कर्नाटक : तू चल मैं आया!

कर्नाटक के राजनैतिक हालात जिस तरफ इशारा कर रहे हैं उसके तहत माननीय एच.डी. कुमारस्वामी की ‘आंसू’ बहाने वाली सरकार कभी भी खुलकर रोते हुए अपना ‘दिल’ हल्का कर सकती है। राज्य में पिछले साल के शुरू में हुए विधानसभा चुनावों के बाद जो परिणाम आये थे उससे पांच साल तक चली श्री सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार का पतन हो गया था और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी परन्तु कर्नाटक की क्षेत्रीय पार्टी जनता दल (सै.) के साथ मिलकर कांग्रेस ने जिन परिस्थितियों में श्री एच.डी. कुमारस्वामी के नेतृत्व मे मिली-जुली सरकार बनाई थी उसका श्रेय केवल राजनीति के चतुर खिलाड़ी श्री सिद्धारमैया को ही दिया जा सकता था जिन्होंने चुनाव परिणाम वाले दिन ही राज्यपाल श्री वजूभाई वाला को जद (सै.) पार्टी के साथ गठबन्धन में श्री कुमारस्वामी के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा पेश करके भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी होने के परिप्रेक्ष्य में बहुमत का दावा कर दिया था।

परन्तु राज्यपाल ने भाजपा नेता श्री येदियुरप्पा को मुख्यमन्त्री की शपथ दिला थी और श्री येदियुरप्पा को विधानसभा के भीतर अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए कई हफ्ते का समय दे दिया था जिसे  लेकर तब सर्वोच्च न्यायालय में जबर्दस्त संवैधानिक लड़ाई चली थी और उसने श्री येदियुरप्पा को 48 घंटे के भीतर सदन के अंदर अपना बहुमत सिद्ध करने का आदेश दिया था जिसमें श्री येदियुरप्पा असफल रहे थे और केवल छह दिन तक ही मुख्यमन्त्री पद की शोभा बढ़ा पाये थे। इसके बाद एच.डी. कुमारस्वामी की सरकार सत्ता में आयी थी जिसे अब पद पर रहते हुए एक वर्ष 39 दिन हो गये हैं परन्तु इस बीच इस गठबन्धन सरकार की फजीहत होने के कई मौके आये और श्री एच.डी. कुमारस्वामी ने जनता दल (सै.) के कार्यकर्ताओं से यहां तक कहा कि वह किसी तरह जहर का प्याला पी रहे हैं और आंसू बहा रहे हैं। 

उनकी जिम्मेदारी कांग्रेस के प्रति है जिसने उन्हें मुख्यमन्त्री बनाया है। उनकी बात एक मायने में जायज भी थी क्योंकि 224 सदस्यीय विधानसभा में जद (सै.) के मात्र 37 विधायक जीते थे जबकि कांग्रेस के 80 और भाजपा के 104, इसके साथ ही तीनों ही दल चुनाव एक-दूसरे के खिलाफ लड़े थे। फिर भी कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने अपने हाथ से बाजी जाती देखते हुए कुमारस्वामी को मुख्यमन्त्री बना दिया था मगर येदियुरप्पा भी राज्य में भाजपा की जड़ें जमाने वाले नेता रहे हैं जिनके नेतृत्व में यह पार्टी 2008 के चुनावों में जुगाड़ू बहुमत के करीब पहुंच गई थी और वह तीन साल से ज्यादा समय तक मुख्यमन्त्री रहे थे मगर उन पर सत्ता में पहुंचते ही भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी लग गई थी और कुछ समर्थक विधायक उनका साथ छोड़ने लगे थे, इसके बावजूद उन्होंने अपनी पार्टी के विधानसभा अध्यक्ष की मदद से विद्रोही विधायकों की सदस्यता को संदिग्ध बनवा कर सदन में पहले ध्वनिमत से और बाद में विधिवत तरीके से बहुमत सिद्ध करने में सफलता प्राप्त कर ली थी लेकिन न्यायालय की उसके सिर पर तलवार लटक गई और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा जिससे भाजपा को उनके बाद दो मुख्यमन्त्री डी.वी. सदानंद गौड़ा और जगदीश शेट्टियार को एक-एक साल के लिए मुख्यमन्त्री बनाना पड़ा था मगर आज कांग्रेस के सामने ठीक 2011 की स्थिति ही आ गई है। 

