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JPSC-JSSC विवाद: बाबूलाल मरांडी ने CM सोरेन से मांगी CBI जांच, CID जांच पर उठाए सवाल

झारखंड में JPSC-JSSC परीक्षाओं को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर JPSC, JSSC-CGL और रद्द परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष CBI जांच की मांग की है। उन्होंने CID जांच की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
11:47 AM Aug 20, 2026 IST | Shivangi Shandilya
झारखंड में JPSC-JSSC परीक्षाओं को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर JPSC, JSSC-CGL और रद्द परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष CBI जांच की मांग की है। उन्होंने CID जांच की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
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Babulal Marandi letter to Hemant Soren

झारखंड में, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दो दिन पहले JPSC और JSSC-CGL परीक्षाएं रद्द करने का आदेश दिया। इसके बाद प्रदर्शन कर रहे छात्र विरोध-स्थल से हटकर अपने घर लौट गए हैं; उन्होंने सरकार को दो महीने की मोहलत दी है और कहा है कि अगर उनकी शिकायतों का समाधान नहीं हुआ, तो वे फिर से विरोध-प्रदर्शन शुरू करेंगे। इसी बीच नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को एक पत्र लिखा है। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आई कथित गड़बड़ियां की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।

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बाबू राव ने पत्र में क्या लिखा?

बता दें कि झारखंड नेता विपक्ष मरांडी ने JPSC, JSSC-CGL और रद्द की गई अन्य परीक्षाओं को लेकर CBI जांच की मांग उठाई है। उन्होंने अपनी बातों को एक पत्र लिखकर सीएम सोरेन से अपील की है। उनका कहना है कि परीक्षा प्रक्रिया पर उठाए गए सवालों से हजारों उम्मीदवारों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। ऐसे हालात में, जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और छात्रों का भरोसा जितने के लिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। इस बीच, इस मांग ने झारखंड में सियासी माहौल को भी गरमा दिया है। इतना ही नहीं, बाबूलाल मरांडी ने आगे कहा, ''"सीजीएल परीक्षा में हुई गड़बड़ियों को लेकर छात्र लंबे समय से शिकायत करते रहे, प्रमाण प्रस्तुत करते रहे और निष्पक्ष जांच की मांग उठाते रहे. इसके बावजूद आपकी सरकार ने समय रहते कोई ठोस निर्णय नहीं लिया."

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बाबूलाल मरांडी का मुख्यमंत्री को पत्र

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उपर्युक्त विषयक संदर्भ में मेरा स्पष्ट मानना है कि झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर आज जो अविश्वास, आक्रोश और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हुई है, उसके लिए काफी हद तक जेएसएससी-सीजीएल प्रकरण में सीआईडी द्वारा की गई दोषपूर्ण एवं संदिग्ध जांच जिम्मेदार है।

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सीजीएल परीक्षा में हुई गड़बड़ियों को लेकर छात्र लंबे समय से शिकायत करते रहे, प्रमाण प्रस्तुत करते रहे और निष्पक्ष जांच की मांग उठाते रहे। इसके बावजूद आपकी सरकार ने समय रहते कोई ठोस निर्णय नहीं लिया। आखिर सरकार ने छात्रों के व्यापक आंदोलन और बढ़ते जनाक्रोश की प्रतीक्षा क्यों की? यदि सरकार को अंततः परीक्षाएं रद्द करनी ही थीं, तो छात्रों की शिकायतों पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई? मेरा सीधा प्रश्न है—आपकी सरकार आखिर किसे बचाने का प्रयास कर रही है?

यदि सीआईडी ने सीजीएल परीक्षा की गंभीरता और निष्पक्षता से जांच की होती, फर्जी एवं वास्तविक अभ्यर्थियों के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए दोषियों को चिह्नित किया होता तथा पूरे षड्यंत्र की तह तक पहुंचने का प्रयास किया होता, तो आज राज्य के लाखों अभ्यर्थियों का परीक्षा प्रणाली और जांच एजेंसियों से विश्वास समाप्त नहीं होता।

विडंबना यह है कि सीआईडी का ध्यान सीजीएल घोटाले का पर्दाफाश करने के स्थान पर उसमें हुई गड़बड़ियों को दबाने और मामले की लीपापोती करने पर अधिक केंद्रित दिखाई दिया। जांच को सीमित दायरे में रखकर घोटाले के वास्तविक सूत्रधारों, लाभार्थियों और उन्हें संरक्षण देने वाले लोगों को बचाने की कोशिश की गई।

सीजीएल प्रकरण की जांच के दौरान सीआईडी के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों, विशेषकर श्री अनुराग गुप्ता की भूमिका को लेकर अत्यंत गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि अभ्यर्थियों को जांच से बचाने के नाम पर उनसे भारी धनराशि की वसूली की गई। इसका अर्थ यह है कि सीजीएल के अभ्यर्थियों को दो बार उगाही का शिकार बनाया गया—पहली बार बहाली के समय और दूसरी बार सीआईडी जांच के दौरान। ऐसे गंभीर आरोपों के बावजूद श्री अनुराग गुप्ता के विरुद्ध निष्पक्ष जांच अथवा कठोर कार्रवाई नहीं होना आपकी सरकार की मंशा पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़ा करता है।

