की गई थी। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी रात में उसके घर में दाखिल हुआ था। महिला का कहना था कि आरोपी ने उसके कपड़े उठाने की कोशिश की। आरोप था कि वह दुष्कर्म करने के इरादे से घर में घुसा था। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म के प्रयास का आरोप लगाते हुए चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद मामले की सुनवाई लोअर कोर्ट में हुई। कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान झारखंड हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध सबूतों के आधार पर आरोपी की हरकत को दुष्कर्म के प्रयास के रूप में नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने लेकिन उसकी हरकत को महिला की गरिमा भंग करने और आपराधिक बल के इस्तेमाल से जुड़ा अपराध माना। हाईकोर्ट ने आरोपी की हिरासत में बिताई गई अवधि को भी ध्यान में रखा। कोर्ट ने कहा कि आरोपी मुकदमे के दौरान करीब आठ महीने जेल में रह चुका है। ऐसे में न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए उसके द्वारा बिताई गई हिरासत की अवधि को पर्याप्त माना गया।
अदालत के फैसले का क्या मतलब है?
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से यह साफ होता है कि दुष्कर्म के प्रयास का आरोप तय करने के लिए केवल आरोपी की मंशा या शुरुआती हरकत देखना पर्याप्त नहीं है। कोर्ट यह भी देखेगी कि आरोपी ने अपराध को अंजाम देने के लिए वास्तव में कितना आगे कदम बढ़ाया था। इस मामले में हाईकोर्ट ने इसी आधार पर सेशन कोर्ट के फैसले में बदलाव किया और दुष्कर्म के प्रयास की सजा को संशोधित कर दिया।
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