वह भी अपनी पार्टी के विधानसभा अध्यक्ष का उपयोग अपनी मिलीजुली सरकार बचाने के लिए करना चाहती है और विधायक पद से इस्तीफा देने वाले सदस्यों के इस्तीफों की स्वीकृति में तकनीकी पेंच निकालने की मुहिम पर है किन्तु इससे सरकार को वह कितने दिन तक बचा पायेगी, यह कहना मुश्किल है। जनता दल (सै.) और कांग्रेस के 14 विधायक इस्तीफा देने का फैसला कर चुके हैं। इनमें से कांग्रेस के एक विधायक आनंद सिंह पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं मगर उनका इस्तीफा अध्यक्ष ने अभी तक स्वीकार ही नहीं किया है। इसी प्रकार शेष 13 विधायक आज जब उसके कार्यालय में इस्तीफा देने गये तो वह अपने दफ्तर से नदारद हो गये और एक अस्पताल में भर्ती होकर दिल का इलाज कराने लगे। विधायिका में नाटक का यह पहला दृश्य नहीं है, इससे पहले भी विभिन्न राज्यों में अजब-गजब नौटंकियां होती रही हैं। 

अरुणाचल प्रदेश में तो एक होटल की बार में ही विद्रोही विधायकों ने अपनी बैठक करके उसे विधानसभा में तब्दील कर डाला था और लोकतन्त्र का ‘कैबरे नृत्य’ पेश कर डाला था परन्तु उस मामले में भी विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल सूत्रधार की भूमिका में थे। कर्नाटक में राज्यपाल की फनकारी तो 2018 में ही लोगों ने जमकर देखी थी। अब माननीय अध्यक्ष की बारी है परन्तु असली सवाल यह है कि सत्ता के नाटक में  लोकतन्त्र को ‘जोकर’ की भूमिका में क्यों पेश किया जाये। यदि कुमारस्वामी की सरकार डूबना चाहती है तो उसे क्यों बचाया जाये? जाहिर है यदि सत्ता पक्ष से जुड़े सदस्य इस्तीफा दे देते हैं तो विधानसभा में कुमारस्वामी सरकार का बहुमत खत्म हो जायेगा क्योंकि सदन की सदस्य शक्ति कम होते ही भाजपा का पूर्ण बहुमत हो जायेगा। कुमारस्वामी कौन से दूध के धुले हैं। 

उन्होंने ही 2006 में कांग्रेस की गठबन्धन वाली स्व. धर्म सिंह की सरकार को बीच मंझधार में ठीक उसी दिन डुबोया था जिस दिन विशाखापत्तनम में कांग्रेस पार्टी का अधिवेशन हो रहा था। इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें पुनः अपनी मदद से गद्दी पर बैठा दिया। इसके बावजूद दोनों पार्टियां इसी वर्ष हुए लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ीं और बुरी तरह पिटीं मगर हकीकत यह भी थी कि विधानसभा में इन दोनों पार्टियों का मिलकर ही बहुमत बनता था परन्तु जिस तरह इस बहुमत की सरकार के खिलाफ दोनों पार्टियों के विधायकों में ही भीतर-भीतर असन्तोष पनपा उससे सरकार का ‘इकबाल’ ही खत्म होने के कगार पर पहुंचता रहा और राज्य में न कांग्रेस की नीतियां लागू हुईं और न जनता दल (सै.) की। दोनों एक ही कमरे में अलग-अलग कोने ढूंढ कर आंसू बहाते रहे। ऐसे माहौल को भाजपा के घुटे हुए विधायक तोड़ कला के ‘महरम’ महामहोपाध्याय श्रीमान येदियुरप्पा कमल के इत्र की खुशबू से न महकाते तो उनके ‘फन’ का सदका कौन उतारता ? इसलिए सदके में अभी सिर्फ 14 विधायक आये हैं। इन्तजार कीजिये और देखिये।
        सितारों से आगे जहां और भी हैं। 
        अभी इश्क के इम्तेहां और भी हैं। 
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