मुख्यमंत्री जी, मैंने श्री अनुराग गुप्ता और आपकी सरकार के बीच कथित सांठगांठ तथा परस्पर संरक्षण को लेकर पहले भी गंभीर सवाल उठाए हैं। आपके कार्यकाल में हुए कथित शराब घोटाले और उससे संबंधित अनियमितताओं के दस्तावेजों को लेकर भी अनेक गंभीर आरोप एवं आशंकाएं सामने आई हैं। इसके बावजूद उनके विरुद्ध कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इन आरोपों की सच्चाई जनता के सामने लाने के लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है।

बाद में श्री मनोज कौशिक के नेतृत्व में की गई जांच भी अभ्यर्थियों और आम जनता का विश्वास अर्जित नहीं कर सकी। श्री कौशिक के विरुद्ध पूर्व में कोयला तस्करी और कथित अवैध उगाही से संबंधित आरोप सामने आते रहे हैं। ऐसी स्थिति में उनके नेतृत्व में हुई जांच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

यदि सीआईडी ने अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन किया होता तथा जेएसएससी के तत्कालीन अध्यक्ष श्री नीरज सिन्हा और जेएसएससी के प्रभारी अध्यक्ष श्री प्रशांत कुमार सहित इस प्रकरण में संलिप्त सभी लोगों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर कठोर कार्रवाई की होती, तो आज सरकार को यह दिन नहीं देखना पड़ता। सीआईडी की इसी अकर्मण्यता और संदिग्ध कार्यशैली के कारण राज्य में राजपत्रित एवं अराजपत्रित कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु प्रतियोगी परीक्षा संचालन से जुड़ी वैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लगभग समाप्त हो चुकी है।

अब झारखंड लोक सेवा आयोग की 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा भी रद्द कर दी गई है। इस परीक्षा के संबंध में सामने आए तथ्य एवं दावे अत्यंत गंभीर हैं। कहा गया है कि टीडीपीएल के कर्ताधर्ता रामवीर सिंह और इनसे जुड़े अभय तिवारी द्वारा इंटरव्यू बोर्ड को प्रभावित अथवा 'सेट' करने की बात कही गई थी। इंटरव्यू में अभ्यर्थियों से कथित वसूली के मामले में तत्कालीन जेपीएससी सदस्य डॉ. अजीता भट्टाचार्य के निजी सहायक ब्रजराम की गिरफ्तारी भी हो चुकी है।

यह दावा भी सामने आया है कि कोड को डिकोड करके विशेष अभ्यर्थियों को तत्कालीन जेपीएससी अध्यक्ष एवं सदस्यों द्वारा अपने-अपने बोर्ड में साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता था। यदि यह दावा सही है, तो यह केवल परीक्षा प्रक्रिया में सामान्य अनियमितता नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से साक्षात्कार को प्रभावित कर योग्य अभ्यर्थियों का अधिकार छीनने का अत्यंत गंभीर मामला है।

विशेष रूप से चिंताजनक तथ्य यह है कि संबंधित इंटरव्यू बोर्ड में सीआईडी के एडीजी श्री मनोज कौशिक सहित कई आईपीएस अधिकारी भी शामिल रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब सीआईडी के वरिष्ठ अधिकारियों की अपनी भूमिका भी जांच के दायरे में आती हो, तब उसी सीआईडी से इस मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? यह स्पष्ट रूप से हितों के टकराव का मामला है कि जिन लोगों की भूमिका की जांच होनी चाहिए, उन्हीं से संबंधित संस्था को जांच की जिम्मेदारी सौंप दी गई है।

यदि साक्षात्कार को वास्तव में प्रभावित या प्रबंधित किया गया था, तो इंटरव्यू बोर्ड में शामिल प्रत्येक अधिकारी और सदस्य का बयान दर्ज होना चाहिए। इंटरव्यू बोर्डों के गठन, अभ्यर्थियों के आवंटन, कोडिंग-डिकोडिंग की प्रक्रिया, प्राप्त अंकों, डिजिटल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल, वित्तीय लेन-देन और संबंधित अधिकारियों एवं बिचौलियों की भूमिका की वैज्ञानिक एवं स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।

सीजीएल जांच के अनुभव के कारण ही जेपीएससी के वर्तमान मामले में भी सीआईडी पर भरोसा नहीं है। छात्र किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपने कटु अनुभवों एवं गंभीर तथ्यों के आधार पर सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं।

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Shivangi Shandilya

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शिवांगी शांडिल्य पत्रकारिता में पिछले 2 वर्षों से सक्रिय हैं। राजनीति, विदेश, क्राइम के अलावा आद्यात्मिक खबरें लिखना पसंद हैं। गलगोटिया विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई पूरी की है। IGNOU से मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई जारी है। इस दौर में वेबसाइट पर लिखने का कार्य जारी है। पत्रकारिता की शुरुआत इंडिया न्यूज़ (इनखबर) से हुई, जहां बत्तौर हिन्दी सब-एडिटर के रूप में वेबसाइट पर काम किया। वर्तमान में पंजाब केसरी दिल्ली में हिन्दी सब-एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में जन्म लेने वाली शिवांगी की शिक्षा उनके गृह जिले में ही हुई है। शिवांगी को राजनीतिक घटनाक्रम पर आलेख लिखना बेहद पसंद है।

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