पति से तलाक के बिना दूसरी शादी का वादा मान्य नहीं, MP हाईकोर्ट ने रद्द की दुष्कर्म की FIR
MP High Court Consent Relationship Verdict : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महिला सहकर्मी से रेप के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्ति आपस में सहमति से लंबे समय तक संबंध में रहते हैं, तो बाद में लगाए गए आरोपों के आधार पर इसे अपने आप दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि अगर महिला पहले से विवाहित है, तो शादी का झूठा वादा देकर संबंध बनाने का तर्क भी सही नहीं ठहरता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने भोपाल निवासी एक केंद्रीय कर्मचारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और निचली अदालत की पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामला भोपाल के छोला मंदिर थाना क्षेत्र का है। पीड़ित महिला ने अपने ही सहकर्मी पर आरोप लगाया था कि अक्टूबर 2020 में उसे घर बुलाकर नशीला जूस पिलाया गया और दुष्कर्म किया गया। महिला का यह भी कहना था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर 4 साल तक उसका शारीरिक शोषण किया। इसके बाद आरोपी कर्मचारी ने राहत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और एफआईआर रद्द करने की याचिका लगाई।
हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों के बयानों और दस्तावेजों की गहराई से जांच की। जांच में सामने आया कि जब यह संबंध शुरू हुआ, तब महिला पहले से शादीशुदा थी और उसका एक बच्चा भी था।
महिला को अच्छी तरह पता था कि पति से कानूनी तलाक लिए बिना वह दूसरी शादी नहीं कर सकती। ऐसे में शादी के वादे पर संबंध बनाने का सवाल ही नहीं उठता। इसके अलावा, रिकॉर्ड से साफ है कि महिला ने अपनी मर्जी से लंबे समय तक संबंध बनाए रखे। सुनवाई के दौरान ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे साबित हो कि आरोपी ने कोई धमकी दी, ब्लैकमेल किया या तस्वीरों व वीडियो का गलत इस्तेमाल किया।
अदालत ने माना कि पहली नजर में दुष्कर्म का मामला नहीं बनता, जिसके बाद आरोपी को बड़ी राहत देते हुए केस खत्म कर दिया गया।
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