+

जिये जब तक लिखे खबरनामे

आज मेरे पिता अश्विनी कुमार की पहली पुण्यतिथि है। कल शाम जब मैं लिखने बैठा तो मां किरण चोपड़ा की अश्रुपूरित आंखें देखकर लिखते-लिखते हाथ थम गए। मैं कभी अनुज आकाश और अर्जुन को देखता, कभी अपनी मां को।
जिये जब तक लिखे खबरनामे
आज मेरे पिता अश्विनी कुमार की पहली पुण्यतिथि है। कल शाम जब मैं लिखने बैठा तो मां किरण चोपड़ा की अश्रुपूरित आंखें देखकर लिखते-लिखते हाथ थम गए। मैं कभी अनुज आकाश और अर्जुन को देखता, कभी अपनी मां को। 18 जनवरी का दिन कभी भुलाया नहीं जा सकता। एक बेटे द्वारा अपने पिता के बारे में लिखना बहुत कठिन होता है। अपने​ पिता के संबंध में आंकलन करना कोई सहज नहीं होता। मेरे पिता घर का ऐसा वटवृक्ष थे जिसकी घनी और ठंडी छांव तले हमने धूप की तल्खी कभी महसूस नहीं की थी। बचपन में मैं कभी उनकी गोद में बैठा रहता, ठंड से कांपते हुए उनकी रजाई में घुस जाता, शैतानियां करता, कभी स्कूल न जाने की जिद्द करता। फिर जब कालेज का जीवन शुरू हुआ तो पिताश्री मुझे बेहतरीन पत्रकार और सम्पादक बनने का ज्ञान देते। जीवन में सच्चाई के धरातल पर जब बच्चा चलना शुरू करता है तो उसके कदम कहां पड़े और कहां नहीं यह समझाने का काम पिता ही करते हैं, इसके साथ ही समाज में बच्चों को कैसे रहना है और कैसे व्यवहार करना है यह काम भी पिता ही करते हैं। पिताश्री के अवसान के बाद हमें महसूस हुआ कि उन्होंने हमें तराशने का काम एक कुम्हार की तरह किया। इस​िलए तो कहा जाता है कि पिता हमेशा कुम्हार की तरह होता है, जो ऊपर से अपने बच्चों को आकार देता है आैर पीछे से हाथ लगाकर सुरक्षात्मक सहयोग। मेरे पिता कभी-कभी बहुत सख्त तेवर अपनाते थे। उनके गुस्से को देखकर तो मैं उनके सामने ही नहीं जाता था लेकिन कुछ क्षण बाद ही वे  करुणामयी हो जाते थे और मुझे हर बात समझाते थे। सच तो यह है कि एक मां बच्चे को जितना प्रेम करती है, उससे कहीं ज्यादा चिंता पिता को होती है। अन्तर सिर्फ इतना है कि पिता का प्यार दिखाई नहीं देता लेकिन वह पिता ही थे जिन्होंने हमें समाज की हर मुश्किल का डटकर सामना करना सिखाया। उन्होंेने मेरे व्यक्तित्व को संवारा आैर साथ ही यह अहसास भी कराया कि वो हमेशा हमारे साथ हैं। पिताश्री चाहते थे मेरे बच्चे उनसे भी ज्यादा कामयाब हों। जब तक थे तब तक मुझे और मेरे भाइयों को एहसास ही नहीं था लेकिन उनके न होने का अहसास बहुत हो रहा है। पिता के बिना एक वर्ष में हमने बहुत ही संकटपूर्ण चुनौतियों को झेला। एक तरफ लेखनी की जिम्मेदारी, दूसरी तरफ कोरोना काल के चलते पंजाब केसरी के प्रकाशन का दायित्व। इसके अलावा भी उन मुसीबतों का सामना करना जो सुनियोजित साजिशों के चलते हमारे सामने आ खड़ी हुई थीं। मेरे पिता बहुआयामी व्यक्तित्व रहे। उन्होंने जो भी भूमिका निभाई, उन्होंने उत्कर्ष को छुआ। क्रिकेट खेली तो उसमें भी लोकप्रियता के शिखर को छुआ, कलम सम्भाली तो लाखों पाठक उनकी लेखनी के दीवाने हो गए। राजनीति में पदार्पण किया तो पहलेे ही चुनाव में जबर्दस्त जीत हासिल की। सबसे बड़ी बात तो यह है कि पूजनीय पड़दादा लाला जगत नारायण जी, पूजनीय दादा रमेश चन्द्र जी की शहादत के बाद जब परिवार जालंधर छोड़ कर पलायन को तैयार था तो मेरे पिता का साहस था कि उन्होंने न केवल परिवार के पलायन को रोका बल्कि आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए अपनी लेखनी से जनमत तैयार कर दिया। उन्होंने पत्रकारिता को उसी प्रखता के साथ जारी रखा, जिसकी नींव पूजनीय दादा जी ने रखी थी। जालंधर से दिल्ली तक का सफर उनके लिए बदलाव का सूत्र था। चारों तरफ सुरक्षा कर्मियों का संरक्षण एवं किसी भी क्षण प्राणों से हाथ धो बैठने की दहशत के बीच भी उनकी कलम बेखौफ चलती रही। इतनी भयावह परिस्थितियों में भी वे बिखराव और टूटन का शिकार नहीं हुए। उनकी जीवनता को देखकर हैरानी होती थी। कोई और होता तो कब का टूट गया होता। कैंसर से जूझते हुए भी वे रात-रात भर जाग कर अपनी आत्मकथा को पन्नों पर उतारते रहे। जिस जद्दोजहद को उन्होंने अपना सम्पादकीय धर्म बनाया था, उतनी ही जद्दोेजहद उन्होंने आत्मकथा लिखने में की। अस्वस्थ होने के बावजूद घंटों बैठकर 20-20 पृष्ठ लिख देते थे। आज उनकी आत्मकथा ईट्स माई लाईफ का लोकार्पण किया जा रहा है। उनका जीवन तो बस ऐसा था-
‘‘जिये जब तक लिखे खबरनामे
चल दिये हाथ में कलम थामे।’’
उन्होंने जो कुछ भी समझाया उसका भाव यही था- 
लेखनी सत्य के मार्ग पर चले, लेखनी कभी रुके नहीं,
लेखन कभी झुके नहीं, और यह अनैतिक समझौता भी न करे,
यह राष्ट्र की अस्मिता की संवाहक है और राष्ट्र को समर्पित हो।
आज उनकी पुण्यतिथि पर मैं अपने कर्त्तव्य का कितना निर्वाह कर पाया, इसका फैसला मैं पंजाब केसरी के पाठकों पर छोड़ता हूं। मुझे इस बात का स्वाभिमान है कि मेरे पिता ने असत्य का दामन क्षण मात्र को भो नहीं थामा। नमः आंखों से मैं पिताश्री को नमन करता हूं। मां किरण अब हमारा मार्गदर्शन कर रही हैं। कभी आकाश के तारों में सबसे चमकते तारों में पिता को तलाशता हूं और उठकर छू लेना चाहता हूं, परन्तु-
‘‘दुख की नगरी कौन सी
आंसू की क्या जात।
सारे तारे दूर के
सबके छोटे हाथ।’’ 
facebook twitter instagram