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माराडोना : फुटबाल का भगवान

इसमें कोई दो राय नहीं कि क्रिकेट भारत में धर्म का रूप अख्तियार कर चुका है और सचिन से लेकर विराट तक इस धर्म के भगवान हैं, लेकिन माराडोना समूचे विश्व में फुटबाल के भगवान माने जाते रहे।
माराडोना : फुटबाल का भगवान
इसमें कोई दो राय नहीं कि क्रिकेट भारत में धर्म का रूप अख्तियार कर चुका है और सचिन से लेकर विराट तक इस धर्म के भगवान हैं, लेकिन माराडोना समूचे विश्व में फुटबाल के भगवान माने जाते रहे। उनके प्रति खेल प्रेमियों का जुनून अंधविश्वास नहीं था। अर्जेंटीना की तरफ से माराडोना ने अन्तर्राष्ट्रीय करियर में 91 मैच खेले, जिनमें उन्होंने 34 गोल दागे। उन्होंने कुल 491 मैच खेले और 259 गोल दागे थे। उन्होंने चार फीफा विश्व कप में हिस्सा लिया। अपनी कप्तानी में अर्जेंटीना को विश्व कप में जीत दिलाने वाले माराडोना टूर्नामैंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किए गए थे। उन्हें गोल्डन बॉल अवार्ड भी मिला था। उन्हें फीफा प्लेयर ऑफ द सेंचुरी​ अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है।
माराडोना एक ऐसे महानायक रहे जिन्हें अद्भुत, असाधारण, बदनाम, जीनियस और गुस्सैल कुछ भी कहा जाता था लेकिन महान फुटबॉलर डिएगो माराडोना के दिल की धड़कन 60 वर्ष में थम गई। वैसे तो 2020 में दुनिया ने अनेक हस्तियां खोई हैं लेकिन अपने खेल से फुटबॉल की दुनिया में जो ज्वार उन्होंने पैदा किया वह शायद कभी नहीं थमेगा। माराडोना को फुटबाल का भगवान माना जाता रहा। उनके निधन से हर खेल प्रेमी शोकग्रस्त है। माराडोना ने अर्जेंंटीना को 1986 में फुटबाल वर्ल्ड कप जितवाने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने इटली में लीग चैम्पियनशिप जीती। उन्हें अपने देश में आइकन का दर्जा मिला जो सामान्य रूप से युद्ध नायकों को दिया जाता है। विरोधियों काे मात देने में उनकी शालीनता और स्वभाव ने उन्हें फुटबाल के प्रसिद्ध खिलाड़ियों में शुमार कर दिया। उनका पूरा करियर शानदार रहा।  खेल के मैदान में माराडोना की प्रतिभा, रफ्तार, शोखी और नजर का ऐसा खजाना था जिसमें वह फुटबाल प्रेमियों ही नहीं बल्कि सबको मंत्रमुग्ध कर देते थे। माराडोना मैदान में अलग रूप मंे और मैदान के बाहर अलग रूप में नजर आते थे। माराडोना का जन्म अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स की एक झुग्गी बस्ती में हुआ था। अपनी गरीबी से लड़ते हुए वह युवा होने तक फुटबॉल के स्टार बन चुके थे। माराडोना के पास फुटबाल को काबू में रखने की क्षमता, चतुराई, तेजी और ड्रिब्लिंग जैैसे गुण थे। उनके इन्हीं गुणों के चलते उनका मोटापा और अन्य दिक्कतें ढक जाती थीं।
1986 के वर्ल्ड कप के क्वार्टर फाइनल में माराडोना ने ऐसा ​किया जिसे हमेशा याद किया जाएगा। मैक्सिको में क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना और इंग्लैंड के बीच मैच हो रहा था। यह मैच काफी तनावपूर्ण था क्योंकि इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच चार वर्ष पहले फॉकलैंड युद्ध हुआ था। इस रोमांचक मैच में 51 मिनट बीत गए थे और दोनों टीमों में से कोई एक भी गोल नहीं कर पाया था। माराडोना ने उछल कर गेंद को गोल पोस्ट में डालने की कोशिश की। वह गेंद को सिर से मारना चाहते थे लेकिन इसके बजाय गेंद उनके हाथ से लगी और ब्रिटेन के गोलकीपर पीटर शिल्टन उसे रोक नहीं पाए और फुटबाल नेट से जा लगा। रेफरी हैंडबाल को मिस कर गए। उस समय कोई तकनीक भी इस्तेमाल नहीं की जाती थी, जिससे फैसले को बदला जा सके। मैच के बाद माराडोना ने कहा था कि उन्होंने यह गोल थोड़ा सा अपने सिर और थोड़ा सा भगवान के हाथ से किया। इसके बाद फुटबाल के इतिहास में यह घटना हमेशा के लिए ‘हैंड ऑफ गॉड’ के नाम से दर्ज हो गई। इस विवादित गोल के ठीक चार मिनट बाद माराडोना ने एक और गोल किया जिसे गोल ऑफ द सेंचुरी यानी शताब्दी का गोल कहा गया। इस गोल के साथ ही इंग्लैंड वर्ल्ड कप से बाहर हो गया।
अक्सर महान व्यक्तित्व विवादों से भी जुड़ जाते हैं, ऐसा ही माराडोना के साथ हुआ। माराडोना वार्सिलोना और नेपोली जैसे प्रतिष्ठित फुटबाल क्लबों के लिए भी खेले और हीरो कहलाए। अनेक फुटबाल प्रेमी माराडोना को  पूर्ववर्ती फुटबाल के भगवान माने गए पेले से भी शानदार खिलाड़ी मानते हैं। माराडोना ने अपार धन और प्रतिष्ठा हासिल की। उन्होंने सबसे अच्छा फुटबाल इटली में ही खेला। माराडोना के भीतर का इंसान एक आम आदमी था। बहुत ज्यादा शोहरत मिलने के चलते आजाद होकर घूम-फिर नहीं पाते थे। वह महसूस करने लगे थे कि शोहरत उनका सांस घोंट रही है। जहां भी वह जाते हजारों लोग उनके इर्दगिर्द इकट्ठे हो जाते। उन्होंने कोकीन का सेवन करना शुरू कर दिया। वह इटली के कुख्यात माफिया संगठन से भी जुड़ गए थे। माराडोना डोप टैस्ट में पॉजिटिव पाए गए तो उन पर 15 महीनों का प्रतिबंध भी लगाया गया। माराडोना ने अंततः 37वें जन्म दिवस पर फुटबाल से संन्यास ले लिया लेकिन विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उन्होंने एक पत्रकार पर गोली चलाई जिसके लिए उन्हें दस महीने जेल में बिताने पड़े। कोकीन और शराब की लत से उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही गया। उनका वजन एक समय 128 किलो तक पहुंच गया था। माराडोना ​को जिन्दगी के अंतिम वर्षों में अपनी जीवन शैैली सुधारने के लिए लम्बा इलाज कराना पड़ा। जितनी शोहरत माराडोना को मिली उतनी आज के फुटबाल के सुपर स्टार लियोनेस मैसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो को भी कभी नहीं ​मिली। शोहरत और धन को पचाना आसान नहीं होता। एक बात मेरी समझ से बाहर है कि जीवन के सभी सुख, साधन और वैभव होने के बावजूद महान व्यक्तित्व ड्रग्स के जाल में क्यों फंस जाते हैं। ऐसे कौन से मनोवैज्ञानिक कारण हैं, जिनके चलते जीवन शैली ही बिगड़ती चली जाती है। विवादों के बावजूद दुनिया ने एक महान खिलाड़ी खो दिया है।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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